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Bhopal Metro: रोजाना का खर्च 8 लाख, कमाई स‍िर्फ 15 हजार रुपए, 3 महीने में तीसरी बार घटे फेरे

Bhopal Metro की शुरुआत के कुछ ही महीनों में आमदनी और खर्च के बीच बड़ा अंतर सामने आया है. रोज़ाना 8 लाख के खर्च के मुकाबले सिर्फ 13–15 हजार की कमाई हो रही है, जिससे मेट्रो भारी घाटे में है और फेरे लगातार घटाए जा रहे हैं.

Bhopal Metro: रोजाना का खर्च 8 लाख, कमाई स‍िर्फ 15 हजार रुपए, 3 महीने में तीसरी बार घटे फेरे

 Bhopal Metro: भोपाल मेट्रो में आपका स्वागत है…लेकिन अब सवाल यह उठने लगा है कि आखिर इस सेवा का इस्तेमाल कौन कर रहा है? 20 दिसंबर 2025 को शुरू हुई भोपाल मेट्रो महज तीन महीनों में ही आर्थिक संकट का सामना कर रही है. हालत यह है कि जहां रोज़ाना इसके संचालन पर करीब 8 लाख रुपये खर्च हो रहे हैं, वहीं आमदनी महज 13 से 15 हजार रुपये तक सिमट गई है. यात्रियों की लगातार घटती संख्या ने मेट्रो की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है, जिसके चलते इसके फेरे और संचालन समय में तीसरी बार बदलाव करना पड़ा है. पढ़‍िए हरप्रीत की र‍िपोर्ट.

भोपाल मेट्रो स्टेशन पर घटती भीड़

भोपाल के मेट्रो स्टेशन इन दिनों सूने नजर आ रहे हैं. कोच लगभग खाली चल रहे हैं और प्लेटफॉर्म पर यात्रियों की कमी साफ दिखाई देती है. शुरुआत में मेट्रो को लेकर लोगों में उत्साह था और पहले कुछ दिनों में करीब 7 हजार यात्री रोज़ाना सफर कर रहे थे. इससे उम्मीद जगी थी कि आने वाले समय में संख्या और बढ़ेगी, लेकिन इसके उलट यात्रियों की संख्या लगातार गिरती चली गई.

अब स्थिति यह है कि भोपाल मेट्रो में रोज़ाना सिर्फ 100 से 150 यात्री ही सफर कर रहे हैं. यात्रियों की इस भारी कमी ने मेट्रो प्रबंधन को अपने ऑपरेशनल फैसलों पर बार-बार पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है.

तीन महीने में तीसरी बार बदला भोपाल मेट्रो का शेड्यूल

यात्रियों की घटती संख्या का सीधा असर मेट्रो के फेरे और समय पर पड़ा है. शुरुआत में मेट्रो रोज़ाना 17 फेरे लगाती थी. इसके बाद जनवरी में यह संख्या घटाकर 13 कर दी गई. अब एक बार फिर कटौती करते हुए इसे घटाकर सिर्फ 9 फेरे कर दिया गया है.

सिर्फ फेरे ही नहीं, बल्कि संचालन समय में भी बड़ा बदलाव किया गया है. अब मेट्रो सेवा सुबह 11:30 बजे से शाम 4:30 बजे तक ही सीमित कर दी गई है, जो दर्शाता है कि मांग के अनुसार सेवा को सीमित किया जा रहा है.

खर्च और कमाई के बीच बड़ी खाई

भोपाल मेट्रो इस समय भारी आर्थिक घाटे से जूझ रही है. रोज़ाना करीब 8 लाख रुपये बिजली, स्टाफ, रखरखाव और अन्य संचालन पर खर्च हो रहे हैं, जबकि आमदनी महज 13 से 15 हजार रुपये तक सीमित है. खर्च और आय के बीच यह बड़ा अंतर परियोजना की व्यवहारिकता पर सवाल खड़े कर रहा है.

क्यों नहीं बढ़ रहे यात्री?

विशेषज्ञों की मानें तो मेट्रो के सीमित रूट और कमजोर कनेक्टिविटी इसकी सबसे बड़ी वजह है. जब तक मेट्रो सीधे रिहायशी इलाकों, बाजारों और प्रमुख दफ्तरों को नहीं जोड़ेगी, तब तक यह आम लोगों के लिए आकर्षक विकल्प नहीं बन पाएगी. इसके अलावा, अन्य परिवहन साधनों के साथ तालमेल और यात्रियों की जरूरत के अनुसार समय-सारणी का अभाव भी एक बड़ी समस्या है.

यदि भोपाल मेट्रो को शहर के रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बनाना है, तो रूट विस्तार, बेहतर कनेक्टिविटी और सुविधाजनक टाइमिंग पर काम करना होगा. फिलहाल भोपाल मेट्रो की रफ्तार पर घाटे का ब्रेक लगा हुआ है. यह स्थिति अस्थायी है या लंबे समय तक बनी रहेगी, इसका जवाब आने वाला समय देगा.

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