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26 लाख साल पुरानी ज्वालामुखी, लावा की जगह उगतला पानी, एक अनूठा गांव...विश्व धरोहर बन सकती हैं भारत की ये जगहें

यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज सेंटर ने भारत की टेंटेटिव लिस्ट में 3 नए स्थल जोड़े हैं. यह वर्ल्ड हेरिटेज का दर्जा पाने की दिशा में एक अहम कदम है. जानिए यह तीन स्थल कौन से हैं और यह इतने खास क्यों हैं.

26 लाख साल पुरानी ज्वालामुखी, लावा की जगह उगतला पानी, एक अनूठा गांव...विश्व धरोहर बन सकती हैं भारत की ये जगहें
बारातांग के कीचड़ ज्वालामुखी को लोकल लोग 'जल्की' कहते हैं (फोटो- indiacinehub, AI से रिफाइन किया गया)

यूनेस्को के विश्व धरोहर केंद्र ने भारत की अस्थायी सूची में तीन नए स्थलों को शामिल किया है. यह भारत की ओर 3 और जगहों के लिए विश्व धरोहर का दर्जा पाने की दिशा में एक अहम कदम है. यूनेस्को में भारत के स्थायी प्रतिनिधिमंडल ने एक प्रेस रिलीज जारी किया है, जिसके अनुसार, इस अस्थाई लिस्ट में शामिल किए गए ये तीनों स्थल प्रमुख भूवैज्ञानिक और पुरातात्विक अहमियत रखते हैं. यह हैं- अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में स्थित बारातांग कार्स्ट-कीचड़-ज्वालामुखी परिसर और अंडमान सबडक्शन ज्वालामुखी तथा छत्तीसगढ़ में स्थित सिरपुर सांस्कृतिक और पुरातात्विक लैंडस्केप.

चलिए आपको बताते हैं कि इन तीनों स्थल इतने खास क्यों हैं कि इन्हें विश्व धरोहर का दर्जा मिल सकता है.

बारातांग कार्स्ट-कीचड़-ज्वालामुखी परिसर

अंडमान सबडक्शन ज्वालामुखी (फोटो- All India Radio News)

अंडमान सबडक्शन ज्वालामुखी (फोटो- All India Radio News)

यूनेस्को के मुताबिक, बारातांग द्वीप अंडमान-निकोबार में एक खास जगह है. यहां चूना पत्थर की गुफाएं, कीचड़ वाले ज्वालामुखी और पुराना भूवैज्ञानिक इतिहास मिलता है. यहां की चट्टानों से पता चलता है कि यह इलाका कैसे बना. यहां की गुफाएं बारिश के पानी से चट्टानों के धीरे-धीरे घुलने से बनी हैं, और यहां का पानी जमीन के नीचे बहता है. ये सब चीजें इस द्वीप को प्रकृति के लिहाज से बहुत खास बनाती हैं.

बारातांग के कीचड़ ज्वालामुखी को लोकल लोग 'जल्की' कहते हैं. ये भूकंप से बनते हैं. आम ज्वालामुखियों में गरम लावा निकलता है, लेकिन इनमें से ठंडा कीचड़, पानी और गैसें निकलती हैं- जैसे मीथेन और हाइड्रोजन सल्फाइड. ये जमीन के नीचे बहुत ज्यादा दबाव बनने से बाहर आती हैं. इनसे छोटे-छोटे टीले, उबलते हुए कुंड और सूखे गड्ढे बन जाते हैं. यह इलाका 'बारातांग रिजर्व फॉरेस्ट/जरावा ट्राइबल रिजर्व' में आता है. यह एक संरक्षित क्षेत्र है. यहां कीचड़ वाले ज्वालामुखी हैं और साथ ही इस इलाके का सबसे बड़ा गुफा परिसर भी है. करीब एक वर्ग किलोमीटर में चूना पत्थर की कई गुफाएं फैली हुई हैं.

अंडमान सबडक्शन ज्वालामुखी

अंडमान सबडक्शन ज्वालामुखी (फोटो- All India Radio News)

अंडमान सबडक्शन ज्वालामुखी (फोटो- All India Radio News)

अंडमान के नारकोंडम और बैरन द्वीप, बर्मा-अंडमान-जावा की ज्वालामुखी श्रृंखला में आते हैं. ये पिछले 26 लाख सालों में बने इकलौते सबडक्शन ज्वालामुखी हैं. दोनों द्वीपों से ज्वालामुखी गतिविधि, प्रकृति के बदलने और यहां पाए जाने वाले खास जीवों के बारे में काफी कुछ पता चलता है. लंबे समय तक सबसे अलग रहने की वजह से वैज्ञानिकों के लिए ये हमेशा से दिलचस्प रहे हैं. इनका सबसे पहला जिक्र 1885 में हॉबडे और मैलेट की रिपोर्ट "द वोल्केनोस ऑफ बैरन आइलैंड एंड नारकोंडम इन द बे ऑफ बंगाल" में मिलता है.

