कोरोनावायरस (Coronavirus) महामारी का उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से सोनभद्र तक के बच्चों पर बहुत असर पड़ा है. पिछले 4 महीने से ज्यादा समय से स्कूल बंद हैं. बड़े निजी स्कूलों ने ई-लर्निंग (E-Learning) शुरू कर दी है और उत्तर प्रदेश सरकार भी छात्र-छात्राओं के लिए ई-सामग्री (E-Content) पर फोकस कर रही है. हालांकि, गरीब और पिछड़े तबकों से आने वाले लाखों बच्चों के लिए स्मार्टफोन और 4जी इंटरनेट अभी सिर्फ एक सपना ही है.
सहारनपुर के 42 वर्षीय मोहम्मद चांद ने कहा, "यदि बच्चे पढ़ाई नहीं करेंगे तो आगे कैसे बढ़ेंगे? मैं उन्हें पढ़ाना चाहता हूं लेकिन मेरे पास पैसे नहीं है. मैं बहुत बेबस महसूस कर रहा हूं." इलयास महामारी के आने से पहले 10,000 रुपये महीना कमाते थे. अब वह अपने बड़े बेटे 12 साल के मोहम्मद चांद के साथ समोसे का स्टॉल लगाते हैं.
इलयास की आय अब सिर्फ 3000 रुपये महीना रह गई है. कोरोना से पहले वह अपने बेटे को उर्दू मीडियम स्कूल में पढ़ने के लिए भेजते थे. चार महीने से उनका बेटा स्टॉल पर अपने पिता की मदद कर रहा है.

चांद ने कहा, "मैं अपना दिन दुकान पर पिता की मदद करते व्यतीत करता हूं. अगर पैसे होंगे, तो मैं फिर से स्कूल जा सकूंगा वरना मुझे नहीं पता. मैं आगे पढ़ना चाहता हूं."
सोनभद्र के एक कस्बे विंढमगंज की बच्ची सप्रिया गुप्ता भी स्कूल बंद होने की वजह से अपने पिता की दुकान पर उनकी मदद कर रही है. वह टाउन के रेलने स्टेशन के बाहर अपने पिता की दुकान पर ग्राहकों को सामान देने में अपनी पिता की मदद करती है. सुप्रिया एक निजी स्कूल की 5वीं क्लास की स्टूडेंट है. महामारी की वजह से उसके पिता अजय गुप्ता की आय कम हो गई है.

सुप्रिया ने कहा, "पहले हमारी दुकान पर लेबर था लेकिन मेरे पिता ने उसे हटा दिया. हमारे पास खुद के खाने के लिए पर्याप्त नहीं है तो नौकर को कैसे पैसे देते? मेरा स्कूल अभी नहीं खुला है, ऑनलाइन क्लास छोटे कस्बों में काम नहीं करता है क्योंकि यहां पर सही से मोबाइल का नेटवर्क नहीं आता है."
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