
नई दिल्ली:
दिल्ली में ऐसे कई संगठन हैं जो अलग-अलग मोर्चों पर बदलाव की एक कहानी लिख रहे हैं। इन्हीं में से एक है पहचान। यहां मुस्लिम समुदाय की उन लड़कियों को पढ़ने और आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया जाता है, जिनकी किसी वजह से बचपन में पढ़ाई छूट गई। यहां से निकली लड़कियां तमाम जगहों पर काम कर रही हैं।
करीब 50 साल की फ़रीदा ख़ान को जिंदगी से जो मिला, उसे वह अब दूसरों में बांट रही हैं। वो पंद्रह साल की थीं, जब अपने दो बच्चों के साथ अकेली रह गईं। एक एनजीओ ने उन्हें पढ़ाया-लिखाया, यहां तक पहुंचाया। अब जैतपुर एक्सटेंशन के इस क्लास में वह दूसरों को पढ़ा रही हैं। उनकी इस पहचान संस्था से 200 से ज़्यादा लड़कियां निकल चुकी हैं, जिन्हें दसवीं और बारहवीं की डिग्री मिल चुकी है। कुछ और आगे गई हैं। ग्रेजुएशन, बीसीए और बीएड भी कर रही हैं। फरीदा बताती हैं कि यहां वह छात्राएं आती हैं जो सामाजिक, आर्थिक या पारिवारिक कारणों से पढ़ाई पूरी नहीं कर पाईं।
जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी भी फ़रीदा की क़ायल हैं। फ़रीदा उन पहली छात्राओं में से हैं जो उनसे पढ़ीं। शबनम हाशमी कहती हैं कि अगर आज मैं सोशल एक्टिविस्ट हूं तो फरीदा की वजह से, क्योंकि 1981 में जब मैं रूस में कोर्स कर रही थी और दिल्ली आई तो निजामुद्दीन में एक जगह कुछ वक्त के लिए उन लड़कियों को पढ़ाना शुरू किया जो स्कूल नहीं जा पाईं थीं। तो फरीदा मेरी छात्रा थी। जब छुट्टियां खत्म हुईं और रूस जाने की बारी आई तो फरीदा वह लड़की थी, जिसने कहा कि रोशनी की किरण दिखी थी। अब आप जा रही हैं तो हमारा क्या होगा? ये बात झकझोर गई और मैंने यहीं पढ़ाने और नहीं जाने का फैसला किया।
करीब 19 साल की फरहा नाज पांचवीं के बाद पढ़ नहीं पाईं, लेकिन पहचान के जरिए उसने 10वीं और 12वीं पूरी की। अब नर्सरी प्राइमरी टीचर्स ट्रेनिंग कर रही हैं और साथ साथ एक पब्लिक स्कूल में बच्चों को पढ़ाती भी हैं। फरहा कहते नहीं थकतीं कि पहचान ने उसको नई पहचान दी है। वह जामिया से पॉलिटिकल साइंस में ग्रैजुएशन कर रही हैं और सेकंड ईयर में हैं।
पहचान लड़कियों को सिलाई और कटाई की ट्रेनिंग भी देता है। रुहीन ने यहीं से सीखा और अब दूसरों को सिखा भी रही हैं। रुहीन ने अपना सेंटर भी खोला है और पहचान के जरिए 10वीं और 12वीं भी पास की। आगे पॉलिटेकनिक करने का इरादा है।
अफरोज़ का जैतपुर में ससुराल है। शादी होकर आईं तो 10वीं पास थी। अब पहचान ने 12 वीं करवाई। आगे टीचर्स ट्रेनिंग का कोर्स करना चाहती हैं।
पहचान के दम पर लड़कियां लिखना सीख रही हैं, ताकि खुद की किस्मत लिख सकें। हिसाब सीख रही हैं ताकि अपने अधिकारों का हिसाब ले सकें।
करीब 50 साल की फ़रीदा ख़ान को जिंदगी से जो मिला, उसे वह अब दूसरों में बांट रही हैं। वो पंद्रह साल की थीं, जब अपने दो बच्चों के साथ अकेली रह गईं। एक एनजीओ ने उन्हें पढ़ाया-लिखाया, यहां तक पहुंचाया। अब जैतपुर एक्सटेंशन के इस क्लास में वह दूसरों को पढ़ा रही हैं। उनकी इस पहचान संस्था से 200 से ज़्यादा लड़कियां निकल चुकी हैं, जिन्हें दसवीं और बारहवीं की डिग्री मिल चुकी है। कुछ और आगे गई हैं। ग्रेजुएशन, बीसीए और बीएड भी कर रही हैं। फरीदा बताती हैं कि यहां वह छात्राएं आती हैं जो सामाजिक, आर्थिक या पारिवारिक कारणों से पढ़ाई पूरी नहीं कर पाईं।
जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी भी फ़रीदा की क़ायल हैं। फ़रीदा उन पहली छात्राओं में से हैं जो उनसे पढ़ीं। शबनम हाशमी कहती हैं कि अगर आज मैं सोशल एक्टिविस्ट हूं तो फरीदा की वजह से, क्योंकि 1981 में जब मैं रूस में कोर्स कर रही थी और दिल्ली आई तो निजामुद्दीन में एक जगह कुछ वक्त के लिए उन लड़कियों को पढ़ाना शुरू किया जो स्कूल नहीं जा पाईं थीं। तो फरीदा मेरी छात्रा थी। जब छुट्टियां खत्म हुईं और रूस जाने की बारी आई तो फरीदा वह लड़की थी, जिसने कहा कि रोशनी की किरण दिखी थी। अब आप जा रही हैं तो हमारा क्या होगा? ये बात झकझोर गई और मैंने यहीं पढ़ाने और नहीं जाने का फैसला किया।
करीब 19 साल की फरहा नाज पांचवीं के बाद पढ़ नहीं पाईं, लेकिन पहचान के जरिए उसने 10वीं और 12वीं पूरी की। अब नर्सरी प्राइमरी टीचर्स ट्रेनिंग कर रही हैं और साथ साथ एक पब्लिक स्कूल में बच्चों को पढ़ाती भी हैं। फरहा कहते नहीं थकतीं कि पहचान ने उसको नई पहचान दी है। वह जामिया से पॉलिटिकल साइंस में ग्रैजुएशन कर रही हैं और सेकंड ईयर में हैं।
पहचान लड़कियों को सिलाई और कटाई की ट्रेनिंग भी देता है। रुहीन ने यहीं से सीखा और अब दूसरों को सिखा भी रही हैं। रुहीन ने अपना सेंटर भी खोला है और पहचान के जरिए 10वीं और 12वीं भी पास की। आगे पॉलिटेकनिक करने का इरादा है।
अफरोज़ का जैतपुर में ससुराल है। शादी होकर आईं तो 10वीं पास थी। अब पहचान ने 12 वीं करवाई। आगे टीचर्स ट्रेनिंग का कोर्स करना चाहती हैं।
पहचान के दम पर लड़कियां लिखना सीख रही हैं, ताकि खुद की किस्मत लिख सकें। हिसाब सीख रही हैं ताकि अपने अधिकारों का हिसाब ले सकें।
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