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इस्लाम में क्या है चालीसवें का महत्व, खामेनेई की मौत पर है 40 दिन का शोक

एक ऐसा नाम...जो करीब चार दशक तक सियासत और सत्ता का मरकज रहा, अब इतिहास का हिस्सा बताया जा रहा है. खामेनेई की मौत के बाद ईरान में 40 दिन का मातम...पढ़ें क्यों मनाया जाता है 40 दिन का शोक.

इस्लाम में क्या है चालीसवें का महत्व, खामेनेई की मौत पर है 40 दिन का शोक
कर्बला की रिवायत से जुड़ा 40 दिन का मातम, ईरान में शोक का माहौल

40 Days Mourning In Islam: तेहरान की फिजा में अचानक सन्नाटा छा गया. टीवी स्क्रीन पर नम आंखों के साथ खबर पढ़ी गई और पूरे मुल्क में मातम का एलान हो गया. खामेनेई की इंतकाल के बाद ईरान में 40 दिन का मातम है. ऐसे मौके पर शोक की परंपराओं और उनके धार्मिक महत्व को समझना भी जरूरी हो जाता है. क्या आप जानते हैं क्यों मनाया जाता है 40 दिन का शोक? इसी सिलसिले में भोपाल के इमाम-ए-जुमा Molna Dr. Raziyul Hassan Haideri (मौलाना डॉ. रजियुल हसन हैदरी) ने बताया कि, इस्लाम में शोक मनाने की परंपराएं अलग-अलग समुदायों और विचारधाराओं में भिन्न रूप में दिखाई देती हैं. कहीं शोक की अवधि सीमित होती है, तो कहीं उसे विशेष आध्यात्मिक महत्व दिया जाता है.

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Photo Credit: iStock

मौलाना डॉ. रजियुल हसन हैदरी के मुताबिक, शिया समुदाय में 40वें दिन तक शोक और दुआ की परंपरा खास पहचान रखती है, जिसे 'चहलुम' या 'अरबईन' कहा जाता है. यह परंपरा ऐतिहासिक रूप से इमाम हुसैन की शहादत और कर्बला की लड़ाई से जुड़ी मानी जाती है. समय के साथ यह केवल एक ऐतिहासिक स्मरण नहीं, बल्कि सब्र, इंसानियत और सामूहिक संवेदना का प्रतीक बन गई है. इस्लाम में किसी के इंतकाल के बाद सब्र (धैर्य) और दुआ (प्रार्थना) को सबसे अहम माना गया है. कुरान और हदीस में भी यह शिक्षा दी गई है कि इंसान दुनिया में फानी है और हर रूह को मौत का स्वाद चखना है. ऐसे में शोक केवल दुख का इजहार नहीं, बल्कि खुदा की मर्जी को कबूल करने और मरहूम के लिए मगफिरत की दुआ करने का वक्त होता है.

क्यों मनाया जाएगा 40 दिन का मातम (Why 40 Days of Mourning)

शिया परंपरा में किसी शख्स की मौत के बाद 40 दिन तक शोक मनाने की रिवायत को खास अहमियत दी जाती है. इसे चहलुम या अरबईन कहा जाता है. इसका रिश्ता कर्बला की तारीखी घटना और इमाम हुसैन की शहादत से जोड़ा जाता है. 40वें दिन दुआ, मजलिस और खैरात का आयोजन किया जाता है. मकसद मरहूम की मगफिरत की दुआ करना और अहले खानदान को तसल्ली देना होता है. हालांकि, इस्लाम के अन्य मतों में इसे धार्मिक अनिवार्यता नहीं माना जाता. खामेनेई की मौत की खबर ने न सिर्फ ईरान, बल्कि पूरी दुनिया की सियासत में हलचल पैदा कर दी है. अब निगाहें इस बात पर होंगी कि, आगे हालात किस करवट बैठते हैं.

नीचे इस परंपरा से जुड़ी जानकारी संक्षेप और व्यवस्थित रूप में दी गई है.

अरबईन क्या है? (What is Arbaeen?)

'अरबईन' का अर्थ है 'चालीसवां दिन'...यह शब्द विशेष रूप से इमाम हुसैन की शहादत के 40वें दिन से जुड़ा है. कर्बला की घटना के बाद 40वें दिन उनकी याद में श्रद्धांजलि, मातम और दुआ की परंपरा शुरू हुई, जिसे शिया समुदाय में गहरी आस्था के साथ निभाया जाता है.

कर्बला की घटना से संबंध (Connection with Karbala)

680 ईस्वी में कर्बला की लड़ाई में इमाम हुसैन और उनके साथियों ने अत्याचार के खिलाफ शहादत दी. यह घटना आज के कर्बला (इराक) में हुई थी. अरबईन के अवसर पर लाखों श्रद्धालु उनकी दरगाह पर एकत्र होकर उन्हें याद करते हैं और न्याय, सब्र तथा कुर्बानी का संदेश दोहराते हैं.

40 दिन तक शोक का महत्व (Significance of 40 Days of Mourning)

शिया समाज में 40 दिनों की अवधि को आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है. ऐसा विश्वास है कि यह समय आत्मचिंतन, सब्र और दुआ का होता है, इसलिए किसी व्यक्ति के निधन के बाद 40वें दिन 'चहलुम' आयोजित कर दुआ, मजलिस और खैरात की जाती है.

इसका उद्देश्य:

  • मरहूम की मगफिरत (क्षमा) की दुआ करना.
  • परिवार को सांत्वना देना.
  • समाज को इंसानी रिश्तों और धैर्य का संदेश देना.

यह परंपरा आस्था और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है, जबकि इस्लाम के अन्य मतों में इसे धार्मिक रूप से अनिवार्य नहीं माना जाता.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की एक संयुक्त अमेरिका इजरायल हमले में मौत हो गई. बताया जा रहा है कि शनिवार को उनके दफ्तर को निशाना बनाया गया. ईरानी मीडिया ने भी इस खबर की तस्दीक की है. एक टीवी प्रेजेंटर रोते हुए यह ऐलान करते नजर आए और मुल्क में 40 दिनों के शोक की घोषणा की गई, लेकिन क्या आपको पता है कि, आखिर क्यों मनाया जाता है 40 दिन का शौक.

चार दशक का असरदार नेतृत्व (Four Decades of Powerful Leadership)

खामेनेई 1989 से ईरान के सर्वोच्च नेता थे. उन्होंने इमाम रुहोल्लाह खुमैनी के बाद यह जिम्मेदारी संभाली थी और करीब 37 साल तक देश की सियासत, न्यायपालिका और सशस्त्र बलों पर मजबूत पकड़ बनाए रखी. सरकारी चैनल प्रेस टीवी ने शोक में अपना लोगो काले रंग का कर दिया और हमले को कायराना करार दिया.

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Disclaimer: यह खबर सोशल मीडिया पर यूजर द्वारा की गई पोस्ट से तैयार की गई है. एनडीटीवी इस कंटेंट की प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं करता.

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