- बिहार के कई जिलों में इस साल सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई है
- राज्य के कई हिस्सों में धान की रोपनी में काफी मुश्किल आई है
- राज्य में मौजूदा मानसून सीजन में 42% कम बारिश हुई है
"गेहूं की फसल पानी में डूब कर खराब हो गई. और धान के लिए पानी ही नहीं मिल रहा. हम पर न तो इंद्रदेव मेहरबान हैं, न ही सरकार. बारिश नहीं हो रही तो सरकार सूखा ग्रस्त घोषित करे. मुआवजा दे. बेगूसराय के मुनिराम शर्मा बारिश के इंतजार में आसमान ताकते रहते हैं. बारिश होगी तो 4 बीघे में धान रोपेंगे. उसी से परिवार का खर्च चलेगा. बच्चे पढ़ पाएंगे. लेकिन बारिश तो हो ही नहीं रही.
इस साल बिहार बारिश की कमी से जूझ रहा है. बिहार में मौजूदा मानसून सीजन में 42% कम बारिश हुई है. दक्षिणी बिहार के जिलों में स्थिति और भी ज्यादा खराब है. इसका सीधा असर खेती, किसानी पर पड़ रहा है. धान की रोपाई करने वाले किसान परेशान हैं. 14 जिलों में 10% से भी कम हिस्से में बुआई हुई है. यूं तो कमजोर मॉनसून का असर पूरे देश पर है लेकिन बिहार की स्थिति गंभीर है. मौसम विभाग के अनुसार 13 जुलाई तक देश के 741 में से 397 जिले (326 Deficient और 71 Large Deficient) सामान्य से कम वर्षा की श्रेणी में थे. वहीं बिहार के 38 में से 36 जिले (29 जिले Deficient, 7 जिले Large Deficient) इस श्रेणी में थे। इसके बाद कुछ हिस्सों में बारिश हुई है. मौसम विभाग की मानें तो 18-19 जुलाई के बाद प्रदेश के ज्यादातर हिस्सों में बारिश होगी. इसके बाद स्थिति सामान्य हो सकती है.
कम बारिश के कारण राज्य के कई हिस्सों में धान की रोपनी प्रभावित हुई है

38 में से 35 जिलों में सामान्य से कम बारिश
15 जुलाई तक बिहार में सामान्य रूप से 335mm बारिश होनी चाहिए थी जबकि सिर्फ 193.4 मिलीमीटर बारिश हुई है. मौसम विभाग के मुताबिक बिहार के 38 में से 35 जिलों में सामान्य से कम बारिश हुई है. इन जिलों में 20% से 71% तक की गिरावट है. सुपौल, मधुबनी और गोपालगंज में 20% से कम गिरावट है, जिसे सामान्य माना जाता है. दक्षिणी बिहार में जिलों में सबसे कम बारिश हुई है. गया में 71%, जहानाबाद में 69%, भोजपुर में 65%, नालंदा और जमुई में 64% कम बारिश हुई है. उत्तर पूर्व और उत्तर पश्चिमी जिलों में हुई बारिश के कारण ही राज्य में औसत बारिश का आंकड़ा बढ़ा है. सुपौल में 7%, मधुबनी में 15%, गोपालगंज में 18%, पश्चिमी चंपारण और किशनगंज में 20 और 21% कम बारिश हुई है.
कम बारिश से परेशान हैं किसान
बारिश की कमी से किसान बुरी तरह प्रभावित हुए हैं. इस साल अप्रैल में आखिरी दिनों में तेज आंधी के साथ हुई बारिश ने गेहूं की फसल को नुकसान पहुंचाया था. लेकिन अब बारिश की बेरुखी धान की रोपाई में समस्या पैदा कर रही है. भोजपुर जिले के कावड़ा पंचायत के रहने वाले किसान प्रेम कुमार सिंह इलाके को सूखा ग्रस्त घोषित करने की मांग रहे हैं. वे कहते हैं, "बारिश हो नहीं रही. नहर में पानी नहीं है. हम कैसे खेती करेंगे? घर चलाने के लिए तो कोई कर्ज देगा नहीं. अगर सरकार ने इस इलाके को सूखा ग्रस्त घोषित नहीं किया तो हमारे सामने भुखमरी का संकट पैदा हो जाएगा."
क्या बिहार में बारिश के पैटर्न में कोई बदलाव आया है?