बारातांग में मड ज्वालामुखी के 4 समूह हैं, जिनके बीच के मुंह करीब 2 मीटर ऊंचे हैं. इनमें मैग्मा से नहीं, बल्कि कीचड़ और गैस से विस्फोट होता है. 20 साल बाद 2025 में फिर विस्फोट होने से ये भू-पर्यटन स्थल के रूप में चर्चा में आए थे. नारकोंडम और बैरन एक ही ज्वालामुखी श्रृंखला के हैं, पर अलग हैं. नारकोंडम एशिया के पास और महाद्वीपीय क्रस्ट पर है, बैरन समुद्री क्रस्ट पर है. नारकोंडम में जमीन उठने के निशान, लटकती घाटियां और खड़ी चट्टानें हैं, और इसके शिखर पर क्रेटर की जगह पुराने विस्फोटों के 3 टीले हैं.

बैरन का लावा बेसाल्ट है, नारकोंडम का डैसाइट-एंडेसाइट-रायोलिट है, और दोनों में मेंटल-क्रस्ट के मैग्मा मिलने के सबूत हैं. बैरन पर प्लीस्टोसीन युग में बना 2 KM चौड़ा काल्डेरा भी है. दोनों द्वीपों को यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज में शामिल करने का प्रस्ताव है. 2025 में GSI ने बैरन को जियोहेरिटेज घोषित किया, जबकि नारकोंडम को Important Bird Area और Key Biodiversity Area माना गया है.

छत्तीसगढ़ का सिरपुर गांव

छत्तीसगढ़ का सिरपुर गांव (फोटो- All India Radio News)

छत्तीसगढ़ का सिरपुर गांव (फोटो- All India Radio News)

छत्तीसगढ़ राज्य के महासमुंद जिले में स्थित सिरपुर गांव एक राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक है. यह स्थल अपने पुरातत्व, वास्तुकला की जटिलता और व्यापारिक संबंधों का गवाह है. साथ ही, यह इस बात का भी सबतू है कि कैसे अलग-अलग धर्मों ने मिलकर एक पूरे क्षेत्र को आकार दिया है, जहां ये सभी तत्व एक साथ जुड़े हुए हैं. यह स्थल महानदी नदी के पूर्वी तट पर स्थित है, जो छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 78 किलोमीटर दूर है. सिरपुर का प्राकृतिक रूप से एक अनूठा लैंडस्केप होना, 'प्रोटेरोजोइक छत्तीसगढ़ बेसिन' में इसकी स्थिति के कारण है. यह पूरा इलाका 'रायपुर लाइमस्टोन ग्रुप' से काफी प्रभावित है. यहां का नजारा स्ट्रोमेटोलाइट्स से बना है, जो साइनोबैक्टीरिया ने एक अरब साल से भी ज्यादा समय में बनाए हैं. ये परतदार जीवाश्म चट्टानें हैं.

आज के समय में यहां लगभग 300 घर और करीब 1500 लोग रहते हैं. बफर क्षेत्र में गोंड और बैगा जैसी कई जनजातियां निवास करती हैं. यहां की जीवंत संस्कृति और सिरपुर के पुराने स्मारक मिलकर एक खास माहौल बनाते हैं, जहां इतिहास और परंपराएं साथ-साथ चलती हैं. इस क्षेत्र के बफर जोन में मौजूद बरनवापारा वन्यजीव अभयारण्य इस प्राकृतिक मेल को और भी खूबसूरत बनाता है.

सिरपुर की तुलना विश्व धरोहर सूची में शामिल उन स्थलों से की जा सकती है, जो व्यापार, धर्म और शहरी विकास के बीच के संबंधों को दर्शाते हैं. हालांकि, यूनेस्को के अनुसार, भले ही सिरपुर के कुछ महत्वपूर्ण पहलू अन्य जगहों पर भी देखने को मिलते हों, लेकिन एक ही स्थान पर नदी-आधारित व्यापार केंद्र, विभिन्न धर्मों से जुड़े धार्मिक स्थल और एक विस्तृत पुरातात्विक शहरी परिसर का संगम इसे बेहद खास बनाता है.

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