Harish Rana Euthanasia Process: इच्छामृत्यु को लेकर सुप्रीम कोर्ट में लंबी लड़ाई लड़ने वाले राणा दंपत्ति कई सालों से जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे अपने बेटे को विदा कर रहे हैं. हरीश राणा को इच्छामृत्यु देने का प्रोसेस शुरू हो चुका है. इसी बीच एक भावुक कर देने वाला वीडियो भी सामने आया है, जिसमें हरीश लाचार हालत में दिख रहे हैं. पैसिव यूथिनिसिया के तहत अब हरीश का लाइफ सपोर्ट हटाया जा रहा है और उन्हें धीरे-धीरे मुक्ति देने की कोशिश हो रही है. इस पूरे प्रोसेस को लेकर हमने आरएमएल हॉस्पिटल के एनेस्थीसिया प्रोफेसर डॉ. संदीप कुमार से बातचीत की, जिन्होंने बताया कि आने वाले कुछ दिनों में क्या-क्या होगा.
ऐसे मिलती है इच्छामृत्यु की इजाजत
पैसिव यूथिनिसिया का मतलब होता है मरीज या उसके परिवार ने स्वैच्छिक मृत्यु की कामना की है. गाजियाबाद के राणा दंपत्ति ने 3 साल की कानूनी लड़ाई के बाद अपने बेटे के लिए इच्छामृत्यु की इजाजत मांगी. इसके लिए प्रोसेस काफी कड़ा होता है. दो मेडिकल बोर्ड बनते हैं, जो अपनी रिपोर्ट कोर्ट को सौंपते हैं. पहला मेडिकल बोर्ड मरीज की जांच कर रिपोर्ट देता है, फिर दूसरा मेडिकल बोर्ड मरीज को देखता है और पहले वाले बोर्ड की जांच रिपोर्ट को निष्पक्ष तरीके से जांच करता है. जब दोनों मेडिकल बोर्ड की आम सहमति होती है कि मरीज की वैसी स्थिति नहीं है कि वह दोबारा ठीक हो सके, तब पैसिव यूथिनिसिया के लिए आगे बढ़ा जाता है.
मरीज को नहीं होना चाहिए दर्द
डॉक्टर संदीप ने बताया कि पैसिव यूथिनिसिया इस बात का खास ख्याल रखा जाता है कि मरीज को किसी प्रकार का दर्द ना हो. अगर उसे दर्द होता है तो उसकी दवा दी जाती है यानी इस बात का विशेष ख्याल रखा जाता है कि पूरे सम्मान के साथ उसकी विदाई हो.
- चरणबद्ध तरीके से जो उसको आर्टिफिशियल ट्रीटमेंट दिया जा रहा है, उसे हटाया जाता है.
- अगर वह वेंटिलेटर पर है तो उसे पहले हटाया जाएगा, उसके बाद दवाइयां कम की जाएगी, फिर धीरे-धीरे खाना कम किया जाएगा.
- मेडिकल बोर्ड ने जो प्रोटोकॉल बनाया होगा उसके आधार पर कार्रवाई की जाताी है.
- इस दौरान कपड़ा चेंज करने से लेकर शरीर पोंछने तक हर प्रक्रिया का ध्यान रखा जाता है.
- मरीज को पैलिएटिव केयर यूनिट में शिफ्ट किया जाता है, जहां उनके दर्द का निवारण होता है ताकि वह धीरे-धीरे मृत्यु की तरफ जाए.
- मरीज की परिजन को बता दिया जाता है कि यह दवाएं जीवन को बढ़ाने के लिए नहीं, उनके जीवन को दर्द रहित मृत्यु की तरफ ले जाती हैं.
कैसे लगाता जाता है दर्द का पता?
इच्छामृत्यु का भारत में ये पहला मामला है. ऐसे में हर केस में प्रक्रिया अलग हो सकती है, मरीज की स्थिति पर निर्भर करता है कि कैसे उसकी इच्छा मृत्यु की तरफ ले जाना है. अब सवाल है कि जो मरीज सालों से रिएक्ट नहीं कर रहे हैं या फिर बता नहीं सकते हैं कि उन्हें दर्द हो रहा है, उनके केस में क्या होता है. आमतौर पर दुनियाभर में ऐसे ही मरीजों को इच्छामृत्यु दी जाती है, जो रिएक्ट नहीं कर पाते हैं. ऐसे में उनकी हीमोडायनेमिक्स में बदलाव होता है, जैसे हार्ट रेट का बढ़ना ब्लड प्रेशर का चेंज होना तब पता चलता है कि मरीज को दर्द या तकलीफ हो रही है. उस वक्त उसको पेन किलर दवा दी जाती है. इस पूरे प्रोसेस में दो से तीन दिन या फिर ज्यादा वक्त भी लग सकता है.
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