- ईरान और अमेरिका के बीच 60 दिनों के लिए सीजफायर पर सहमति बनी है, लेकिन स्थायी समझौते की डिटेल विवादित है
- अमेरिका चाहता है कि ईरान पहले डील पर साइन करे ताकि बाद में शर्तें तोड़ने पर कार्रवाई का अधिकार उसके पास रहे
- ईरान भी डरता है कि अगर उसने पहले साइन कर दिया तो अमेरिका वापस पलट सकता है और उसकी हार हो जाएगी
कई दिनों से ये खबर है कि ईरान और अमेरिका 60 दिनों के लिए अगले सीजफायर के लिए राजी हो गए हैं. सीजफायर की शर्तें और स्थायी समझौते की डिटेल भी सामने आ चुकी है. ट्रंप से लेकर रूबियो तक कई बार दावा कर चुके हैं कि बस अब डील होने ही वाली है. मगर डील है कि हो ही नहीं रही है. दुनिया परेशान है. कारण होर्मुज अमेरिका और ईरान ने बंद किया है. इसके कारण तेल-गैस की सप्लाई रुक गई है. कई देशों में महंगाई बढ़ गई है और जनता का गुस्सा अपनी-अपनी सरकारों के खिलाफ बढ़ रहा है.
ट्रंप क्यों नहीं कर रहे डील पर साइन
रायटर्स ने अभी कुछ दिनों पहले रिपोर्ट दी थी कि सीजफायर और स्थायी समझौते की डील वाली फाइल ट्रंप और मोजतबा खामेनेई की टेबल पर है. ट्रंप ने डील पर साइन करने के लिए अपने अधिकारियों से कुछ समय मांगा है. वो कह रहे हैं कि जल्दबाजी करना ठीक नहीं. या तो ईरान से अच्छी डील होगी या नहीं होगी. पर जब डील टेबल पर है तो अच्छी डील का क्या मतलब? दरअसल, खेल यहीं शुरू होता है. अभी ट्रंप और मोजतबा के पास जो डील की फाइल है वो सिर्फ 60 दिनों के सीजफायर की है. इसमें होर्मुज खोलने, ईरान के फ्रीज खातों को बहाल करने और ईरान को तेल बेचने पर लगे सैंक्शंस को हटाने पर सहमति बनी है. मगर इसमें तो अमेरिका को कोई फायदा है नहीं. अमेरिका ने हमला तो ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकने के लिए किया था. ट्रंप इस युद्ध को इसी बात पर अब तक सही ठहराते आए हैं. ईरान में सत्ता परिवर्तन की बात तो अब खुद ट्रंप और इजरायल भी नहीं कह रहे. अब अगर परमाणु हथियारों पर भी डील नहीं हुई तो फिर ट्रंप दुनिया को क्या बताएंगे.
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Photo Credit: White house/X
ईरान क्यों नहीं बढ़ रहा आगे
ईरान मौखिक रूप से कह रहा है कि सीजफायर के लिए वो राजी है और 60 दिनों के अंदर परमाणु हथियार से लेकर यूरेनियम तक पर चर्चा करेगा. बस ट्रंप यहीं रुक गए हैं. उन्हें लग रहा है कि अगर वो डील की फाइल पर साइन कर देते हैं और फिर ईरान अपनी बात से पलट जाता है तो उनकी किरकिरी हो जाएगी. इसीलिए वो चाहते हैं कि पहले ईरान डील पर साइन करे. जिससे उनके पास शर्तों को तोड़ने के लिए ईरान पर फिर से हमला करने की गुंजाइश बची रहे. वहीं ईरान को डर है कि अगर उसने पहले साइन कर दिया और होर्मुज खोल दिया लेकिन बाद में अमेरिका पलट गया तो उसकी तो चौतरफा हार हो जाएगी. होर्मुज खुल जाने के बाद उसके पास अमेरिका से सौदेबाजी के लिए कोई गंभीर बात नहीं रह जाएगी.

गालिबाफ ने खोल दिया राज
इसी बात को आज ईरान के अब तक मुख्य वार्ताकार के रूप में नजर आए मोहम्मद बागेर गालिबाफ ने भी खुलेआम कह दिया. सीएनएन और अलजजीरा के अनुसार, उन्होंने कहा, "ईरान दूसरे पक्ष की कार्रवाई से पहले कोई कदम नहीं उठाया जाएगा." इससे संकेत मिलता है कि तेहरान होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने और परमाणु वार्ता शुरू करने के लिए अस्थायी समझौते पर अमेरिका की कार्रवाई का इंतजार कर रहा है. गालिबाफ का कहना है कि अमेरिका के साथ वार्ता में, "हमें गारंटियों या शब्दों पर भरोसा नहीं है - केवल कार्यों से ही परखा जा सकता है" क्योंकि शांति वार्ता लंबे समय से खिंच रही है. वहीं एक अन्य अधिकारी के अनुसार, ईरान के राष्ट्रपति अपने सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई की मंजूरी मिलने से पहले समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे. तो अब देखना ये है कि पहले आप, पहले आप में सच में पहले आगे कौन आता है.
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