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This Article is From Feb 09, 2011

सरकारी कार के निजी प्रयोग पर किराया जमा किया था शास्त्री जी ने

New Delhi: आज जब देश की राजनीति आकंठ भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग को लेकर सुर्खियों में है, उस समय देश के दूसरे प्रधानमंत्री स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्री पर एक ऐसी पुस्तक प्रकाशित हुई है, जिसमें उनकी सादगी एवं ईमानदारी का विहंगम दर्शन होता है। शास्त्री जी की ईमानदारी का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब उनके बेटों ने उनकी सरकारी कार का निजी इस्तेमाल किया तो उन्होंने सरकारी खजाने में उसका किराया जमा कराया। इस घटना का जिक्र 'लालबहादुर शास्त्री : पास्ट फॉरवार्ड' (कोणार्क) नामक पुस्तक में उनके बेटे और कांग्रेस नेता सुनील शास्त्री ने किया है। पुस्तक के लेखक सुनील कहते हैं कि वह समझते थे कि उनके बाबूजी के ओहदे के साथ उनके पास एक बड़ी आलीशान कार है। शास्त्री जी को सरकारी इस्तेमाल के लिए एक शेवरलेट इम्पाला कार मिली थी। सुनील किताब में कहते हैं, "एक दिन मैंने बाबूजी के निजी सचिव से कहा कि वह ड्राइवर से कहें कि शेवरलेट लेकर घर आए। फिर हमने ड्राइवर से चाबी मांगी और कार लेकर निकल गए।" बाद में शास्त्री जी ने ड्राइवर से जवाब तलब किया, "तुम्हारे पास लॉगबुक है...?" जब ड्राइवर ने सहमति में सिर हिलाया तो बाबूजी ने उससे कहा कि पिछले दिन कार जितनी दूर चली थी, उसके आगे की दूरी उसमें दर्ज करो। जब ड्राइवर ने दूरी 14 किलोमीटर बताई तो उन्होंने उसे सलाह दी कि इतनी दूरी को निजी इस्तेमाल में लिखो और उसके बाद उन्होंने अम्मा से कहा कि वह उनके निजी सचिव को इतनी दूरी का किराया दे दें, ताकि उसे सरकारी खाते में जमा करा दिया जाए।" शास्त्री जी जून, 1964 से जनवरी, 1966 तक देश के प्रधानमंत्री रहे थे। ताशकंद में उनका उस समय निधन हो गया था, जब वह पाकिस्तान के साथ 1965 के युद्ध के बाद एक संधि पर हस्ताक्षर करने गए हुए थे। किताब में शास्त्री के जीवन के तमाम अनोखे क्षणों को चित्रित किया गया है। उन्होंने अपनी जिंदगी कैसे जी, किन मूल्यों को अपनाया और उन्होंने क्या सीख दी, ये सारी बातें किताब में बखूबी शामिल की गई हैं। सुनील ने लिखा है कि पाकिस्तान के साथ 1965 के युद्ध में बुरी तरह घायल हुए एक भारतीय सैनिक से जब वह मिले तो किस तरह उनकी आंखों से आंसू झरने लगे थे। सुनील उस सैनिक के हवाले से लिखते हैं, "मेरी आंखों में इसलिए आंसू नहीं बचे हैं, क्योंकि मेरी मौत करीब है, बल्कि इसलिए क्योंकि एक मेजर होने के बावजूद मैं अपने प्रधानमंत्री को सलामी देने के लिए खड़ा हो पाने में असमर्थ हूं।" उस सैनिक की इन बातों पर प्रधानमंत्री अपनी भावनाओं को रोक नहीं सके थे। सुनील कहते हैं कि उन्होंने पहली बार अपने पिता को रोते हुए देखा था। इसके अलावा किताब में शास्त्री जी के बारे में कई अन्य अनोखी बातें शामिल हैं।

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लाल बहादुर शास्त्री, सरकारी खजाना