सीमांचल के इलाके में कड़ाके की ठंड पड़ रही है और पूरा इलाका सुबह-शाम भले ही कुहासे की चादर में लिपटी नजर आ रही है लेकिन इस मौसम में शहर और कस्बा के हर नुक्कड़ पर किसी ठेले पर एक बर्तन से भाप उठता नजर आए और कुछ लोग टकटकी नजर से अपनी बारी का इंतज़ार करते दिखे तो आप समझ लीजिए कि वहां सीमांचल का इडली 'भक्का' तैयार हो रहा है. 'इडली' और 'भक्का' में काफी साम्य है,लिहाज़ा इसे सीमांचल का इडली कहा जाता है. साम्यता रंग-रूप से लेकर निर्माण और स्वाद तक की है.मोमोज , पिज्जा, बर्गर और चाउमीन के दौर में भी इसकी प्रासंगिकता बरकरार रहना आपने आप मे हैरान करने वाला है. वजह संभवतः यह मानी जा सकती है कि ' भक्का' बुजुर्गों की पसंद तो है हीं, 70-80 के दशक में पैदा लेने वाले लोगों के साथ-साथ 'जेन-जी' मे भी यह कम लोकप्रिय नही है.जाड़े के आगमन के साथ ही चावल के आटे और शक्कर(गुड़) से निर्मित 'भक्का' का इसके शौकीनों को बेसब्री से इंतजार रहता है क्योंकि यह धान की नई फसल के आगमन से जुड़ा व्यंजन है जिसका फिर अगले साल तक इंतजार करना पड़ता है.
रंग-रूप, स्वाद से लेकर निर्माण तक की प्रक्रिया है इडली के समान
इडली बनाने के लिए बर्तन के रूप में इडली मेकर की जरुरत होती है तो 'भक्का' के निर्माण के लिए भी एक ऐसे ही उपकरण की जरूरत होती है.इसमें एल्युमिनियम की हांडी के ऊपर मिट्टी का ढक्कन रखा जाता है जिसमे बीच मे छेद होता है.हांडी में पानी गर्म होता है जो वाष्प में तब्दील होता है और मिट्टी के ढक्कन के ऊपर सफेद कपड़े में 'भक्का' जो चावल के आटे का होता है,को रखा जाता है और इडली की तरह ही यह वाष्प में तैयार होता है. जाहिर है कि यह देखने मे हूबहू इडली जैसा ही होता है और स्वाद भी कमोबेश इडली की तरह ही होता है. 'भक्का' दो प्रकार का होता है, एक जिसमे बीच मे गुड़ डाला जाता है जबकि मीठा से परहेज करने वालों के लिए सादा 'भक्का' बनाया जाता है जो इडली के समान ही होता है.फर्क इतना सा है कि इडली चावल के साथ-साथ सूजी से भी तैयार होता है और सांभर के साथ खाया जाता है जबकि 'भक्का' केवल चावल के आटे से तैयार होता है.

धान की नई फसल के आगमन का सूचक है 'भक्का'
चौक-चौराहे पर अगर 'भक्का' की दुकान सजने लगे तो यह इस बात का सूचक है कि धान की नई फसल तैयार है. 'भक्का' का तकनीकी पहलू यह है कि यह केवल धान की नई फसल से तैयार चावल के आटे से ही बनाया जाता है. चावल पुराना होने के बाद उसके आटा से 'भक्का' का निर्माण कठिन हो जाता है या यूं कहें कि इसका स्वाद बदल जाता है. दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि, अक्सर 'भक्का' का निर्माण 'उसना चावल' के आटे से ही होता है, हालांकि 'अरवा चावल' के आटा से भी इसका निर्माण हो सकता है.लेकिन, अरवा की तुलना में उसना से बना 'भक्का' अधिक मुलायम होता है.
भक्का की मूल सामग्री चावल का आटा का निर्माण है दुरूह
'भक्का' का सबसे प्रमुख सामग्री चावल का आटा होता है. यह चावल का आटा मुख्य रूप से घरेलू स्तर पर तैयार किया जाता है. इस चावल के आटे को मिल में नही तैयार कर पत्थर से बने 'जाता' में पिसा जाता है जो 'जाता' 50-60 के दशक में प्रचलन में था और आम तौर पर घर की महिलाएं इसी पर घरेलू उपयोग के लिए आटा तैयार किया करती थी. सीमांचल के इलाके में आज भी कई घरों में पूजा-पाठ से जुड़ी सामग्री 'जाता' से ही तैयार की जाती है.हालांकि, जानकर बताते हैं कि घरेलू स्तर पर भी इस तरह का आटा तैयार करने के लिए बाजार में कई मशीनें उपलब्ध है.
पुरानी ही नही नई पीढ़ी के बीच मे भी लोकप्रिय है 'भक्का'
पूर्णियां के पॉलीटेकनिक-इंजीनियरिंग कॉलेज चौक पर एक तरफ मोमोज ,बर्गर और चौमिन की दुकानें सजती है तो दूसरी ओर वरुण चौधरी 'भक्का' का ठेला लगाते हैं। हैरानी की बात यह है कि 'भक्का' के शौकीनों की कतार में बुजुर्ग और अधेड़ महिला-पुरुषों तो होते ही है,बड़ी संख्या युवाओं की भी होती है। बकौल वरुण चौधरी ' मेरे ग्राहकों में बड़ी संख्या छात्रों और युवाओं की है. मोमोज और चौमिन उन्हें आकर्षित जरूर करते हैं लेकिन घर के बुजुर्गों से 'भक्का' से जुड़े अनुभव उन्हें यहां तक खींच लाते हैं '.कोलकाता में लॉ अंतिम वर्ष की पढ़ाई कर रही छात्रा स्वाति सुमन और भुवनेश्वर में लॉ की पढ़ाई कर रहे छात्र प्रभव का अपना एक अलग ही 'भक्का' से जुड़ाव है. स्वाति और प्रभव कहते हैं ' जब भी छुट्टियों में पूर्णियां आता हूँ, 'भक्का' खाना नही भूलता हूँ. यह अपने खान-पान से जुड़े रहने की एक कवायद भी है जो कोलकाता या भुवनेश्वर में नही पूरी हो सकती है'. रामनगर के बुजुर्ग कामेश्वर सिंह वरुण चौधरी को एक साथ 50 'भक्का' का आर्डर देने आए हैं. वे कहते हैं ' बेंगलुरु और दिल्ली में रहने वाले नाती और पोते घर आये हैं. सब कोई 'भक्का' खाना चाह रहा है'. मतलब, उम्र और आ
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