पिछले साल अमेरिकी विदेशी सहायता की रीढ़ माने जाने वाले 'USAID' को बंद करने के बाद अब ट्रंप प्रशासन ने अफ्रीकी देशों को स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए अरबों डॉलर की नई वित्तीय मदद की पेशकश की है. लेकिन इस बार अमेरिका सहायता की नीयत से नहीं बल्कि कारोबार की नीयत से सामने आया है. इस भारी-भरकम फंड के साथ अमेरिका ने ऐसी कड़ी शर्तें जोड़ दी हैं, जिससे कई अफ्रीकी देशों के कान खड़े हो गए हैं. घाना, जिम्बाब्वे और जाम्बिया जैसे देशों ने साफ कह दिया है, "हमें ऐसा पैसा नहीं चाहिए, जो हमारी संप्रभुता का सौदा करे."
राष्ट्रपति बनने के तुरंत बाद डोनाल्ड ट्रंप ने फिजूलखर्ची का आरोप लगाते हुए 'यूएस एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट' पर रोक लगा दी थी. इससे अफ्रीकी देशों में चल रहे कई हेल्थ प्रोग्राम अचानक ठप हो गए थे. अब अमेरिकी विदेश मंत्रालय एक नई वैश्विक स्वास्थ्य रणनीति लेकर आया है.
इस नई रणनीति के तहत अमेरिका अब एनजीओ के जरिए पैसा नहीं बांटेगा, बल्कि सीधे वहां की सरकारों से द्विपक्षीय समझौते कर रहा है. अमेरिका का तर्क है कि पुरानी व्यवस्था से अफ्रीकी देश आत्मनिर्भर नहीं बन पा रहे थे और सहायता का पैसा एनजीओ के प्रशासनिक खर्चों में ही डूब जाता था.
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने एक संसदीय समिति के सामने साफ कहा, "हमारी सहायता अब सिर्फ किसी एनजीओ को डॉलर बांटना नहीं है, जो देश में जाकर अपने कार्यक्रम थोपे. हम इन देशों को इस काबिल बना रहे हैं कि वे आगे चलकर अपनी स्वास्थ्य व्यवस्था खुद संभाल सकें."
लेकिन इस कथित मदद के पीछे जो छिपी हुई शर्तें हैं, वे बेहद चौंकाने वाली हैं.
किन शर्तों पर भड़के अफ्रीकी देश?
अमेरिका की इस नई डील का विरोध मुख्य तौर से तीन बड़ी शर्तों के कारण हो रहा है.अमेरिका चाहता है कि संबंधित देश अपने मरीजों का मेडिकल डेटा और 'पैथोजेंस' (बीमारी फैलाने वाले वायरस, बैक्टीरिया और परजीवी के सैंपल) अमेरिका को सौंपें. इस सौदे में साफ लिखा है कि इलाज और दवाएं बनाने या सप्लाई करने के लिए केवल अमेरिकी फार्मास्युटिकल और मेडिकल कंपनियों को ही प्राथमिकता दी जाएगी.
इसके अलावा अगर अमेरिका किसी देश को फंड दे रहा है, तो उस देश को भी अपने बजट से स्वास्थ्य क्षेत्र में खर्च बढ़ाना होगा. मिसाल के लिए, कीनिया के साथ हुए 2.5 बिलियन डॉलर के सौदे में अमेरिका 1.6 बिलियन डॉलर दे रहा है, जबकि कीनिया को खुद अपने पास से 5 साल में 850 मिलियन डॉलर लगाने होंगे.
जाम्बिया का खनिज, जिम्बाब्वे और घाना का डेटा
बीबीसी के अनुसार, जाम्बिया के विदेश मंत्री मुलाम्बो हैम्बे ने अमेरिकी शर्तों को लेकर कहा है कि वॉशिंगटन स्वास्थ्य सहायता के बदले उनके देश के महत्वपूर्ण खनिजों तक प्राथमिकता के आधार पर पहुंच चाहता है. अमेरिका इन दोनों समझौतों को एक साथ थोप रहा था, जिसे जाम्बिया ने ठुकरा दिया और कहा कि दोनों मुद्दों पर अलग-अलग बात होनी चाहिए.
वहीं घाना के डेटा प्रोटेक्शन कमीशन के कार्यकारी निदेशक अर्नोल्ड कवारपुओ ने कहा कि अमेरिका जिस पैमाने पर मरीजों का डेटा मांग रहा था, वह खतरनाक है. उन्होंने कहा, "डेटा हमारा होगा और नियंत्रण अमेरिकी अधिकारियों का. अगर एक बार डेटा घाना की सीमा से बाहर चला गया, तो उस पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं रहेगा. यह हमारी संप्रभुता का उल्लंघन है."
जिम्बाब्वे ने भी मेडिकल डेटा साझा करने से इनकार कर दिया. सरकार के प्रवक्ता ने तर्क दिया कि अगर हमारे डेटा या वायरस सैंपल से अमेरिकी कंपनियां कोई वैक्सीन या दवा बनाती हैं, तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि वह दवा हमारे नागरिकों को मिलेगी या नहीं.
दक्षिण अफ्रीका को ट्रंप की धमकी
अमेरिका इस समय अपनी शर्तों को लेकर किस कदर सख्त है, इसका अंदाजा दक्षिण अफ्रीका के साथ हुए बर्ताव से लगाया जा सकता है. ट्रंप प्रशासन ने दक्षिण अफ्रीका में चल रहे एड्स नियंत्रण कार्यक्रमों की पूरी फंडिंग अचानक रोक दी है.
अमेरिकी अधिकारियों का आरोप है कि दक्षिण अफ्रीका उनकी नीतिगत मांगों को पूरा करने में नाकामयाब रहा है. इसमें वहां के अल्पसंख्यक श्वेत समुदाय के साथ व्यवहार का मुद्दा भी शामिल था.
कोरोना काल से अफ्रीका ने सीखा सबक
ग्लोबल हेल्थ गवर्नेंस के जानकारों का कहना है कि पहले भी अमेरिका और अफ्रीका के संबंध असमान थे, लेकिन तब इसे 'परोपकार' के मुखौटे के पीछे छिपा लिया जाता था. अब यह पूरी तरह से एक व्यावसायिक सौदा बन चुका है.
अफ्रीकी देशों ने कोविड-19 महामारी के दौरान बड़ा सबक सीखा है. उस वक्त अफ्रीका ने पूरी दुनिया के साथ वायरस का डेटा साझा किया था, लेकिन जब वैक्सीन बनकर तैयार हुई, तो अमीर देशों ने जमाखोरी कर ली और अफ्रीकी देश अपनी जनता के लिए वैक्सीन की एक-एक खुराक को तरस गए थे. यही वजह है कि इस बार घाना, जिम्बाब्वे और जाम्बिया जैसे देश अमेरिका के सामने झुकने को तैयार नहीं हैं. हालांकि, लैटिन अमेरिका, कैरिबियन और अफ्रीका के करीब 20 देशों सहित कुल 32 देशों ने इस समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं.
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