अमेरिका ने दस साल पहले इराक पर जो हमला किया उसके पीछे कई वजहें बताई जाती हैं। हो भी सकती हैं, लेकिन ये भी सच है कि वहां तेल न होता तो अमेरिका वहां नहीं जाता। और दस साल पहले जिस लिए अमेरिका ने इराक पर हमला किया था, क्या वह तेल अब अल कायदा के हाथों में जाने वाला है।
आतंकी संगठन आईएसआईएस ने बगदाद के पहले बैजी में मुल्क की सबसे बड़ी तेल रिफाइनरी पर कब्जा किया। क्या इराक में अभी भी ये तमाशा इसी तेल का है? या यह शिया-सुन्नी टकराव है या फिर इस टकराव के पीछे भी दरअसल सऊदी अरब और इरान के अपने क्षेत्रिय मंसूबे हैं?
अमेरिका फिर एक और लड़ाई अपने सर थोपना नहीं चाहता, लेकिन वह इराक को नजरअंदाज भी नहीं कर सकता। इन सब सवालों के बीच अमेरिका के विदेश मंत्री जॉन केरी इराक में एक संकट का एक सियासी हल निकालने की कोशिश में हैं। इराक अमेरिका के थोपे हुए युद्ध के बाद से अपने सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहा है।
प्रधानमंत्री अल मलिकी शिया हैं, जो कट्टरपंथी उनके खिलाफ खड़े हैं वह सुन्नी समुदाय के वहाबी गुट के लोग हैं। अल मलिकी से अपील की जा रही है कि वह शिया-सुन्नी के जज्बे से ऊपर उठकर एक ऐसी सरकार बने जो सबको साथ लेकर चले। आईएसआईएस का मिशन है कि इराक और सीरिया के सुन्नी इलाकों में इस्लामिक स्टेट कायम करना। मोसुल जो कि इराक का दूसरा बड़ा शहर है उस पर आईएसआईएस काबिज हो चुके हैं। हालांकि इराकी सेना का कहना है कि वह जानबूझ कर कुछ जगहों से पीछे हट गए हैं।
इस बीच, केरी के दौरे के बाद यह साफ हो रहा है कि इराक में अमेरिका की मौजूदगी बढ़ेगी। लगभग 300 अमेरिकी मिलिट्री सलाहकार इराक में पहुंचेंगे।
लेकिन इससे ज्यादा खतरा उठाने को ओबामा तैयार नहीं। ओबामा का बयान आया है कि इराकी नेताओं को ही अपने क्षेत्रिय मंसूबों से ऊपर उठकर इसका हल ढूंढ़ना होगा, वरना कोई सैनिक हल मुश्किल है।
इराक की इस समस्या के बारे में कई थियोरी है। इराक युद्ध पर किताब लिखने वाले ब्रिटिश अखबार 'दि इंडिपेंडेंट' के पूवर् पत्रकार जस्टिन हगलर कहते हैं कि इराक युद्द हमेशा से तेल को लेकर है। आईएसआईएस के लड़कों ने भी सबसे पहले मुल्क की सबसे बड़ी रिफाइनकी पर कब्जा किया, जैसा कि अमेरिकियों ने किया था। साल 2003 में जब बगदाद में कोहराम मचा था, तो भी अमरीकियों ने तेल मंत्रालय को सबसे पहले महफूज किया था, क्योंकी तेल ही पावर है।
कई जानकार कहते हैं कि अमेरिका ने इराक पर भले ही कई वजहों से चढ़ाई की हो, लेकिन अगर वहां तेल न होता तो अमेरिका वहां नहीं जाता। ईरान, इराक और सऊदी अरब मिल कर दुनिया का सबसे बड़ा तेल रिजर्व कंट्रोल करते हैं। इराक में जो हो रहा है वह सऊदी अरब और इरान के बीच का प्रॉक्सी वॉर है। सऊदी पैसों पर फल फूल रहा है सुन्नी आतंकवाद आईएसआईएस और इरान का समर्थन है इराक की शिया सरकार और शिया लड़ाकों को।
This Article is From Jun 23, 2014
इराक : हिंसा के पीछे तेल का खेल?
- Reported by: Naghma Sahar
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जून 23, 2014 21:04 pm IST
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Published On जून 23, 2014 21:02 pm IST
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Last Updated On जून 23, 2014 21:04 pm IST
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नई दिल्ली: