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एक्ट ईस्ट पॉलिसी, चीन पर लगाम, ट्रेड... PM मोदी करेंगे तीन देशों दौरा, क्या मकसद है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह तीन देशों का दौरा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की मजबूत होती रणनीतिक और आर्थिक पकड़ का जीता-जागता प्रमाण है.

एक्ट ईस्ट पॉलिसी, चीन पर लगाम, ट्रेड...  PM मोदी करेंगे तीन देशों दौरा, क्या मकसद है?
फाइल फोटो

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी छह दिवसीय दौरे पर इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जाएंगे. ये दौरा 6 जुलाई से शुरू होगा. यह प्रधानमंत्री की इंडोनेशिया की चौथी यात्रा होगी और मई 2018 में भारत-इंडोनेशिया संबंधों को व्यापक रणनीतिक साझेदारी के बाद से उनकी पहली द्विपक्षीय यात्रा होगी.

कहने को तो यह एक कूटनीतिक दौरा है, लेकिन इसके पीछे असल कहानी हिंद-प्रशांत (इंडो-पैसिफिक) क्षेत्र में चीन के बढ़ते दबदबे को संतुलित करने, व्यापारिक समझौतों की पेचीदगियों को सुलझाने और विदेशी जमीन पर पढ़ रहे या काम कर रहे भारतीयों के हितों की रक्षा करने की है.

पीएम मोदी 6 से 8 जुलाई तक इंडोनेशिया में रहेंगे, इसके बाद 8 से 10 जुलाई तक ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में रहेंगे और आखिरी पड़ाव में 10 से 11 जुलाई को न्यूजीलैंड के ऑकलैंड पहुंचेंगे. विदेश मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि यह दौरा भारत की 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' और समुद्री सुरक्षा के 'महासागर' (MAHASAGAR) विजन को एक नई रफ्तार देने के लिए डिजाइन किया गया है.

पीएम मोदी के दौरे की शुरुआत इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता से होगी. इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने जब 2025 में भारत के गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि के तौर पर शिरकत की थी, तभी इस यात्रा की जमीन तैयार हो गई थी. साल 2018 में दोनों देशों के रिश्ते 'व्यापक रणनीतिक साझेदारी' में बदले थे, लेकिन इस बार बातचीत के केंद्र में कुछ बेहद ठोस और संवेदनशील आर्थिक-सामरिक मुद्दे हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो

भौगोलिक दृष्टि से देखें तो इंडोनेशिया मलक्का जलडमरूमध्य के मुहाने पर बैठा है. यह वही समुद्री रास्ता है जहां से भारत और पूरी दुनिया का एक बड़ा व्यापारिक जहाजी बेड़ा गुजरता है. भारत इस पूरे इलाके में एक 'नियम-आधारित व्यवस्था' चाहता है ताकि चीनी नौसेना की बढ़ती आक्रामकता को संतुलित किया जा सके.

इसी रणनीतिक बातचीत के बीच भारत अपनी सांस्कृतिक सॉफ्ट पावर का भी प्रदर्शन करेगा. पीएम मोदी इंडोनेशिया के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक शहर योग्यकार्ता भी जाएंगे. यहां यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल 'प्रम्बानन मंदिर परिसर' का दौरा करेंगे. भारत का भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) इस प्राचीन मंदिर के संरक्षण और बहाली के लिए इंडोनेशिया के साथ मिलकर काम करने की योजना बना रहा है.

लेकिन इस दौरे का एक और बड़ा कूटनीतिक सस्पेंस है. वो हैं सबांग पोर्ट. विदेश मंत्रालय की प्रेस ब्रीफिंग में जब एनडीटीवी ने इंडोनेशिया के सबांग पोर्ट की प्रगति और उसकी व्यावसायिक व्यवहार्यता को लेकर सवाल पूछा.

विदेश मंत्रालय ने बताया कि दोनों देशों के विशेषज्ञों और संबंधित मंत्रालयों की एक टास्क फोर्स इस रणनीतिक महत्व के प्रोजेक्ट पर लगातार बैकग्राउंड में काम कर रही है. कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए यह भारत की समुद्री नीति का एक बेहद अहम हिस्सा है.

इसके साथ ही, भारत आसियान-भारत व्यापार समझौते (AITIGA) की समीक्षा के साथ-साथ इंडोनेशिया से व्यापारिक असंतुलन पर भी बात कर रहा है. दरअसल, भारत चाहता है कि इंडोनेशिया भारतीय सामानों के लिए 80 फीसदी टैरिफ लाइन्स में ढील दे.

ये लंबे वक्त से ठंडे बस्ते में है. चूंकि यह 10 देशों का एक बहुपक्षीय समझौता है, इसलिए भारत इस यात्रा के दौरान इंडोनेशिया को इसके लिए राजी करने की कोशिश करेगा ताकि भारतीय निर्यातकों को वहां के बाजार में सीधी और आसान पहुंच मिल सके.

