Bicycle License History India: आजादी के पहले और उसके कुछ साल बाद तक भारत के कई शहरों में साइकिल रखना किसी मर्सिडीज रखने जैसा रुतबा हुआ करता था. ये कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि हमारे देश का वो हकीकत भरा अतीत है, जिसे सुनकर आज की पीढ़ी के होश उड़ जाएंगे. उस दौर में अगर साइकिल पर लाइसेंस का बिल्ला नहीं चमका, तो समझो शामत आ गई. ब्रिटिश राज में नगर पालिका और पंचायतों ने एक अजीबोगरीब नियम बना रखा था. अगर आपको सड़क पर दो पहियों की ये सवारी उतारनी है, तो बकायदा रजिस्ट्रेशन कराना होता था. मजेदार बात ये है कि इस लाइसेंस की मियाद सिर्फ एक साल की होती थी, यानी हर साल कचहरी के चक्कर काटो और अपनी साइकिल का 'पुनर्जन्म' कराओ.
सिर्फ 2 रुपये में मिलता था 'टशन' का परमिट (Bicycle License Fee and Rules in Old India)
- उस जमाने में महज 2 रुपये की फीस लगती थी, जो सुनने में तो कम लगती है...पर उस वक्त के हिसाब से ये भी बड़ी रकम थी.
- पैसे जमा करने के बाद पीतल या एल्यूमीनियम का एक छोटा सा टैग मिलता था, जिसे साइकिल के फ्रेम पर टांगना पड़ता था.
- रात के अंधेरे में साइकिल पर लालटेन या लाइट होना भी अनिवार्य था, वरना लाइसेंस रद्द होने का खतरा रहता था.
Licence was required for a cycle 🤔 pic.twitter.com/RtHIliewN8
— Shekar Iyer (@SHEKARSUSHEEL) April 27, 2026
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साइकिल नहीं, ये तो अमीरी की निशानी थी (Status Symbol and Evolution of Cycling Laws)
1940 से 1960 के दशक तक पंजाब, महाराष्ट्र और बंगाल जैसे राज्यों में ये कानून बहुत सख्त था. बुजुर्गों की मानें तो जैसे ही नई साइकिल घर आती थी, सबसे पहले म्युनिसिपल ऑफिस जाकर लाइन लगानी पड़ती थी. उस वक्त साइकिल को एक 'लग्जरी' आइटम माना जाता था, जिससे सरकार अच्छा खासा टैक्स वसूलती थी. 1970 के दशक के बाद मोटर व्हीकल एक्ट आने पर धीरे धीरे साइकिल को इन बेड़ियों से आजाद कर दिया गया.
(डिस्क्लेमर: यह जानकारी सोशल मीडिया पर वायरल पोस्ट के आधार पर दी गई है. NDTV इसकी पुष्टि नहीं करता.)
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