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पश्चिम बंगाल में हार के बाद ममता बनर्जी पर चौतरफा हमला, क्या टीएमसी को बचा पाएंगी दीदी?

पश्चिम बंगाल में चुनावी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस गहरे संकट में घिरती दिख रही है. पार्टी के भीतर बगावत, बड़े पैमाने पर इस्तीफे और नेताओं के आरोपों के बीच बीजेपी नेता दिलीप घोष ने टीएमसी पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए हैं और दावा किया है कि संगठन धीरे-धीरे खत्म होने की ओर बढ़ रहा है.

पश्चिम बंगाल में हार के बाद ममता बनर्जी पर चौतरफा हमला, क्या टीएमसी को बचा पाएंगी दीदी?
  • तृणमूल कांग्रेस चुनाव हार के बाद भ्रष्टाचार और गुटबाजी के आरोपों से गंभीर राजनीतिक संकट में है
  • वरिष्ठ नेता शांतनु सेन ने राष्ट्रीय प्रवक्ता पद से इस्तीफा देकर जनता के भरोसे में कमी जताई
  • सांसद काकोली घोष दस्तिदार ने महिलाओं के प्रति अपमानजनक व्यवहार और नेतृत्व की निष्क्रियता का आरोप लगाया
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पश्चिम बंगाल की सत्ता गंवाने के बाद ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) अपने सबसे बड़े राजनीतिक संकट से गुजरती नजर आ रही है.  जहां एक तरफ विपक्ष लगातार भ्रष्टाचार और कुशासन के आरोपों से ममता बनर्जी को घेरे हुआ है, वहीं दूसरी तरफ पार्टी के भीतर से उठ रही बगावत की आवाजें भी टीएमसी को अंदर ही अंदर खोखला करती जा रही है. हाल के दिनों में कई वरिष्ठ नेताओं के इस्तीफे, सार्वजनिक आरोप और नेतृत्व पर सवालों ने यह बहस तेज कर दी है कि क्या ममता बनर्जी एक बार फिर अपनी पार्टी को टूटने से बचा पाएंगी.

पार्टी के भीतर बढ़ी बेचैनी, शांतनु सेन ने छोड़ा प्रवक्ता पद

टीएमसी को सबसे बड़ा झटका पार्टी के अंदर से ही लग रहा है. वरिष्ठ नेता और पूर्व राज्यसभा सांसद शांतनु सेन ने राष्ट्रीय प्रवक्ता पद से इस्तीफा देते हुए साफ कहा कि इन चुनाव नतीजों ने साबित कर दिया कि जनता ने पार्टी की बातों पर भरोसा नहीं किया. सेन ने कहा कि राष्ट्रीय प्रवक्ता के तौर पर उन्होंने कई बार ऐसे मुद्दों पर भी पार्टी का बचाव किया जिनसे जनता सहमत ही नहीं थी. मगर चुनाव परिणामों के बाद उन्हें लगा कि जनता का भरोसा पार्टी से उठ चुका है. उन्होंने कहा कि राजनीति आखिरकार जनता के लिए होती है और जब जनता ही साथ न हो तो फिर आत्ममंथन जरूरी हो जाता है. शांतनु सेन का इस्तीफा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वे पार्टी के पुराने और भरोसेमंद चेहरों में गिने जाते रहे हैं.

काकोली घोष दस्तिदार की बगावत ने बढ़ाई मुश्किलें

शांतनु सेन से पहले टीएमसी सांसद काकोली घोष दस्तिदार भी पार्टी के सभी संगठनात्मक पदों से इस्तीफा दे चुकी हैं. उन्होंने अपने इस्तीफे में पार्टी के भीतर महिलाओं के प्रति कथित अपमानजनक व्यवहार और आलाकमान की निष्क्रियता पर सवाल उठाए. काकोली ने आरोप लगाया कि एक वरिष्ठ सांसद द्वारा महिला सांसदों के साथ कथित तौर पर अभद्र व्यवहार किया जाता रहा, लेकिन पार्टी नेतृत्व ने इस पर प्रभावी कदम नहीं उठाया. उन्होंने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में संगठनात्मक पद पर बने रहने का कोई मतलब ही नहीं रह जाता.