इस सवाल के जवाब में पर्यावरण मामलों के जानकार और वन ट्रिलियन बिहार के ऑनरेरी फेलो मणि भूषण झा कहते हैं, "राष्ट्रीय स्तर पर कमजोर मॉनसून एक बड़ा कारक है लेकिन बिहार की स्थिति थोड़ी अलग है. IMD के आंकड़ों से यह साफ है कि बिहार की स्थिति गंभीर है. देश के 53% जिले सामान्य से कम बारिश की श्रेणी में हैं तो बिहार के 92% जिले इस श्रेणी में आते हैं. बिहार की Climate Resilient & Low Carbon Development Pathway (CR&LCDP) (मार्च 2024) रिपोर्ट में विभिन्न जलवायु परिदृश्यों के आधार पर 2030 तक राज्य के अनेक जिलों में मॉनसूनी वर्षा में लगभग 0.9% से 4.5% तक कमी का अनुमान लगाया गया है. रिपोर्ट यह भी है बताती है कि भविष्य में वर्षा की अनिश्चितता (rainfall variability) बढ़ने की संभावना है।जो हम देख पा रहे हैं.
बेमौसम बरसात से फसल खराब, जरूरत के वक्त नहीं हो रही बारिश
बिहार में अप्रैल के आखिरी दिनों में जबरदस्त बारिश हुई जिससे गेहूं की फसल खराब हुई, वहीं इन दिनों बारिश की कमी ने धान की रोपाई पर संकट पैदा किया. बिहार में एक दर्जन से अधिक जिले ऐसे हैं जहां 10% से कम बुआई हुई है. खरीफ सीजन में भोजपुर में सिर्फ 1% बुआई हुई है, औरंगाबाद में 4%, जहानाबाद में 6% बुआई हुई है. गया और जमुई में लक्ष्य का 1% भी हासिल नहीं किया जा सका है। वहां 0% बुआई हुई है.
ट्यूबवेल, पंपसेट और नहरों का आसरा..
बारिश की कमी के कारण अब खेती के लिए ट्यूबवेल, पंपसेट और नहरों का ही सहारा है. बिहार आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़ों के मुताबिक राज्य की 67 लाख 33 हजार हेक्टेयर सिंचित भूमि में से 43 लाख 47 हजार हेक्टेयर भूमि की सिंचाई का माध्यम ट्यूबवेल ही हैं. 19 लाख 86 हजार हेक्टेयर भूमि कैनाल के पानी से सिंचित होती है. सिंचाई के लिए 65% भूजल (ट्यूबवेल) का इस्तेमाल होता है तो वहीं कैनाल से 29.5% भूमि सिंचित होती है. शेखपुरा जिले के बरबीघा के रहने वाले किसान बिनोद कुमार बताते हैं, "बारिश नहीं होने से हमारा खर्च बढ़ता है. धान की खेती में 7-8 बार पानी की जरूरत होती है. सिर्फ एक बीघे में 3 से 4 हजार रुपया एकस्ट्रा लगता है. और दाम उस हिसाब से नहीं मिलता. लेकिन हमें खेती तो करनी है. सरकारी ट्यूबवेल बंद हैं. प्राइवेट बोरिंग के भरोसे हम खेती करते हैं."
ट्यूबवेल के सहारे खेती न सिर्फ महंगी हो रही है. बल्कि इससे भूजल स्तर में कमी का खतरा भी बना रहता है. कृषि वैज्ञानिक डॉ राजीव कुमार कहते हैं, "सबसे बड़ी चिंता यह है कि कृत्रिम सिंचाई व्यवस्था प्रकृति की संतुलित वर्षा का पूर्ण विकल्प नहीं बन सकती. बारिश केवल खेतों को पानी ही नहीं देती, बल्कि मिट्टी की नमी, भूजल संचय और कृषि-पर्यावरण के संतुलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. लगातार घटती या अनियमित वर्षा से धान जैसी अधिक पानी वाली फसलें अधिक जोखिम में आ जाती हैं.
कृषि मंत्री का दावा, "पिछले साल के मुकाबले बेहतर स्थिति"
कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक राज्य में कम बारिश के बावजूद धान रोपाई पिछले साल से अधिक हुई है. 13 जुलाई तक के आंकड़ों के मुताबिक राज्य में 37 लाख 83 हजार हेक्टेयर के मुकाबले 8 लाख 91 हजार हेक्टेयर में धान की रोपाई हो गई है. जबकि पिछले साल इस दौरान सिर्फ 3 लाख 5 हजार हेक्टेयर में रोपाई हुई थी. कृषि मंत्री विजय सिन्हा कहते हैं, "राज्य में धान नर्सरी का काम पूरा हो चुका है. धान रोपनी का काम भी तेजी से बढ़ रहा है. शारदीय मक्के की बुआई भी संतोषजनक हुई है. हमने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे नियमित रूप से किसानों के बीच जाएं और रोपाई की समीक्षा करें। किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन दें. अभियान चलाकर सौ - फीसदी का लक्ष्य हासिल करें."
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