बड़े शहरों की हाई राइज सोसायटियों में फ्लैट खरीदना हम सभी चाहते हैं. बजट बनाकर, ईएमआई का प्रेशर झेल खरीद भी लेते हैं. पर ये फैसला तब सिरदर्द बन जाता है, जब सोसायटी को चलाने के लिए चुनी रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन या मैनेजमेंट कमेटी ही मनमानी पर उतारू हो जाए. मेंटेनेंस में धांधली, पानी-बिजली की समस्या, पार्किंग को लेकर लड़ाई-झगड़े या फिर सिक्योरिटी में लापरवाही. ऐसी बहुत सारी शिकायतें हैं, जिन पर कई बार सोसायटी के प्रेसिडेंट और सेक्रेटरी कुछ एक्शन नहीं लेते. अगर आपकी सोसायटी की कमेटी भी आपकी बात नहीं सुन रही और आपको परेशान कर रही है, तो कानून आपके साथ है. हमने एडवोकेट राकेश उपाध्याय से समझा कि आरडब्ल्यूए की मनमानी के खिलाफ क्या कानूनी राइट्स हैं और इन सभी मामलों की कहां शिकायत कर सकते हैं.
कमेटी न सुने, तो क्या करें?
एडवोकेट राकेश उपाध्याय ने कहा, किसी भी कानूनी कदम उठाने से पहले आपके पास अपनी बात का लिखित में प्रूफ होना जरूरी है. इसलिए सबसे पहले अपनी समस्या को सोसायटी के ऑफिशियल लेटरहेड या ईमेल से प्रेसिडेंट और सेक्रेटरी को भेजें, बोली हुई शिकायत की कानून में कोई आधार नहीं होता. शिकायत देने के बाद कमेटी को जवाब देने या कार्रवाई करने के लिए 7 से 15 दिनों का टाइम दें. अगर इसके बाद फिर भी कोई एक्शन नहीं होता, तो आप कानून की मदद लेने के लिए फ्री हैं. हां एक बात और कि सोसायटी की एजीएम में अपनी शिकायत को जरूर रखें.
शिकायत के 3 बड़े कानूनी अधिकार
अगर सोसायटी के कमेटी मेंबर्स आपकी शिकायत को डस्टबिन में डाल देते हैं, तो एडवोकेट राकेश उपाध्याय के अनुसार आप 3 जगहों पर उनके खिलाफ कानूनी शिकंजा कस सकते हैं. पहला डिप्टी रजिस्ट्रार, दूसरा कोऑपरेटिव कोर्ट और आखिर में कंज्यूमर फोरम. चलिए एक-एक कर समझते हैं कि किन मामलों में कहां जाना बेहतर रहेगा.
डिप्टी रजिस्ट्रार
हर स्टेट के कोऑपरेटिव सोसायटीज एक्ट के जरिए एक रजिस्ट्रार या डिप्टी रजिस्ट्रार का ऑफिस होता है. क्योंकि सब हाउसिंग सोसायटियां इसी एक्ट में रजिस्टर्ड होती हैं, इसलिए रजिस्ट्रार के पास इन्हें सस्पेंड करने तक की पावर होती है. सवाल ये कि कब जाएं. एडवोकेट के अनुसार अगर सोसायटी फंड में धोखाधड़ी हो रही हो, इलेक्शन टाइम से नहीं हो रहे हों, तो डिप्टी रजिस्ट्रार मामले की जांच करके कमेटी को हटा सकता है.
कोऑपरेटिव कोर्ट
अगर मामला लड़ाई-झगड़े, मेंटेनेंस चार्ज की गलत वसूली, पार्किंग अलॉटमेंट में समस्या या किसी मेंबर को जानबूझकर परेशान करने का है, तो एक्सपर्ट राकेश उपाध्याय के अनुसार आप कोऑपरेटिव कोर्ट जा सकते हैं. यहां सिविल कोर्ट के मुकाबले मामलों का निपटारा जल्दी हो जाता है.
कंज्यूमर फोरम
फ्लैट ओनर होने के नाते आप सोसायटी को मेंटेनेंस चार्ज देते हैं तो आप एक कंज्यूमर हैं और सोसायटी कमेटी आपको सर्विस दे रही है. इसलिए अगर लिफ्ट खराब है, सिक्योरिटी गार्ड नहीं हैं, सफाई नहीं हो रही है या पानी की सप्लाई रोकी है तो एडवोकेट राकेश उपाध्याय के अनुसार, आप कंज्यूमर कोर्ट जा सकते हैं. कोर्ट ना सिर्फ कमेटी को काम सुधारने का आदेश देगा, बल्कि आपको हुई समस्या के लिए मुआवजा भी दिलाएगा.
कब जाएं पुलिस और सिविल कोर्ट के पास?
एडवोकेट राकेश उपाध्याय ने साफ कहा कि अगर सोसायटी आपके साथ गाली-गलौज कर रही है, धमकी दे रहे हैं, पानी-बिजली का कनेक्शन गलत तरीके से काट देते हैं, तो ये सीधे-सीधे आपराधिक मामला है. ऐसी कंडीशन में आप पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज करा सकते हैं. साथ ही, इलीगल कंस्ट्रक्शन को रुकवाने या स्टे ऑर्डर लेने के लिए आप सिविल कोर्ट में इंजेक्शन सूट भी फाइल कर सकते हैं.
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