Parenting Tips: जब बच्चा थोड़ा बड़ा या यूं कहें थोड़ा समझदार होने लगता है तो माता-पिता के साथ अक्सर किसी न किसी बात को लेकर नोकझोंक होना आम बात है. अक्सर बहुत से माता-पिता के साथ ऐसा होता है कि उनका टीनएजर बच्चा किसी समस्या के बारे में बताता है और आप उसे कोई समाधान बताते हैं, तो वे तुरंत कहते हैं, मुझे पता है या आप नहीं समझेंगे. ऐसी स्थिति में हो सकता है आपकी सलाह गलत न हो, हो सकता है कि वे सलाह नहीं मांग रहे थे. एक टीनएजर घर आता है और कहता है, "मैं अब इसे और नहीं झेल सकता". हो सकता है कि किसी पक्के दोस्त से झगड़ा हुआ हो, हो सकता है कि एक ही हफ्ते में कई एग्ज़ाम हों या फिर कोई अन्य काम हों. वे आपको इसलिए बताते हैं क्योंकि वे परेशान हैं और कुछ ही सेकंड में, माता-पिता की समस्या सुलझाने की मशीनरी शुरू हो जाती है और बच्चे को समझाना शुरू कर देते हैं.
टीनएजर्स माता-पिता की बात क्यों नहीं मानते?
टीनएजर के विकास पर हुई रिसर्च से अब यह बात साफ हो रही है कि टीनएजर अक्सर वह नहीं चाहते जो माता-पिता सोचते हैं. हो सकता है कि वे मदद पाने से पहले चाहते हों कि उनकी बात सुनी जाए, क्योंकि कई बार बच्चों को ऐसा लगता है कि उनकी भावनाओं को समझने के बजाय उनकी परेशानी को छोटा माना जा रहा है. ऐसे समय में उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत किसी सलाह की नहीं, बल्कि इस एहसास की होती है कि कोई उनकी बात ध्यान से सुन रहा है और उनकी भावनाओं को समझ रहा है.
रिसर्च से जानिए पेरेंट्स क्या करें?
पबमेड में प्रकाशित एक रिसर्च के मुताबिक, 13 से 16 साल के वे टीनएजर, जिन्हें लगता था कि उनके माता-पिता उनकी बात ध्यान से सुनते हैं, वे खुद को अधिक खुश और बेहतर महसूस करते थे. साथ ही, वे भविष्य में भी अपनी बातें माता-पिता से शेयर करने के लिए ज्यादा तैयार रहते थे. इसकी वजह यह है कि टीनएजर उम्र में बच्चों को एक ओर माता-पिता से जुड़ाव चाहिए होता है, वहीं दूसरी ओर वे अपनी स्वतंत्र पहचान भी बनाना चाहते हैं.
भारतीय टीनएजर्स और उनके माता-पिता पर 2026 में हुई एक स्टडी में पाया गया कि माता-पिता का बच्चों की जिंदगी में शामिल होना दो तरह से महसूस किया जा सकता है. स्पोर्ट के तौर पर और रोक-टोक के तौर पर. रिसर्चर्स ने माता-पिता के बीच एक उलझन देखी, वे चाहते थे कि उनके बच्चे काबिल बनें, लेकिन साथ ही वे उनके फैसलों पर कंट्रोल भी रखना चाहते थे, खासकर पढ़ाई-लिखाई से जुड़े मामलों में. माता-पिता चाहते हैं कि बच्चा सफल बने और सही फैसले ले, इसलिए वे उसकी मदद करना चाहते हैं, लेकिन कई बार बच्चे को लगता है कि उस पर भरोसा नहीं किया जा रहा है या उसे खुद निर्णय लेने की आजादी नहीं मिल रही.
सलाह देने से पहले समझें कि बच्चे को क्या चाहिए?
एक आसान सा सवाल माता-पिता और बच्चों के बीच होने वाली कई बहसों और गलतफहमियों को रोक सकता है. बच्चे से पूछें, क्या तुम चाहते हो कि मैं सिर्फ तुम्हारी बात सुनूं या तुम्हारी समस्या का हल ढूंढने में मदद करूं. अगर बच्चा कहे, बस मेरी बात सुन लीजिए, तो सच में उसकी बात सुनें. अगर वह कहे, मुझे नहीं पता, तो तुरंत सलाह देना शुरू न करें और अगर वह पूछे, आप मेरी जगह होते तो क्या करते" तब आप अपने सुझाव दे सकते हैं, लेकिन तब भी आदेश देने के बजाय विकल्प देना बेहतर होता है.
इस तरह की बातचीत बच्चे को यह महसूस कराती है कि उसकी राय भी महत्वपूर्ण है और वह खुद अपने फैसले लेने में सक्षम है. रिसर्च भी बताती है कि जब माता-पिता बच्चों के नजरिए को समझने की कोशिश करते हैं और उन्हें खुद सोचने व फैसला लेने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, तो माता-पिता और बच्चों के बीच रिश्ता ज्यादा मजबूत और हेल्दी बनता है.
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