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स्टील का टिफिन, चंपक और 2 रुपये का सिक्का... 90s के बच्चों का बस्ता था यादों का खजाना

90 के दशक के बच्चों का स्कूल बैग सिर्फ किताबों और कॉपियों तक सीमित नहीं था।=. स्टील के टिफिन, पेंसिल बॉक्स, चंपक कॉमिक्स और 1-2 रुपये के सिक्कों जैसी चीजें उस दौर की मासूम यादों को ताजा कर देती हैं.

स्टील का टिफिन, चंपक और 2 रुपये का सिक्का... 90s के बच्चों का बस्ता था यादों का खजाना
स्टील टिफिन, चंपक और 2 रुपये
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आज के समय में जहां बच्चों के बाग में आपको लैपटॉप आदि मॉर्डन चीजें देखने को मिलेंगी वहीं एक समय ऐसा भी था जब बच्चे अपने बैग में छोटी-छोटी चीजें रखते थे. वो जमाना था 90 का दशक. उस दौरान बच्चों के बैग ही बिल्कुल अलग आया करते थे, आज के फैंसी बैग्स की तरह तो बिल्कुल भी नहीं. बैग यानी बस्ते में पढ़ाई के सामान के अलावा भी कई ऐसी चीजें होती थी जो शायद आज के दशक के बच्चे ना रखते हो. तो अगर आप भी 90 के दशक के हैं तो आपको भ अचानक से अपना पुराना स्कूल बैग तो याद आ ही गया होगा. पुराने दौर के स्कूल बैग में ऐसी कई चीजें होती थीं, जो सिर्फ पढ़ाई के काम नहीं आती थीं, बल्कि बचपन की मासूमियत और अपनापन भी अपने साथ समेटे रहती थीं.

स्टील का पैंसिल बॉक्स

सबसे पहले बात करें पेंसिल और रबड़ की. उस समय पेंसिल को ब्लेड से छीलना भी एक अलग ही कला मानी जाती थी. छिली हुई पेंसिल की लकड़ी की खुशबू और नटराज या अप्सरा की रबड़ बच्चों के लिए किसी खजाने से कम नहीं होती थी. अक्सर रबड़ दोस्त मांगकर ले जाते थे और कई बार वापस भी नहीं मिलती थी. उस दौर में बच्चे पैंसिल को एक फूल जैसे डिजाइन में शार्प करते थे.

स्टील का टिफिन

स्कूल बैग में रखा स्टील का टिफिन भी हर बच्चे की खास पहचान होता था. उसमें  रोटी, सूखी सब्जी या अचार की खुशबू पूरे बैग में फैल जाती थी. लंच होते ही बच्चे अपने-अपने टिफिन खोलकर एक-दूसरे के साथ खाना बांटकर खाते थे. उस दौर में अपने खाने से ज्यादा दोस्तों के घर का बना खाना ज्यादा पसंद आता था.

कॉपी और किताबों में कवर चढ़ाना

उस समय किताबों पर अखबार या भूरे कागज का कवर चढ़ाना भी एक जरूरी काम होता था. बच्चे अपने हाथों से नाम और क्लास लिखते थे, जबकि कुछ किताबों को सजाने के लिए उन पर डिजाइन भी बना देते थे.

पैंसिल बॉक्स के अंदर पैसे रखना

कई बच्चों के बैग में मां की दी हुई एक या दो रुपये की सिक्के भी सेफ रखे रहते थे. स्कूल की छुट्टी होने के बाद उस पैसे से आइसक्रीम या चूरण वाली खट्टी-मीठी गोलियां खाई जाती थी.

कॉमिक बुक्स

उस दौर में बहुत से बच्चे चंपक जैसी कॉमिक बुक्स को घर वालों से छुपाकर बैग में स्कूल लेकर आते थे और जैसे ही लंच ब्रेक होता था सभी बच्चे एक ग्रुप बनाकर कॉमिक बुक पढ़ा करते थे. टीचर्स से यह बुक छुपाकर रखी जाती थी.

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