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एशियन गेम्स 2026: पैरा एथलेटिक्स में भारत का जलवा, 14 पदक जीते, निशाद ने रचा डबल गोल्ड का इतिहास

पैरा एशियन गेम्स के दूसरे दिन भारतीय दल ने जबरदस्त प्रदर्शन करते हुए 14 पदक जीते. निषाद ने एक और गोल्ड जीतकर इतिहास रच दिया.

एशियन गेम्स 2026: पैरा एथलेटिक्स में भारत का जलवा, 14 पदक जीते, निशाद ने रचा डबल गोल्ड का इतिहास
एशियन गेम्स 2026: पैरा एथलेटिक्स में भारत का जलवा

भारतीय पैरा ट्रैक और फील्ड एथलीटों ने 5 स्वर्ण सहित कुल 14 पदक जीते. मंगलवार को निषाद कुमार एशियाई पैरा खेलों के एक ही संस्करण में दो स्वर्ण पदक जीतने वाले देश के तीसरे एथलीट बन गए. प्रतियोगिता के दूसरे दिन भारत ने 5 स्वर्ण, 4 रजत और 5 कांस्य पदक अपने नाम किए. इसके साथ ही पैरा एथलेटिक्स में भारत के पदकों की कुल संख्या 20 हो गई है, जो चीन के 23 पदकों (13 स्वर्ण, 5 रजत, 5 कांस्य) के बाद अब तक का दूसरा सबसे अच्छा प्रदर्शन है.

घाट काटने वाली मशीन से कटा हाथ: निषाद

निषाद ने पुरुषों की हाई जंप T47 स्पर्धा में पहला स्थान हासिल किया. इसके साथ ही वे पैरा-धावक अंकुर धामा और बिना हाथों वाली तीरंदाज शीतल देवी के बाद, एशियाई पैरा खेलों के एक ही संस्करण में दो स्वर्ण पदक जीतने वाले तीसरे भारतीय बन गए. उन्होंने सोमवार को लॉन्ग जंप T47 स्पर्धा में भी स्वर्ण पदक जीता था.

मंगलवार को निषाद ने 2.04 मीटर की ऊंचाई पार करके स्वर्ण पदक जीता और खेलों का एक नया रिकॉर्ड बनाया. इससे पहले, अंकुर (पुरुषों की 5000m T11 और 1500m T11 स्पर्धाओं में) और शीतल (महिलाओं की व्यक्तिगत कंपाउंड ओपन और मिक्स्ड टीम कंपाउंड ओपन स्पर्धाओं में) ने भी दो-दो स्वर्ण पदक जीते थे. T47 क्लासिफिकेशन उन एथलीटों के लिए है जिनके ऊपरी अंगों (हाथों) में कोई शारीरिक कमी या विकलांगता होती है. 

हिमाचल प्रदेश के अंब में अपने परिवार के खेत पर, जब निषाद सिर्फ छह साल के थे, तब घास काटने वाली मशीन की चपेट में आने से उनका दाहिना हाथ कट गया था. मंगलवार को भारत के लिए स्वर्ण पदकों की शुरुआत दीप्ति जीवनजी ने की. उन्होंने महिलाओं की 400m T20 स्पर्धा में 56.36 सेकंड का समय निकालकर खेलों का नया रिकॉर्ड बनाया और लगातार दूसरी बार एशियाई पैरा खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर अपना दबदबा कायम रखा.

जन्म से बौद्धिक अक्षमता से जूझ रहीं दीप्ति

तेलंगाना की रहने वाली 23 वर्षीय दीप्ति के नाम एशियाई रिकॉर्ड भी दर्ज है. वे पैरा वर्ल्ड चैंपियनशिप में दो बार पदक जीत चुकी हैं, जिसमें 2024 में जीता गया स्वर्ण पदक भी शामिल है. T20 क्लासिफिकेशन उन एथलीटों के लिए है जिनमें बौद्धिक अक्षमता होती है. 

तेलंगाना के वारंगल जिले के एक दूर-दराज के गांव से आने वाली दीप्ति के माता-पिता छोटे किसान हैं, जो अपने गांव में दिहाड़ी मजदूर के तौर पर भी काम करते थे. दौड़ने में उनकी प्रतिभा का पता सबसे पहले उनके स्कूल के एक शारीरिक शिक्षा शिक्षक को चला. बाद में उन्हें बैडमिंटन के दिग्गज पुलेला गोपीचंद का समर्थन मिला, जिन्होंने उनकी बौद्धिक अक्षमता की जांच कराने का सुझाव दिया.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार शानदार प्रदर्शन करके चर्चा में आने के बाद, दीप्ति ने बताया कि उनके माता-पिता ने उनके सपनों को पूरा करने में कितनी बड़ी भूमिका निभाई. जबकि, उनका समर्थन करने के कारण गाँव वालों ने उनके माता-पिता को कई ताने भी दिए थे.

समय से पहले हुआ जन्म, सात महीने रहना पड़ा इनक्यूबेटर में

अनुभवी धाविका सिमरन ने एक नया गेम्स रिकॉर्ड बनाते हुए अपना पहला स्वर्ण पदक जीता, जबकि उनकी साथी खिलाड़ी तेजलबेन दामोर ने महिलाओं की 200 मीटर T12 स्पर्धा में कांस्य पदक हासिल किया. सिमरन ने 24.80 सेकंड का समय लिया, वहीं इस बड़े महाद्वीपीय टूर्नामेंट में पहली बार हिस्सा ले रहीं तेजलबेन 25.23 सेकंड के समय के साथ तीसरे स्थान पर रहीं. T12 श्रेणी में वे एथलीट आते हैं जिनकी दृष्टि क्षमता मध्यम रूप से प्रभावित होती है.

