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संघर्ष, लालू का विरोध और फिर अविजित नीतीश.. कहानी राजनीति के धुरंधर सुशासन कुमार की

Ranjan Rituraj
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    अप्रैल 10, 2026 10:59 am IST
    • Published On अप्रैल 10, 2026 10:46 am IST
    • Last Updated On अप्रैल 10, 2026 10:59 am IST
संघर्ष, लालू का विरोध और फिर अविजित नीतीश.. कहानी राजनीति के धुरंधर सुशासन कुमार की

नीतीश कुमार को आम बिहारी कब और कैसे से याद करे? मेरी नज़र में सन 1994 की वो जबरदस्त आग़ाज़ और मंच था 'कुर्मी महारैली'. लालू को चुनौती. 80 साल पुराने त्रिवेणी संघ में राजनीतिक और ज़मीनी दरार. नीतीश कुर्मी और कुशवाहा यानी 'लव कुश' के साथ अलग हुए. 

लेकिन सन 1995 में अति पिछड़ा मंडल आयोग के नाम पर लालू के साथ ही रहा और नीतीश विधानसभा चुनाव में बहुत ज्यादा असर नहीं डाल सके. चुनाव में हारे लेकिन मन से नहीं हारे. सौभाग्यशाली रहे कि जॉर्ज साहब का साथ मिला और वाजपेयी आडवाणी का आशीर्वाद. लोकसभा के माध्यम से केंद्र में आए. मंत्री बने. लेकिन ध्यान बिहार पर ही रहा. निशाना मुख्यमंत्री पद पर ही रहा. 

नीतीश कुमार का सफर

लोग कहते हैं कि 2000 के विधानसभा चुनाव में अगर बीजेपी और भी मजबूत उम्मीदवार उतारती तो शायद उसी साल नीतीश कुमार एक मजबूत मुख्यमंत्री बन जाते लेकिन बने. अफसोस की महज सात दिन का मुख्यमंत्री. उस रोज वीर चंद पटेल मार्ग पटना में पैर रखने की जगह नहीं थी. लालू विरोध में जीते सभी बाहुबली विधायक नीतीश के पीछे खड़े थे. 

सन 2005 आते-आते बिहार की राजनीति इतनी गर्म हो गई कि उस साल दो बार चुनाव करवाने पड़े. बकौल पूर्व डीजीपी अभय आनंद, अति पिछड़ा नीतीश कुमार की चुनावी रैली में बड़े मौन ढंग से शामिल होने लगे थे. यह बात नीतीश कुमार को मालूम चल गई. 

नवंबर 2005 में नीतीश कुमार विजयी हुए. माथा पर था शासन और प्रशासन की जिम्मेदारी. कहते हैं पहले दो साल नीतीश कुमार बिना थके 18-18 घंटे काम करने लगे. बीजेपी आंख बंद कर के उनके पीछे खड़ी थी. अरुण जेटली ने नीतीश को हरी झंडी दे रखी थी. मुख्यमंत्री आवास पर आने-जाने वाले लोग कहते हैं कि बीजेपी के मंत्री भी वहां सावधान की मुद्रा में रहते थे. एक दफ़ा बीजेपी के विधायक ने आरोप भी लगाया था स्वयं के सरकार में मुख्यमंत्री से मिलने में एक महीना लग जाता है. 

सरकार और सत्ता पर नीतीश का नियंत्रण

जनता नीतीश के साथ थी. बीजेपी नीतीश के पीछे खड़ी थी. अफ़सरशाही नीतीश की मुट्ठी में थी. अब फिर कोई क्या बोलता. क़ानून व्यवस्था सुधारने के बाद नीतीश सड़क निर्माण में लग गए. इरादा बिहार के किसी भी कोने से पटना 5 घंटे के अंदर पहुंचना था. बहुत हद तक इस मुकाम को हासिल किए. 

नीतीश कुमार जिस समाज से आते हैं वहां आंगन से लेकर बाहर तक महिलाओं को बराबरी का दर्जा मिला है. इसी बात को नीतीश कुमार बालिका विद्यार्थी साइकिल योजना से समस्त बिहार में फैलाए. यह उस दौर का जबरदस्त सामाजिक पावर प्ले था. कई गरीब पिता अपनी बेटी को साइकिल से स्कूल जाते देख भावुक हो गए. यह इतना बड़ा सामाजिक पवार प्ले था कि ग्रामीण बालिकाएं जब साइकिल से स्कूल जाने लगीं तो शहरी बच्चियां भी अपने अभिभावक से स्कूटर/स्कूटी का डिमांड करने लगीं. 

सन 2010 में नीतीश कुमार की अगुवाई में एनडीए की प्रचंड जीत ने नीतीश को पल भर में राष्ट्रीय स्तर का भविष्य बना दिया. और यहीं से नीतीश का घमंड शुरू हुआ. नीतीश का यह घमंड इतना बढ़ता चला गया की एक रोज़ मोदी के साथ थाली खिंचा तानी और उसके बाद से नीतीश अब वो नीतीश नहीं रहे . 

नीतीश के राजनीतिक अहंकार पर 2014 में मोदी की प्रचंड जीत एक जबरदस्त चोट थी, जो नीतीश को पुनः लालू के पास ले गई. वहीं से नीतीश का व्यक्तिगत करिश्मा खत्म होने लगा. बीजेपी के पास कमजोर राज्य स्तर का नेतृत्व और आम जनों में लालू के मजबूत होने का भय. यही दो कारण उसके बाद से नीतीश के राजनीतिक अस्तित्व को ज़िंदा रखे.

नीतीश कुमार की विकास योजनाएं

नीतीश कुमार सड़क, बिजली और पानी के लिए अवश्य जाने जाएंगे लेकिन इनके लंबे शासन काल में भवन निर्माण भी बहुत हुआ. स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार हुआ लेकिन पलायन की स्थिति और भी ख़राब रही . 

यह अजीब बात है की नीतीश कुमार 20 लगातार साल बिहार की गद्दी के शहंशाह रहे लेकिन आम जनों में उनकी इस विदाई का कहीं भी कोई ग़म या हर्ष नहीं है. उनके पहले शपथ के समय जन्म लिया इंसान आज 25 साल का हो गया होगा. इस पीढ़ी ने स्वतः ख़ुद को पलायन के लिए जन्म लेना सोचा है. 

नीतीश के बिहार में सत्ता लेते वक्त भी बिहार अन्य राज्यों में अंतिम पायदान पर था और आज विदाई लेते वक्त भी अंतिम पायदान पर है. इसमें क्या ग़म और क्या हर्ष ? एक भावनाविहीन समय है जो बार-बार यही कह रहा है कि पीएम मैटेरियल की ज़िद में बिहार एक युग यानी 12 साल एक ही जगह खड़ा रहा है. बिहार एक ही जगह खड़ा रहते रहते उकता सा गया है. 

कैफ़ी आज़मी लिखते हैं- 

चंद सीमाओं में, चंद रेखाओं में 
ज़िंदगी क़ैद है सीता की तरह 
पता नहीं राम कब लौटेंगे 
काश कोई रावण ही आ जाता…

बिहार को अब एक ऊर्जावान स्वच्छ छवि के नेता की ज़रूरत है. सन 2000 वाली नीतीश की छवि. सन 2005 वाली नीतीश की छवि. 

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