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अमितेश कुमार

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    उपन्यासकार सुरेंद्र मोहन पाठक से NDTV की खास मुलाकात

    उपन्यासकार सुरेंद्र मोहन पाठक कहते हैं कि जब हिंदी के पाठक थे, अस्सी और नब्बे का दशक था, पल्प फिक्शन का बाजार था, हिंदी साहित्य जिसे गंभीर साहित्य कहते हैं उसके प्रकाशकों ने या पल्प के प्रकाशकों ने उनलोगो ने कोई ऐसी कोशिश नहीं कि हिंदी साहित्य का बाजार बने.

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    मेटा 2018 : रंगकर्मी और फिल्म डायरेक्टर विजया मेहता को दिया जाएगा लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड

    महिन्द्रा द्वारा आयोजित किए जाने वाले सालाना महिन्द्रा एक्सिलेंस इन थिएटर अवार्ड्स (मेटा) में ‘मेटा 2018’ का लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड प्रसिद्ध रंगकर्मी, अभिनेता और फ़िल्म निर्देशक विजया मेहता को दिया जाएगा.

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    थिएटर ओलंपिक्स : बाहुबली के अभिनेता ने ली 'मास्टरक्लास'

    थिएटर ओलंपिक में नाट्य प्रस्तुतियों के अलावा भी कला से संबंधित कला से जुड़ी गतिविधियां हो रही है जिनमें से एक महत्त्वपूर्ण गतिविधि है मास्टरक्लास.

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    आठवां थिएटर ओलम्पिक शुरू, 8 अप्रैल तक देश के 17 शहरों में होगा आयोजन

    लालकिले के परिसर में शनिवार को आठवें थिएटर ओलम्पिक का विधिवत उद्घाटन हुआ. इसके लिए लालकिले की प्राचीर के आगे एक अस्थाई मंच बनाया गया था जिस पर लालकिले का ही मॉडल बनाया गया था. इससे पहले 2016 में सातवां थिएटर ओलम्पिक पोलैंड में आयोजित हुआ था. पोलैंड के निर्देशक ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय को आठवें ओलंपिक का बैटन औपचारिक रूप से सौंपा.

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    8वें थियेटर ओलंपिक्स की मेजबानी को भारत तैयार, दुनियाभर से 25 हजार दिग्गज आर्टिस्ट होंगे शामिल

    थियेटर के महाकुंभ यानी थियेटर ओलंपिक्स के लिए सारी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं और भारत इस बार इसकी मेजबानी करने को पूरी तरह से तैयार है. आठवें थियेटर ओलंपिक्स का 17 फरवरी को औपचारिक उदघाटन उपराष्ट्रपति एम वेंकैयानायडु दिल्ली में लालकिला में करेंगे. 17 फरवरी से आठ अप्रैल तक चलने वाले इस समारोह का समापन मुंबई में गेटवे ऑफ इंडिया पर होगा. ये जानकारी संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (रानावि) में बुलाए गए प्रेस कांफ्रेस में दी.

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    दर्शकों के मन में बस गईं साल 2017 की यह पांच यादगार नाट्य प्रस्तुतियां

    साल 2017 बीतने को है और साल 2018 दस्तक दे रहा है. इस साल देश-दुनिया के साथ-साथ राजधानी दिल्ली में भी रंगमंचीय अभिव्यक्तियां विवध रंगों के साथ दर्शकों के सामने आईं. कुछ यादगार नाट्य प्रदर्शनों ने सफलता के झंडे गाड़े और प्रेक्षकों के मन में अमिट छाप छोड़ गए.

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    क्या दिल्ली के रंगकर्मी सरकारी कठपुतली बनने के लिए तैयार हैं?

