Bindiyarani's inspirational story: ग्लास्गो में खेले जा रहे कॉमनवेल्थ खेलों के पांचवां सोमवार का दिन भारत की वीमेंस वेटलिफ्टिंग पावर के नाम रहा. पहले 53 किग्रा वजन में ज्ञानेश्वरी यादव ने भारत को सिल्वर मेडल से नवाजा, तो कुछ ही घंटे बाद मणिपुर के इम्फाल जिले से आने वालीं सोरोखैबम बिंदियारानी देवी ने 58 किलोग्राम में एक और पदक दिलाते हुए राज्य के साथ ही करोड़ों भारतीय खेलप्रेमियों का सीना गौरव से चौड़ा कर दिया. पदकवीर दोनों ही महिला वेटलिफ्टरों में जो बात कॉमन रही, वह यह कि दोनों ही बहुत ही गरीब परिवार से निकल कर इस मुकाम तक पहुंचीं. और दोनों को ही पदक की यात्रा तक बहुत ही ज्यादा संघर्ष करना पड़ा. बिंदियारानी यूं तो 2022 संस्करण में भी रजत पदक अपने नाम कर चुकी हैं, लेकिन तब उन्होंने 55 किग्रा में पदक जीता था. और इस बार मणिपुर की एथलीट ने 58 किग्रा में झंडा गाड़ा है.
Ms. Bindiyarani Devi of Indian Railways, weightlifter working with NFR has brought laurels for the country by winning Bronze Medal in 55 kg category at the IWF World Cup 2024 being held at Phuket Thailand from 28/03/2024 to 11/04/2024. pic.twitter.com/7NMofN0m1c
— Northeast Frontier Railway (@RailNf) April 4, 2024
पिता चलाते हैं परचून की दुकान
बिंदियारानी के पिता पिता एक किसान हैं और परिवार के भरण-पोषण के लिए एक छोटी सी परचून (ग्रॉसरी) की दुकान भी चलाते हैं. उनके परिवार में माता-पिता के अलावा भाई-बहन हैं. और एक साधारण और सीमित आय वाले परिवार से ताल्लुक रखने के बावजूद उन्होंने अपने सपनों को कभी टूटने नहीं दिया. बचपन से ही खेलकूद में गहरी रुचि रखने वाली बिंदियारानी ने शुरुआत में साल 2008 से 2012 तक ताईक्वांडो में हाथ आजमाया. लेकिन बाद में उनकी शारीरिक बनावट और कद-काठी को देखते हुए उन्हें वेटलिफ्टिंग को चुनने की सलाह मिली, तो साल 2013 से पूरी तरह से उन्होंने पूरी तरह खुद को इस खेल के लिए समर्पित कर दिया.
त्याग और कड़ा संघर्ष नहीं डिगा सका हौसला
बिंदियारानी को करियर में गरीबी और संघर्ष से अलग चोटों से भी लगातार लड़ाई लड़नी पड़ी है. अनेकों बार बिंदियारानी के करियर में कई बार गंभीर चोटों ने उनकी राह में अड़ंगा डाला. घुटने की गंभीर चोट और रिहैबिलिटेशन (पुनर्वास) के दौर से गुजरते हुए उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से भारी संघर्ष करना पड़ा. चोटों के कारण उनका अभ्यास और वजन वर्ग भी प्रभावित हुआ, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और हर बार मजबूती से वापसी की.
वहीं, मणिपुर में उत्पन्न सामाजिक और आंतरिक अशांति का माहौल भी उनके और उनके परिवार के लिए मानसिक रूप से एक कठिन दौर रहा, क्योंकि हिंसा की आंच उनके क्षेत्र तक भी पहुंची थी, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अपनी एकाग्रता भंग नहीं होने दी और पूरा ध्यान देश के लिए पदक जीतने पर केंद्रित रखा.
करियर के टर्निंग प्वाइंट्स
बिंदियारानी के करियर में बड़ा बदलाव तब आया, जब इम्फाल स्थित भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के नॉर्थ ईस्टर्न रीजनल सेंटर से शुरुआती ट्रेनिंग लेने के बाद उनकी प्रतिभा को देखते हुए उनका चयन इम्फाल स्थित नेशनल सेंटर ऑफ एक्सलेंस (NCOE) में हो गया. और फिर कड़ी मेहनत के बाद 2019 में उनका चयन पटियाला स्थित SAI के राष्ट्रीय शिविर में हुआ, जिसने उनके अंतरराष्ट्रीय करियर को एक नई दिशा दी.
वहीं, भविष्य की रणनीति और चोटों को देखते हुए बिंदियारानी ने अपने वजन को लेक भी बड़ा फैसला लिया. इन्होंने 55 से 58 किग्रा भार वर्ग में जाने का फैसला लिया, तो यह उनके लिए एकदम से काम कर गया. इस वेट कैटेगिरी में बिंदियारानी ने ऐतिहासिक सफलताएं हासिल की. और एक बार इस वेट में प्रवेश करने के बाद सोमवार को ग्लास्गो में कांस्य पदक झटकने तक बिंदियारानी की सफलता जारी है.
प्रमुख उपलब्धियां
बिंदियारानी देवी ने विभिन्न प्रतिष्ठित मंचों पर भारत के लिए कई पदक जीते हैं. उन्होंने साल 2022 में बर्मिंघम में आयोजत राष्ट्रकुल खेलों में 55 किग्रा वर्ग में रजत पदक जीता. इस दौरान उन्होंने क्लीन एवं जर्क में 116 किग्रा वजन उठाकर कॉमनवेल्थ गेम्स का रिकॉर्ड और राष्ट्रीय रिकॉर्ड अपने नाम किया था. वहीं, साल 2025 में राष्ट्रकुल वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में 58 किग्रा में उन्होंने कुल 206 किग्रा (91 किग्रा स्नैच + 115 किग्रा क्लीन एंड जर्क) का अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए रजत पदक जीता.
इनसे अलग साल 2021 में ताशकंद में आयोजत विश्व भारोत्तोलन चैंपियनशिप में महिलाओं के 55 किग्रा वर्ग के क्लीन एंड जर्क इवेंट में गोल्ड पर भी कब्जा किया, तो अगले ही साल आईडब्ल्यूएफ विश्व कप में कांस्य पदक हासिल किया. इनसे अलग बिंदियारानी कई राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में कई नेशनल रिकॉर्ड अपने नाम किए हैं.
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