- वर्ष 2011 में पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे का 34 साल का शासन खत्म होने के बाद CPM का वोट बैंक तेजी से गिरा है
- 2021 के विधानसभा चुनाव में वामपंथी गठबंधन का वोट शेयर मात्र पांच प्रतिशत रह गया और उन्हें कोई सीट नहीं मिली
- BJP ने वामपंथी वोटरों के समर्थन से 2019 लोकसभा चुनाव में अपने वोट शेयर को चौगुना कर राज्य में दबदबा बनाया
पश्चिम बंगाल की राजनीति में कभी जिस लाल झंडे की तूती बोलती थी, आज वह पूरी तरह से हाशिए पर है. साल 2011 में जब ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने वाम मोर्चे (Left Front) के 34 साल के अजेय शासन को उखाड़ फेंका था, तब भी CPM के पास अपना 40% वोट बैंक सुरक्षित था. लेकिन ऐसा क्या हुआ कि महज एक दशक में यह मजबूत किला ताश के पत्तों की तरह ढह गया? आइए जानते हैं बंगाल में वामपंथ के पतन की पूरी कहानी.
40% से सीधे 5% पर कैसे आ गिरा वोट बैंक?
2011 में सत्ता गंवाने के बाद CPM का ग्राफ लगातार गिरता गया. 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का वोट शेयर गिरकर 23% (2 सीटें) रह गया, जो 2016 के विधानसभा चुनाव में 20.1% (26 सीटें) पर आ गया. सबसे बड़ा झटका 2019 के लोकसभा चुनाव में लगा, जब CPM का वोट शेयर महज 6.28% रह गया और सिर्फ तीन संसदीय सीटों पर सिमट गए थे. उन्होंने विपक्ष की ज्यादातर जगह BJP को दे दी थी, जिसने बंगाल में पहली बार 18 संसदीय सीटें जीतकर अपना ऐतिहासिक दबदबा बनाया था.इसके बाद 2021 के विधानसभा चुनाव में तो वामपंथी गठबंधन का सूपड़ा ही साफ हो गया और उनका वोट शेयर 5% पर आ सिमटा, जबकि सीटों का खाता शून्य रहा.
विडंबना यह है कि वामपंथी वोटों के गायब होने से जो राजनीतिक खालीपन पैदा हुआ, उसे BJP ने भर दिया. जबकि बीजेपी वैचारिक रूप से वामपंथियों के बिल्कुल विपरीत है और बंगाल में एक नई ताकत है. लेकिन सवाल यह भी है कि आखिर वामपंथी वोटरों ने अपनी विपरीत विचारधारा की ओर झुकाव कैसे बढ़ा लिया? ताकि वो राज्य में ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ अपनी सत्ता-विरोधी भावना जाहिर कर सकें?
सड़क पर संघर्ष करना भूलना पड़ा भारी
लगातार 34 सालों तक सत्ता के शिखर पर रहने के कारण पार्टी के नेताओं और कैडरों को सत्ता की आदत हो गई थी. जब 2011 के बाद TMC ने जमीन पर अपना वर्चस्व बनाना शुरू किया, तो CPM कैडरों के लिए अपना वजूद बचाना मुश्किल हो गया. एक वरिष्ठ नेता के अनुसार, पार्टी के कई लोग उस दौर के संघर्ष का हिस्सा नहीं थे जब वामपंथ अपनी जड़ें जमा रहा था, इसलिए उनकी सड़क पर संघर्ष करने की क्षमता बेहद कमजोर हो चुकी थी.

बीजेपी ने उठाया मौके का फायदा, बढ़ाई अपनी पैठ
ठीक इसी समय, BJP एक ऐसे राज्य में अपनी पैठ बनाने की कोशिश कर रही थी, जहां उसकी सांगठनिक ताकत बहुत कम थी. एक मजबूत वामपंथी दल की गैर-मौजूदगी और बहुत कमजोर हो चुकी कांग्रेस के चलते, BJP को अपने बिल्कुल विपरीत 'लाल खेमे' में एक अप्रत्याशित सहयोगी मिल गया. CPM के कार्यकर्ताओं ने जमीनी स्तर पर तृणमूल कांग्रेस से लड़ने में BJP की मदद की. मई 2019 में एक प्रमुख अंग्रेजी अखबार ने यह रिपोर्ट छापी थी. इस सांगठनिक समर्थन की बदौलत BJP, TMC-विरोधी और वामपंथी-समर्थक वोटों का एक बड़ा हिस्सा अपनी झोली में डालने में कामयाब रही. 2019 के चुनावी नतीजों से पता चला कि BJP का वोट शेयर 23% बढ़कर 40.6% हो गया, जबकि CPM का वोट शेयर 23% से गिरकर 6.28% रह गया. CPM को जो 17% वोटों का नुकसान हुआ था, वह लगभग पूरी तरह से BJP के बढ़े हुए वोट शेयर में दिखाई दिया.