    क्या दिल्ली के रंगकर्मी दिल्ली सरकार द्वारा तय किए विषयों पर नाटक करने के लिए तैयार हैं? क्या उन्हें नहीं लगता कि एक कलाकार होने के नाते अपने समय और समाज से कैसे जुड़ना चाहते हैं और किन विषयों के जरिए अभिव्यक्ति करना चाहते हैं यह तय करने का हक उनका है? और यह तय करने में वह सरकारी बाबूओं और मंत्रियों से अधिक सक्षम हैं? या दिल्ली के रंगकर्मी सरकार के हाथ की कठपुतली बनने के लिए तैयार हैं?

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    ‘डनकर्क’ युद्ध आधारित सिनेमा के इतिहास में एक बड़ा प्रस्थान बिंदु

    झुके हुए कंधों से सिपाही समूह में ट्रेन की तरफ बढ़ रहे हैं, रास्ते में एक बूढ़ा सबको ब्रेड बांटता और शुक्रिया कहता है. एक सिपाही ठिठक कर पूछता है ‘लेकिन हम तो लड़े ही नहीं, हम केवल बच कर आए हैं’, बूढ़ा कहता है ‘बच के आना भी जीत है’, वह बूढ़ा जो अंधा भी है अपने हाथों से उसका चेहरा छूता है. क्रिस्टोफर नोलन की हालिया फिल्म ‘डनकर्क’ में यह दृश्य सिनेमा के अंत में आता है.

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    अगले साल भारत में होगा दुनिया का बड़ा रंगमंचीय आयोजन 'थिएटर ओलम्पिक'

    विश्व में थिएटर के बड़े आयोजनों में से एक थिएटर ओलम्पिक के आठवें संस्करण का आयोजन भारत में होगा. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में हुए एक कार्यक्रम में इसकी घोषणा केंद्रीय संस्कृति मंत्री ने की. अगले साल यानी 2018 में 17 फरवरी से 8 अप्रैल के बीच एक साथ देश के कई शहरों में इस ओलम्पिक का आयोजन किया जाएगा.

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    नाट्य समीक्षा- बंदिश 20 से 20,000 हर्ट्ज़ : कला के प्रति प्रतिबद्धता और कलाकारों का प्रतिरोध

    कलाकार को किसके साथ होना चाहिए- विचार के साथ, व्यक्ति के साथ या कला के साथ? उसे अपने ऊपर पड़ रहे तमाम दबावों से कैसे निकलना चाहिए? एक कलाकार के भीतर कौन से संघर्ष चलते रहते हैं जिससे उसकी कला प्रभावित होती है? कला को रोकने वाली कौन सी बंदिशें है और उनसे कैसे पार पाना है? ऐसे कुछ सवालों पर गायन कला के माध्यम से नाट्य प्रस्तुति‘बंदिश 20 से 20,000 हर्ट्ज़’ अपना नजरिया प्रस्तुत करती है. प्रस्तुति में हिंदुस्तानी संगीत में पिछली डेढ़ सदी में हुए परिवर्तन, कलाकारों की स्थिति और भीतरी राजनीति के प्रश्न और बेचैनियां बहुत सूक्ष्मता से उभरते हैं. प्रस्तुति में अतीत के साथ समकालीनता की भी महीन बुनाई है.

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    वाक : पुरानी आवाजों के साथ कविताओं के नए सुर उभरने के संकेत

    रज़ा फाउंडेशन ने दिल्ली के त्रिवेणी कला केंद्र में ‘वाक’ नाम से एक आयोजन किया. यह भारतीय भाषाओं में रची जा रही कविताओं का द्वैवार्षिक आयोजन होगा. इस साल इसका पहला संस्करण संपन्न हुआ. इसमें 15 से भी अधिक भारतीय भाषाओं के 45 के करीब कवि सम्मिलित हुए. ऐसे समारोह अक्सर अतीत के वैभव पर इतराने के आयोजन बन जाते हैं. इनकी सार्थकता तभी है जब पुरानी आवाजों के साथ नई और सशक्त आवाजें भी सामने आएं जिसमें भविष्य की रूपरेखा दिखे. इस सत्र में इसका संकेत मिला.