जी 20 के दौरान ऑस्ट्रेलिया के पीएम अल्बनीज ने पीएम मोदी के साथ सेल्फी ली थी.

जी 20 के दौरान ऑस्ट्रेलिया के पीएम अल्बनीज ने पीएम मोदी के साथ सेल्फी ली थी.

मेलबर्न में व्यापार की पेचीदगियां और छात्रों की चिंता

इंडोनेशिया के बाद प्रधानमंत्री मोदी 8 जुलाई को ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न पहुंचेंगे. पीएन मोदी यहां तीसरे भारत-ऑस्ट्रेलिया वार्षिक शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे और प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज से द्विपक्षीय बातचीत करेंगे.

इसके साथ ही वे ऑस्ट्रेलिया की गवर्नर जनरल सैम मोस्टिन से भी मुलाकात करेंगे. भारत और ऑस्ट्रेलिया के रिश्ते पिछले कुछ सालों में क्वाड (Quad) संगठन और रक्षा सहयोग के मामले में काफी करीब आए हैं, लेकिन दोनों देशों के बीच की आर्थिक साझेदारी अभी भी अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुंच पाई है.

साल 2022 में दोनों देशों ने आर्थिक सहयोग और व्यापार समझौते (ECTA) पर दस्तखत किए थे, लेकिन अब असली चुनौती एक पूर्ण व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते (CECA) को अंतिम रूप देने की है.  इस बातचीत में भारत के लिए सबसे बड़ा पेच कृषि व्यापार और क्रिटिकल मिनरल्स (जैसे लिथियम और कोबाल्ट) को लेकर है. भारत को अपनी रिन्यूएबल ऊर्जा जरूरतों और इलेक्ट्रिक वाहनों के घरेलू निर्माण के लिए ऑस्ट्रेलिया के लिथियम की सख्त जरूरत है. 

इसके साथ ही, पिछले कुछ सालों से ठंडे बस्ते में पड़ी यूरेनियम सप्लाई को लेकर भी इस बार दोनों पक्षों के बीच बातचीत किसी मुकाम तक पहुंचने की संभावना है.

हालांकि, मेलबर्न में होने वाली इस उच्च स्तरीय बैठक के दौरान भारत सिर्फ खनिज और व्यापार पर बात नहीं करेगा. हाल के महीनों में ऑस्ट्रेलिया द्वारा स्टूडेंट वीजा की फीस में की गई बेतहाशा बढ़ोतरी (लगभग 250 फीसदी) और भारतीय छात्रों के वीजा रिजेक्शन की बढ़ती दरों को लेकर भारत में काफी चिंता और नाराजगी है. हर साल एक लाख से ज्यादा भारतीय छात्र पढ़ाई के लिए ऑस्ट्रेलिया का रुख करते हैं. 

विदेश मंत्रालय के मुताबिक, पीएम मोदी इस मुद्दे को ऑस्ट्रेलियाई नेतृत्व के सामने मजबूती से उठाएंगे ताकि वास्तविक छात्रों और पेशेवरों की आवाजाही पर कोई नकारात्मक असर न पड़े.

न्यूजीलैंड दौरे से क्या हासिल होगा?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऑस्ट्रेलिया के बाद न्यूजीलैंड के ऑकलैंड शहर पहुंचेगे. पिछले 40 सालों में पहली बार कोई भारतीय प्रधानमंत्री न्यूजीलैंड के आधिकारिक दौरे पर जा रहा है. ये दौरा 10 और 11 जुलाई तक होगी.

इससे पहले आखिरी बार साल 1986 में राजीव गांधी ऑकलैंड गए थे. न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सम के 2025 के भारत दौरे के बाद दोनों देशों के बीच रिश्तों की बर्फ पिघली थी, जिसने एक ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) का रास्ता साफ किया था.

न्यूजीलैंड में इस समय इमिग्रेशन और वर्क वीजा के नियमों को सख्त करने का एक नया प्रस्ताव चल रहा है, जिसे लेकर माना जा रहा है कि इसका सीधा निशाना भारतीय नागरिकों और आईटी प्रोफेशनल्स पर पड़ सकता है.

भारत का रुख इस मामले में बिल्कुल व्यावहारिक और साफ है. विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक, भारत इस मुद्दे को पारंपरिक 'माइग्रेशन' के रूप में नहीं बल्कि 'मोबिलिटी' (कुशल पेशेवरों की आसान आवाजाही) के चश्मे से देखता है.

भारत की दलील है कि तकनीकी विशेषज्ञों और व्यापारिक अधिकारियों के लिए वीजा नियमों को पेचीदा बनाना एक तरह से 'नॉन-टैरिफ ट्रेड बैरियर' यानी व्यापार में जानबूझकर रोड़ा अटकाने जैसा है. भारत चाहता है कि जो फ्री ट्रेड एग्रीमेंट दोनों देशों के बीच साइन हुआ है, उसका पूरा फायदा तभी मिल सकता है जब लोगों की आवाजाही को आसान बनाया जाए.

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