26 वर्षीय सिमरन, जिन्होंने 2024 पैरालंपिक में कांस्य पदक जीता था, अब अपने नए गाइड शिवम के साथ वापसी कर रही हैं. इससे पहले उनके गाइड रहे उमर सैफी को डोपिंग नियमों के उल्लंघन के कारण प्रतिबंधित कर दिया गया था.

दिल्ली के बुराड़ी गांव की रहने वाली सिमरन का जन्म समय से पहले हुआ था और उनकी दृष्टि कमजोर है, जिसके कारण वह 10 मीटर से आगे ठीक से नहीं देख पातीं. समय से पहले जन्म होने के कारण उन्हें सात महीने तक इनक्यूबेटर में रखा गया था. लेकिन अपने दृढ़ संकल्प और हौसले के दम पर, वह देश की शीर्ष पैरा-एथलीट बन गईं. बचपन में दृष्टि दोष के कारण लोगों ने उनका मज़ाक भी उड़ाया था.

16 साल की उम्र में एक हादसे में बदली सूरमा की जिंदगी

पुरुषों की डिस्कस थ्रो (F51/52/53 संयुक्त स्पर्धा) में, प्रणव सूरमा ने एशियाई रिकॉर्ड के साथ स्वर्ण पदक जीता, जबकि राम रतन सिंह ने रजत पदक हासिल किया. इस तरह, इस स्पर्धा में भारत के खिलाड़ियों ने पहला और दूसरा स्थान हासिल किया. 

32 वर्षीय सूरमा, जिन्होंने पिछले एशियाई पैरा खेलों और 2024 पैरालंपिक में क्लब थ्रो F51 इवेंट में स्वर्ण पदक जीता था, ने अपने चौथे प्रयास में डिस्कस को 11.66 मीटर की दूरी तक फेंककर पहला स्थान हासिल किया और एक नया एशियाई रिकॉर्ड बनाया.

16 साल की उम्र में सूरमा की जिंदगी पूरी तरह बदल गई, जब उनके सिर पर सीमेंट की एक शीट गिर गई. इससे उनकी रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट आई, जिसके कारण वे लकवाग्रस्त हो गए. डॉक्टरों ने उनसे कहा कि वे अब कभी चल नहीं पाएंगे, और उन्हें छह महीने अस्पताल में बिताने पड़े.

फरीदाबाद के रहने वाले सूरमा को यह स्वीकार करने में कई साल लग गए कि व्हीलचेयर अब जीवन भर उनकी साथी रहेगी. सकारात्मक सोच बनाए रखने के लिए, सूरमा ने ध्यान (मेडिटेशन) करना शुरू किया. अस्पताल में रहने के दौरान, उनके दोस्तों ने उन्हें पैरा स्पोर्ट्स के बारे में बताया, जिससे उनमें एक नया जुनून जाग उठा.

व्हीलचेयर पर होने के बावजूद, सूरमा ने पढ़ाई में बेहतरीन प्रदर्शन किया. उन्होंने 12वीं बोर्ड परीक्षा में 91.2 प्रतिशत अंक हासिल किए और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से कॉमर्स में पोस्टग्रेजुएट डिग्री पूरी की. बाद में, उन्हें एक बैंक में असिस्टेंट मैनेजर की नौकरी मिल गई. कभी क्रिकेटर रहे सूरमा ने अलग-अलग पैरा स्पोर्ट्स में हाथ आजमाया और 'मिस्टर व्हीलचेयर इंडिया' इवेंट में भी हिस्सा लिया.

हादसे के बाद बदली देवेंद्र कुमार की जिंदगी

पुरुषों के डिस्कस थ्रो F44/64 इवेंट में भारतीयों ने तीनों पदक अपने नाम किए. चार खिलाड़ियों के इस मुकाबले में देवेंद्र कुमार ने स्वर्ण पदक जीता. 32 वर्षीय देवेंद्र ने 49.71 मीटर की दूरी तक डिस्कस फेंककर स्वर्ण पदक हासिल किया, जबकि राकेश और प्रदीप कुमार ने क्रमशः रजत और कांस्य पदक जीते.

देवेंद्र का जन्म हरियाणा के चरखी दादरी जिले के किश्कंधा गांव में हुआ था. 21 साल की उम्र में, वे और उनकी मां एक बड़े हादसे का शिकार हो गए, जिसमें देवेंद्र का बायां पैर टूट गया. कई फ्रैक्चर होने के कारण उनके बाएं कूल्हे का ऑपरेशन करना पड़ा. वे अगले दो महीने तक अस्पताल में रहे.

F44 और F64 उन एथलीटों के वर्गीकरण हैं, जिनके निचले अंगों में कोई कमी या विकलांगता है. F44 एथलीट बिना किसी कृत्रिम अंग (प्रोस्थेसिस) के प्रतिस्पर्धा करते हैं, जबकि F64 एथलीट कृत्रिम अंग के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं. प्रीति पाल ने महिलाओं की 200 मीटर T35 स्पर्धा में रजत पदक जीता. प्रवीण शर्मा (पुरुष शॉट पुट F11), आयुष वर्मा (पुरुष जैवलिन F53/54) और होकाटो होटोज़े सेमा (पुरुष शॉट पुट F56/57) ने कांस्य पदक जीते.

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