- बिहार सरकार ने पुल दुर्घटनाओं को देखते हुए एक बड़ा फैसला लिया है
- राज्य सरकार ने पुलों की भार क्षमता की जांच करवाने वाली है
- आईआईटी के इंजीनियर पहले चरण में 85 बड़े पुलों की जांच करेंगे
बिहार में लगातार पुल गिरने की घटनाओं के बाद राज्य सरकार ने बड़ा फैसला लिया है. अब राज्य के बड़े और महत्वपूर्ण पुलों की भार क्षमता यानी वे कितना वजन सुरक्षित रूप से उठा सकते हैं, इसकी वैज्ञानिक जांच कराई जाएगी. इसके लिए आईआईटी पटना और आईआईटी दिल्ली के विशेषज्ञों की मदद ली जाएगी. सरकार का मानना है कि इससे कमजोर पुलों की समय रहते पहचान हो जाएगी और भविष्य में बड़े हादसों को रोका जा सकेगा. पिछले कुछ वर्षों में बिहार में पुलों से जुड़े कई हादसे सामने आए हैं. सबसे चर्चित मामला भागलपुर और खगड़िया को जोड़ने वाले अगुवानी-सुल्तानगंज गंगा पुल का रहा. करीब 1,700 करोड़ रुपये की लागत से बन रहा यह पुल अप्रैल 2022 में पहली बार आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुआ था. इसके बाद 4 जून 2023 को निर्माण के दौरान पुल का बड़ा हिस्सा गंगा नदी में गिर गया. इस घटना ने पूरे देश में चर्चा छेड़ दी और निर्माण की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल उठे.
बिहार में गिर चुके हैं कई पुल
इसके बाद भी पुल गिरने का सिलसिला नहीं रुका. वर्ष 2024 में अररिया जिले के सिकटी में एक निर्माणाधीन पुल उद्घाटन से पहले ही ढह गया. इसके बाद सीवान, मधुबनी, किशनगंज, पूर्वी चंपारण और सारण समेत कई जिलों में छोटे और मध्यम पुलों के गिरने या क्षतिग्रस्त होने की घटनाएं सामने आईं. कुछ ही दिनों के भीतर कई पुल गिरने से लोगों में डर पैदा हो गया. विपक्ष ने सरकार को घेरा और पुल निर्माण की गुणवत्ता, निगरानी और रखरखाव पर सवाल उठाए. सरकार ने भी कई इंजीनियरों के खिलाफ कार्रवाई की और पूरे मामले की समीक्षा शुरू की.
पुलों की भार क्षमता की जांच करवाएगी बिहार सरकार

पुलों की वैज्ञानिक जांच जरूरी
इन्हीं घटनाओं के बाद सरकार ने फैसला किया कि अब पुलों की केवल मरम्मत करना काफी नहीं होगा. उनकी वैज्ञानिक जांच भी जरूरी है. इसी कारण आईआईटी पटना और आईआईटी दिल्ली के विशेषज्ञों को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है. दोनों संस्थानों के इंजीनियर आधुनिक तकनीक की मदद से यह जांच करेंगे कि पुलों की वर्तमान स्थिति क्या है, वे कितना भार उठा सकते हैं और भविष्य में उनकी मरम्मत या पुनर्निर्माण की जरूरत है या नहीं.
सरकार ने "बिहार राज्य पुल अनुरक्षण नीति" भी लागू की है. इसके तहत राज्य के हजारों पुलों की नियमित निगरानी की जाएगी. पहले चरण में 85 बड़े पुलों का स्ट्रक्चरल ऑडिट और भार क्षमता की जांच होगी. इनमें उत्तर बिहार के 40 बड़े पुलों की जांच आईआईटी दिल्ली और दक्षिण बिहार के 45 बड़े पुलों की जांच आईआईटी पटना करेगा. विशेषज्ञ अपनी रिपोर्ट में यह भी बताएंगे कि कौन-सा पुल पूरी तरह सुरक्षित है, किसकी मरम्मत की जरूरत है और किन पुलों पर भारी वाहनों की आवाजाही सीमित करनी चाहिए.
दशकों पहले बने हैं कई पुल
सरकार का कहना है कि बिहार में कई पुल ऐसे हैं जो कई दशक पहले बनाए गए थे. उस समय वाहनों की संख्या कम थी और भारी ट्रकों का दबाव भी आज की तुलना में काफी कम था. लेकिन अब सड़कों पर भारी वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है. ऐसे में यह जानना जरूरी हो गया है कि पुराने पुल आज भी उतना ही भार सुरक्षित तरीके से उठा सकते हैं या नहीं.
हादसों की संख्या में आएगी कमी
इस जांच का एक और फायदा यह होगा कि सरकार भविष्य की योजना बेहतर तरीके से बना सकेगी. जिन पुलों की उम्र पूरी होने वाली है या जिनमें कमजोरी मिलेगी, उनकी पहले से पहचान हो जाएगी. ऐसे पुलों की समय रहते मरम्मत या नए पुल का निर्माण कराया जा सकेगा. इससे अचानक होने वाले हादसों की संभावना भी कम होगी.
सरकार के फैसले के पीछे की इनसाइड स्टोरी
बिहार नदियों का राज्य है. यहां एक जिले से दूसरे जिले तक पहुंचने के लिए हजारों छोटे और बड़े पुलों का इस्तेमाल होता है. हर दिन लाखों लोग और हजारों वाहन इन पुलों से गुजरते हैं. इसलिए किसी भी पुल की सुरक्षा सीधे लोगों की जान से जुड़ा मामला है. हाल के हादसों के बाद लोगों के मन में पुलों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है. सरकार को उम्मीद है कि आईआईटी की जांच से लोगों का भरोसा भी बढ़ेगा. सरकार का कहना है कि उसका उद्देश्य केवल पुलों की जांच कराना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना है जिससे भविष्य में पुलों की नियमित निगरानी होती रहे. विशेषज्ञों की रिपोर्ट के आधार पर जिन पुलों में खतरा मिलेगा, वहां तुरंत जरूरी कदम उठाए जाएंगे. माना जा रहा है कि यह फैसला बिहार में पुलों की सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम है और इससे भविष्य में ऐसे हादसों को रोकने में काफी मदद मिलेगी.
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