
शरद यादव मायावती के साथ गोंडवाणा गणतंत्र पार्टी और कई दलों को साथ लाकर तीसरे मोर्चे का विकल्प बना सकते हैं.
भोपाल:
क्या मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए केंद्र की तरह छोटे दल तीसरे मोर्चे की संभावना तलाश रहे हैं, भोपाल में सियासी सरगर्मी देखें तो जवाब है हां. माना जा रहा है कि बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस के बीच साझीदारी अब मुश्किल हो चली है, ऐसे में शरद यादव मायावती के साथ गोंडवाणा गणतंत्र पार्टी और कई दलों को साथ लाकर तीसरे मोर्चे का विकल्प बना सकते हैं. मध्यप्रदेश में लगभग पौने दो करोड़ की आदिवासियों की आबादी में गोंड का आधार 80 फीसद तक है. इनकी संख्या बड़ी है, लेकिन राजनीतिक भागीदारी कम. कोशिश थी कि गोंडवाणा गणतंत्र पार्टी कांग्रेस के साथ गठबंधन करें, लेकिन सूत्रों के मुताबिक आदिवासी मुख्यमंत्री सहित 10 मांगों पर बात नहीं बनी लिहाज़ा पार्टी अलग रास्ते तलाश रही है.
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पार्टी के राष्ट्रीय सचिव बलबीर सिंह तोमर ने कहा छोटे-छोटे दल हैं, बहुजन समाज पार्टी है ऐसा तीसरा विकल्प मध्यप्रदेश में तय करेंगे. बिल्कुल कोई समझौता नहीं होगा अगर आदिवासी मुख्यमंत्री के नाम का ऐलान नहीं होता है, जो आदिवासी मुख्यमंत्री पर सहमत होगा हम उसके साथ जाएंगे. तीसरे मोर्चे की तरफ है बात आखिरी चरणों में है. वैसे भोपाल में बहुजन समाज पार्टी के भोपाल दफ्तर में सन्नाटा है. सूत्र कह रहे हैं, मध्यप्रदेश में समझौता तभी संभव है जब कांग्रेस बसपा को राजस्थान, छत्तीसगढ़ में भी साथ ले, लेकिन कांग्रेस फिलहाल इस प्रस्ताव पर गंभीर नहीं.
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भोपाल में नेता कुछ कहने से बच रहे हैं, क्योंकि पार्टी प्रमुख मायावती ने साफ कहा है कि उत्तरप्रदेश और देश के अन्य राज्यों में जबतक चुनावी गठबंधन की घोषणा नहीं हो जाती है तबतक पार्टी के लोगों को गठबंधन स्तर पर कोई बात नहीं करनी चाहिये. वहीं कांग्रेस प्रवक्ता मानक अग्रवाल ने कहा ये सब तय होगा चुनाव के समय. कमलनाथ जी कई लोगों से चर्चा कर रहे हैं, इन सब बातों को अमलीजामा तब पहनाएंगे. गोंड छिंदवाड़ा, मंडला, बालाघाट, डिंडौरी, शहडोल, पन्ना, बैतूल में खासा असर रखते हैं. वहीं बहुजन समाज पार्टी चंबल और विंध्य में दम दिखाती है.
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मध्य प्रदेश में अनुसूचित जाति की आबादी 15.2 फीसदी, और अनुसूचित जनजाति की आबादी 20.8 फीसद है. सूबे में अनुसूचित जाति की 35 सीटें हैं, जिसमें फिलहाल 28 पर बीजेपी काबिज है. 47 अनुसूचित जनजाति बहुत सीटों में 32 पर बीजेपी का कब्जा है. बसपा को 7 फीसद वोट मिलते रहे हैं, उसके पास 4 विधायक हैं. जीजीपी और छोटे दलों को लगभग 6 फीसद वोट मिले थे. चुनाव में क्षेत्रीय दलों के चुनावी गणित बड़े दल के प्रत्याशियों के हार-जीत के समीकरण को बिगाड़ने में बड़ा रोल अदा करते हैं, लेकिन बीजेपी इनसे बेफिक्र है. बीजेपी प्रवक्ता राहुल कोठारी ने कहा कि भ्रष्टाचारी कांग्रेस और बलात्कारी बसपा का गठबंधन हुआ तो फायदा बीजेपी को मिलेगा, रही बात छोटे दलों की तो उनका प्रभाव इसलिए खत्म हो गया है, क्योंकि बीजेपी ने सेवा के माध्यम से अपनी पैठ बना ली है. बीएसपी यूपी में मजबूत होने के कारण सीमावर्ती इलाकों में मेहनत करती थी. यूपी में साफ होने के कारण यहां भी जनाधार नहीं है, कांग्रेस के पास जनाधार नहीं है इसलिए गठबंधन करना चाह रही है, जिसका कोई फायदा नहीं मिलेगा.
VIDEO: मध्यप्रदेश में चुनावी साल में वादों का पिटारा
पिछले चुनावों में कई सीटों पर बीजेपी और कांग्रेस के जीत हार का अंतर पांच सौ से लेकर 2 हजार वोट का था, जिसे तीसरा मोर्चा एकजुट होकर प्रभावित करने की ताकत रखता है.
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पार्टी के राष्ट्रीय सचिव बलबीर सिंह तोमर ने कहा छोटे-छोटे दल हैं, बहुजन समाज पार्टी है ऐसा तीसरा विकल्प मध्यप्रदेश में तय करेंगे. बिल्कुल कोई समझौता नहीं होगा अगर आदिवासी मुख्यमंत्री के नाम का ऐलान नहीं होता है, जो आदिवासी मुख्यमंत्री पर सहमत होगा हम उसके साथ जाएंगे. तीसरे मोर्चे की तरफ है बात आखिरी चरणों में है. वैसे भोपाल में बहुजन समाज पार्टी के भोपाल दफ्तर में सन्नाटा है. सूत्र कह रहे हैं, मध्यप्रदेश में समझौता तभी संभव है जब कांग्रेस बसपा को राजस्थान, छत्तीसगढ़ में भी साथ ले, लेकिन कांग्रेस फिलहाल इस प्रस्ताव पर गंभीर नहीं.
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भोपाल में नेता कुछ कहने से बच रहे हैं, क्योंकि पार्टी प्रमुख मायावती ने साफ कहा है कि उत्तरप्रदेश और देश के अन्य राज्यों में जबतक चुनावी गठबंधन की घोषणा नहीं हो जाती है तबतक पार्टी के लोगों को गठबंधन स्तर पर कोई बात नहीं करनी चाहिये. वहीं कांग्रेस प्रवक्ता मानक अग्रवाल ने कहा ये सब तय होगा चुनाव के समय. कमलनाथ जी कई लोगों से चर्चा कर रहे हैं, इन सब बातों को अमलीजामा तब पहनाएंगे. गोंड छिंदवाड़ा, मंडला, बालाघाट, डिंडौरी, शहडोल, पन्ना, बैतूल में खासा असर रखते हैं. वहीं बहुजन समाज पार्टी चंबल और विंध्य में दम दिखाती है.
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पिछले चुनावों में कई सीटों पर बीजेपी और कांग्रेस के जीत हार का अंतर पांच सौ से लेकर 2 हजार वोट का था, जिसे तीसरा मोर्चा एकजुट होकर प्रभावित करने की ताकत रखता है.
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