Success Story: IIM अहमदाबाद से गोल्ड मेडल हासिल करना किसी भी छात्र के लिए बड़ी उपलब्धि है. लेकिन असली कहानी अक्सर उस मेडल के बाद शुरू होती है, जब कैंपस की पहचान पीछे छूट जाती है और प्रोफेशनल दुनिया में अपनी जगह खुद बनानी होती है. 2019 में IIM अहमदाबाद के PGP प्रोग्राम में गोल्ड मेडलिस्ट रहे शुभम गोयल की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. दिल्ली में जन्मे और पले-बढ़े शुभम ऐसे परिवार से आते हैं जहां शिक्षा को हमेशा महत्व मिला. उनके दादा और नाना दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे हैं. उनकी मां गृहिणी हैं, जबकि पिता और भाई सरकारी सेवा में हैं. ऐसे माहौल में पढ़ाई उनके जीवन का अहम हिस्सा रही, लेकिन IIM अहमदाबाद पहुंचते समय उन्होंने खुद को गोल्ड मेडल के लक्ष्य के साथ नहीं देखा था. उनका गोल अपेक्षाकृत सीधा था, जो भी करें, पूरी ईमानदारी से करें और अपना सर्वश्रेष्ठ दें. यही सोच आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी.
गोल्ड मेडल लक्ष्य नहीं था, लेकिन मेहनत लगातार थी
NDTV से बातचीत में शुभम बताते हैं कि उनके बैच में उनसे ज्यादा समझदार और जानकार छात्र भी थे. ऐसे में सिर्फ दूसरों से बेहतर बनने की कोशिश करने के बजाय उन्होंने अपनी प्रक्रिया पर ध्यान दिया, हर दिन कुछ नया सीखना, मेहनत और अपने प्रदर्शन को बेहतर करना. आखिरकार इसी निरंतरता का नतीजा गोल्ड मेडल के रूप में सामने आया. लेकिन IIM अहमदाबाद से उनके लिए सबसे बड़ी उपलब्धि सिर्फ मेडल नहीं थी. दो साल के इस सफर ने उनके सोचने और लोगों के साथ काम करने के तरीके को भी प्रभावित किया.
IIMA ने बदली सोच, सिर्फ करियर नहीं
शुभम के मुताबिक, IIM अहमदाबाद ने उन्हें पूरी तरह बदलने के बजाय उनके भीतर पहले से मौजूद सोच को मजबूत किया. इसके साथ ही मजबूत रिश्ते बनाना, नेटवर्क की अहमियत समझना, बेहतर सॉफ्ट स्किल्स विकसित करना और लगातार मेहनत करते रहना उनकी सीख का हिस्सा बना. यही सीख बाद में उनके करियर के अलग-अलग पड़ावों पर काम आई.
BCG से माइक्रोसॉफ्ट तक, करियर की दिशा बदली
BCG ने उन्हें बिजनेस और मैनेजमेंट को करीब से समझने का मौका दिया. लेकिन इसी दौरान उन्हें महसूस हुआ कि करियर का फैसला केवल दूसरों की सलाह या किसी प्रतिष्ठित नौकरी के आधार पर नहीं किया जा सकता. इसी सोच के साथ उनकी रुचि प्रोडक्ट मैनेजमेंट की तरफ बढ़ी और उन्होंने माइक्रोसॉफ्ट में प्रोडक्ट मैनेजर के तौर पर नई शुरुआत की. यह बदलाव उनके करियर का अहम मोड़ साबित हुआ.
जब करियर के साथ जिंदगी ने भी करवट ली
माइक्रोसॉफ्ट में करियर आगे बढ़ रहा था, लेकिन इसी दौरान दुनिया COVID महामारी की चपेट में आ गई. शुभम के लिए यह दौर सिर्फ प्रोफेशनल बदलावों तक सीमित नहीं था. परिवार और खासकर अपने पिता के साथ बिताए समय ने उनके फैसलों को प्रभावित किया. लेकिन 2021 में उन्होंने COVID के दौरान अपने पिता को खो दिया.
आज माइक्रोसॉफ्ट कनाडा में बड़ी जिम्मेदारी
माइक्रोसॉफ्ट में पांच साल से ज्यादा के सफर के बाद शुभम आज कंपनी के कनाडा ऑपरेशन में प्रिंसिपल प्रोडक्ट लीड हैं. वह 13 लोगों की टीम को लीड कर रहे हैं. IIM अहमदाबाद के गोल्ड मेडल से लेकर माइक्रोसॉफ्ट में नेतृत्व की जिम्मेदारी तक का यह सफर उनके लिए उपलब्धियों की एक सीधी लाइन नहीं रहा. इसमें करियर बदलने का फैसला, अनिश्चितता, महामारी और पिता को खोने का व्यक्तिगत दर्द भी शामिल रहा. इसीलिए वह अपने मौजूदा मुकाम को अंतिम मंजिल नहीं मानते. उनके लिए अभी भी सीखने और आगे बढ़ने की गुंजाइश बनी हुई है.
बड़े पैकेज से ज्यादा जरूरी है सही स्किल
युवाओं के लिए शुभम की सलाह है कि IIM जैसे संस्थानों से निकलते समय सिर्फ बड़े पैकेज को सफलता का पैमाना नहीं बनाना चाहिए. उनके मुताबिक, मजबूत प्रोफेशनल स्किल्स और अच्छी वर्क हैबिट्स लंबे समय में ज्यादा महत्वपूर्ण होती हैं. अच्छी सैलरी कई बार इन्हीं चीजों का नतीजा होती है.
AI को लेकर उत्साह, लेकिन हर समस्या का जवाब नहीं
NDTV से बातचीत के दौरान जब हमने शुभम से पूछा कि एक बड़ी टेक कंपनी में काम करते हुए वह AI के बढ़ते प्रभाव को कैसे देखते हैं, तो उन्होंने संतुलित नजरिया रखा. शुभम का कहना है कि AI आने वाले समय में नए अवसर पैदा करेगा और काम करने की दक्षता बढ़ाएगा, लेकिन इसे हर समस्या का समाधान मानना सही नहीं होगा. उनके मुताबिक, AI का इस्तेमाल वहीं सार्थक है जहां वह वास्तव में अतिरिक्त मूल्य जोड़े और लंबे समय तक टिकाऊ समाधान दे सके.
आखिर में गोल्ड मेडल नहीं, रिश्ते याद रहते हैं
शुभम की कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा शायद यही है कि IIM अहमदाबाद का गोल्ड मेडल और माइक्रोसॉफ्ट में नेतृत्व की भूमिका होने के बावजूद उनकी सबसे बड़ी सीख करियर से जुड़ी नहीं है. वह मानते हैं कि प्रोफेशनल लाइफ का उद्देश्य सिर्फ ज्यादा हासिल करना नहीं, बल्कि अपनी निजी जिंदगी और रिश्तों को भी बेहतर बनाना होना चाहिए. काम के दबाव में अपने लोगों को नजरअंदाज करना ऐसी गलती है जिसका एहसास कई बार बहुत देर से होता है.
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