कई देशों में रमजान के दौरान हर शाम सूर्यास्त के समय तोप दागी जाता है ताकि यह घोषणा की जा सके कि उपवास तोड़ने का समय हो गया है. इस परंपरा को Midfa Al Iftar (मिदफा ʿअल-इफ्तार') कहा जाता है. इफ्तार (रोजा खोलने) और सहरी (रोजा शुरू करने) के समय का ऐलान करने से जुड़ी ये परंपरा सदियों पुरानी है और इसका इतिहास मुख्य रूप से मिस्र (Egypt) से जुड़ा है. भारत के कई शहरों में आज भी इस परंपरा को फॉलो किया जाता है. ऐसे कई शहर हैं जहां पर इफ्तार (रोजा खोलने) और सहरी (रोजा शुरू करने) के समय तोप दागी जाता है. आखिर तोप क्यों दागी जाता है और इससे जुड़ा हुआ इतिहास क्या है, आई जानते हैं इसके बारे में
परंपरा से जुड़ा इतिहास
इस परंपरा की शुरुआत से जुड़ी कई सारी कहानियां हैं. माना जाता है कि मिदफा अल इफ्तार (Midfa' Al Iftar) परंपरा 19वीं सदी में मिस्र से शुरू हुई थी और बाद में पूरे अरब में फैल गई. रमजान के दौरान यह एक प्रतीकात्मक और सांस्कृतिक विरासत बन गई. इस परंपरा से जुड़ी सबसे लोकप्रिय कहानी के अनुसार, 1460 ईस्वी में काहिरा में ममलुक सुल्तान खुश कदम (Khushqadam) को एक जर्मन तोप उपहार में मिली थी. उन्होंने संयोग से रमजान के पहले दिन सूर्यास्त के समय इसे चलाने का आदेश दिया. जैसे ही तोप की आवाज शहर के लोगों ने सुनी तो उन्हें लगा कि सुल्तान ने रोजा खोलने का संकेत दिया है.
सुल्तान के इस कदम से लोग खुश हो गए. जनता की खुशी को देखते हुए सुल्तान की पत्नी हज्जा फातिमा ने सुल्तान को इसे स्थायी परंपरा बनाने की सलाह दी. तभी ये से परंपरा शुरू हो गई. कई जगहों पर इसे 'हज्जा फातिमा' के नाम से जाना जाने लगा.
धीरे-धीरे दूसरे देशों में शुरू हुई परंपरा
मिस्र से शुरू हुई यह परंपरा धीरे-धीरे अन्य देशों में भी फैल गई. सऊदी अरब, यूएई और भारत के अजमेर शरीफ (राजस्थान) और भोपाल (मध्य प्रदेश) जैसे शहरों में आज भी सेहरी और इफ्तार के समय तोप दागने की ऐतिहासिक परंपरा निभाई जाती है. दुबई में यह परंपरा 1960 के दशक से चली आ रही है, जहां आज भी बुर्ज खलीफा जैसे प्रमुख स्थानों पर तोप दागी जाती है.
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