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    वेद प्रकाश शर्मा : भाषा का उत्कर्ष दिखाने वाला चश्मा उतारकर भी देखें इन्हें

    ये वो दिन थे जब ‘नंदन’, ‘चंपक’ और ‘नन्हें सम्राट’ पढ़ने में उम्र विद्रोह करने लगा था. ‘सुमन सौरभ’ और ‘विज्ञान प्रगति’ के दिन आ गए थे जिसे पढ़ने के बाद लगता था कि कुछ तो बड़े होने लगे हैं. ऐसे ही दिनों में मुझे गांव में विमल भैया की आलमारी मिली. इससे होकर एक ऐसी दुनिया की खिड़की खुली जहां रोमांच था, दिमागी कसरत थी और उत्सुकता थी. ऊपर कोने से मोड़े गए पन्ने जो बुकमार्क का काम करते थे वापस बुलाते रहते थे कि यहां से आगे बढ़कर क्लाइमेक्स तक पहुंचो. ये आलमारी बड़की मां के कमरे में थी, जहां कोई यह कहने नहीं आता था कि ‘इसको पढ़ने की तुम्हारी उम्र नहीं’. आलमारी की तरतीब जब तक न बिगड़े, भैया के भी बिगड़ने की संभावना नहीं थी. एक दिन यहीं मिले वेद प्रकाश शर्मा और ‘जिगर का टुकड़ा’ एक मोटा सा खुरदरे पन्ने वाला उपन्यास. बाद में पता चला था कि इसे लुगदी उपन्यास कहते हैं यानि पल्प फिक्शन.

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    भारत रंग महोत्सव : अक्करमाशी, दलित शोषण के चरम को उघाड़ती नाट्य प्रस्तुति

    जब भी जाति का प्रश्न आता है तो कुछ लोग इसको सिरे से नकारने के लिए खड़े हो जाते हैं. वैसे शहरों में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जिन्होंने जाति का अनुभव उस तरह से नहीं किया, लेकिन इनकी संख्या नगण्य है. जाति और इससे जुड़ी घटनाओं की सच्चाई से इनकार करना वैसा ही है जैसे घर के पीछे की तरफ नाला है तो खिड़की को ही बंद कर लेना. जबकि बजबजाता हुआ नाला बदस्तूर बहता रहता है. इस बजबजाहट की सबसे कारुणिक और रोष भरी अभिव्यक्तियां हमें उन आत्मकथाओं में मिलती हैं जिन्हें जातिगत व्यवस्था में हाशिये पर धकेल दिए गए लोगों ने इसकी भीषणता का सामना करते हुए दर्ज किया है. इसे हम दलित साहित्य के नाम से जानते हैं.

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    भारत रंग महोत्सव में रामकथा का बघेली में हुआ मंचन

    बघेली में बोलते हुए राम और हां, राम नहीं हितकारी. राम कथा भारतीय जनमानस में व्याप्त है और इस जनमानस की भोगौलिक और मानसिक स्तर पर जितनी विविधता है उतनी ही विविधता रामकथा के स्वरूप में भी है. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में चल रहे 19वें भारत रंग महोत्सव में रामकथा के विविध स्वरूप को भिन्न तरीक़ों से मंचित होते हुए देखा जा सकता है.

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    हमारे जैसे लोकतंत्र में, सेंसर बोर्ड बहुत 'अलोकतांत्रिक' है : मनोज बाजपेयी

    'इससे पहले कि आप कुछ पूछें, मैं पहले कुछ बोलना चाहता हूं'.. जिस स्कूल में एडमिशन नहीं मिला, उसी स्कूल ने जब संवाद के लिए बुलाया तो मनोज बाजपेयी पूरी तैयारी में दिखे और सवाल-जवाब के पहले अपनी बातें रखीं.

अमितेश कुमार

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