2019 के लोकसभा चुनावों में, वामपंथी खेमे से बीजेपी की ओर विपक्षी या TMC-विरोधी वोटों की शिफ्टिंग वामपंथी दलों को बहुत भारी पड़ा. एक बार अपनी जगह बना लेने के बाद बीजेपी ने अपने सभी संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए वामपंथी वोटों को अपनी झोली में डालने की पूरी कोशिश की. इसी का नतीजा था कि बीजेपी 2021 के विधानसभा चुनावों में ऐतिहासिक रूप से 77 सीटें जीतने में कामयाब रही. इसके चलते दो अन्य विपक्षी दल कांग्रेस और CPM पूरी तरह से हाशिए पर चले गए और 2021 की विधानसभा में उन्हें एक भी सीट नहीं मिली. 2024 के लोकसभा चुनावों में भी वामपंथी दलों का खाता नहीं खुला, जबकि कांग्रेस को सीट मिली. लेकिन BJP की सीटों की संख्या 18 से घटकर 12 रह गई और इस स्थिति का सबसे ज्यादा फायदा सत्ताधारी TMC को मिला.
पार्टी ही बन गई थी सरकार
34 साल तक चले वामपंथी शासन के प्रति मतदाताओं में जो ऊब या थकान का भाव पैदा हो गया था, वह अब खुलकर सामने आ गया. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि पार्टी वोटर्स की आकांक्षाओं को पूरा करने में पूरी तरह विफल रही. उदाहरण के लिए उन्होंने बताया कि वामपंथियों द्वारा किए गए सफल भूमि सुधारों के बाद सहकारी खेती को लागू करने में मिली असफलता ने कृषि क्षेत्र को प्रभावित किया. इसके अलावा लगभग 20 साल के शासन के बाद, प्रशासन और पार्टी की भूमिका जिन्हें अलग रखा जाना चाहिए था, आपस में घुल-मिल गईं और धीरे-धीरे पार्टी ही राज्य में सबसे हावी ताकत बन गई. नतीजतन, सरकार की सभी असफलताओं का ठीकरा पार्टी पर ही फूटा. पार्टी के सर्वशक्तिमान बन जाने के साथ ही उसमें गिरावट आने लगी, क्योंकि पार्टी कार्यालय ऐसे केंद्र बन गए जहां से सरकारी कामकाज का बंटवारा होता था, जिससे पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच भ्रष्टाचार फैल गया. फिर, जब वाम मोर्चा ने उद्योगों को फिर से स्थापित करने की पहल की, तो सिंगूर और नंदीग्राम जैसी घटनाओं के कारण हालात बिगड़ गए और जो जनमत तैयार हुआ, वह पार्टी के ही खिलाफ चला गया. जो लोग पहले से ही CPM से ऊब चुके थे, वे उसके विरोध में सड़कों पर उतर आए. इसका फायदा ममता बनर्जी की TMC ने उठाया और सत्ता हासिल कर ली.

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जनता से टूटी डोर और युवाओं का पलायन
2011 के बाद के जब वामपंथियों की सत्ता चली गई तो CPM के भीतर नेतृत्व का संकट उभरकर सामने आया. धीरे-धीरे वामपंथियों ने अपनी सबसे बड़ी ताकत खो दी. उन्होंने जनता से अपना सीधा संपर्क गंवा दिया. पार्टी के भीतर भी नेता शायद ही कभी आपस में आमने-सामने बातचीत करते थे. अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, बातचीत अब फोन और दूसरे डिजिटल माध्यमों तक ही सीमित रह गई है. कुछ मामलों में तो अंदरूनी बैठकें भी डिजिटल माध्यम से ही होने लगी हैं. नतीजतन, चाहे जमीनी स्तर पर काम करने वाले लोगों की शिकायतें हों या पार्टी के भीतर मौजूद साथियों की, कई मामलों में उन पर कोई ध्यान ही नहीं दिया गया.
इस स्थिति का सबसे ताजा उदाहरण तब देखने को मिला, जब युवा नेता प्रतीकुर रहमान ने CPM छोड़कर TMC का दामन थाम लिया. उन्होंने छात्र राजनीति से शुरुआत करते हुए CPM की स्टूडेंट विंग SFI के प्रदेश अध्यक्ष का पद संभाला. इसके बाद वे SFI के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष बने और फिर CPM की प्रदेश समिति के सदस्य के तौर पर आगे बढ़े. 2024 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने डायमंड हार्बर सीट से CPM के उम्मीदवार के तौर पर TMC के महासचिव अभिषेक बनर्जी के खिलाफ चुनाव लड़ा. हाल ही में 21 फरवरी को बनर्जी के बुलावे पर वे TMC में शामिल हो गए. हालांकि वे अप्रैल में होने वाले विधानसभा चुनावों में उम्मीदवार नहीं हैं. CPM छोड़ते समय प्रतीकुर ने कहा कि पार्टी के प्रदेश नेतृत्व ने उनके काम को नजरअंदाज किया और उनकी शिकायतों को सुनने से साफ इनकार कर दिया.
अगर बंगाल में कभी बेहद ताकतवर रही CPM की आज यह हालत है, जहां युवा नेताओं के लिए अपनी जगह बना पाना मुश्किल होता जा रहा है और आपस में बातचीत-मेलजोल भी काफी कम हो गया है, तो ऐसे में वामपंथी मतदाताओं को अपने पुराने साथियों की ओर वापस लौटने में शायद अभी कुछ और समय लग सकता है.
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