कल्याण बनर्जी पर गंभीर आरोप, पार्टी की कलह आई सड़क पर

इस्तीफे के बाद काकोली घोष दस्तिदार ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी पर संसद के भीतर कई बार अभद्र भाषा इस्तेमाल करने और महिला सांसदों के प्रति कथित रूप से अपमानजनक व्यवहार करने का आरोप लगाया. उन्होंने मांग की कि मामले में कार्रवाई की जाए. हालांकि कल्याण बनर्जी ने इन आरोपों को पूरी तरह निराधार बताते हुए इसे राजनीतिक साजिश करार दिया है. उन्होंने सवाल उठाया कि यदि ऐसी कोई घटना हुई थी तो इस मामले में शिकायत तुरंत क्यों नहीं की गई.  लेकिन इस विवाद ने टीएमसी के भीतर चल रहे शक्ति संघर्ष को सार्वजनिक कर दिया है. खास बात यह है कि कुछ ही दिन पहले ममता बनर्जी ने काकोली घोष दस्तिदार की जगह कल्याण बनर्जी को लोकसभा में पार्टी का मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) नियुक्त किया था. राजनीतिक हलकों में इसे नेतृत्व द्वारा कल्याण बनर्जी पर भरोसे के संकेत के रूप में देखा गया था.

TMC सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने कहा कि तूणमूल कांग्रेस कुछ दिनों में खत्म हो जाएगी. राष्ट्रीय राजनीति में भी पार्टी अपनी विश्वसनीयता खो चुकी है. अब कोई भी पार्टी तृणमूल के साथ हाथ नहीं मिलाएगी.

हस्ताक्षर विवाद में घिरी टीएमसी विधायक

टीएमसी की परेशानियां महज यहीं खत्म नहीं होतीं. पार्टी विधायक नयना बंद्योपाध्याय के हस्ताक्षर को लेकर उठे विवाद की जांच अब सीआईडी तक पहुंच गई है. विधानसभा के रिकॉर्ड में दर्ज हस्ताक्षर और नेता प्रतिपक्ष के समर्थन में दिए गए पत्र पर मौजूद हस्ताक्षर को लेकर सवाल उठे थे. इस मामले की जांच के लिए सीआईडी की टीम हस्तलेखन विशेषज्ञों के साथ विधायक के घर पहुंची और दस्तावेजों की जांच की.हालांकि नयना बंद्योपाध्याय ने कहा कि उन्होंने पार्टी के निर्देश के अनुसार दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे और संभव है कि वह हस्ताक्षर उनके पुराने हस्ताक्षरों से अलग दिख रहे हों. इसके बावजूद यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब टीएमसी पहले से ही कई विवादों से घिरी हुई है.

हार के बाद खुलकर सामने आई अंदरूनी नाराजगी

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लंबे समय तक सत्ता में रहने के दौरान टीएमसी के भीतर मौजूद असंतोष चुनावी हार के बाद बाहर आ गया है. पार्टी के कई नेता अब खुलकर भ्रष्टाचार, गुटबाजी, संगठन में बाहरी दखलअंदाजी और नेतृत्व की कार्यशैली पर लगातार सवाल उठा रहे हैं. काकोली घोष दस्तिदार ने अपने इस्तीफे में भ्रष्टाचार और संगठन की दिशा को लेकर चिंता जताई थी. जबकि शांतनु सेन ने जनता के भरोसे के संकट की बात कही. दूसरी तरफ विपक्ष लगातार यह दावा कर रहा है कि टीएमसी के भीतर टूट की स्थिति पैदा हो चुकी है.

दिलीप घोष का हमला, कहा- ढहने की ओर बढ़ रही है टीएमसी

टीएमसी की मुश्किलों के बीच बीजेपी नेता और पश्चिम बंगाल सरकार में मंत्री दिलीप घोष ने पार्टी पर तीखा हमला बोला है. उन्होंने आरोप है कि टीएमसी के भीतर ऊपर से लेकर नीचे तक भ्रष्टाचार फैला हुआ है और पूरा संगठन धीरे-धीरे ढहने की ओर बढ़ रहा है. साथ ही दिलीप घोष ने दावा किया कि पार्टी के नेताओं ने केंद्र और राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का पैसा लूटकर अपनी संपत्ति बनाई. उन्होंने कहा कि यह गरीबों का पैसा है और इसके लिए जिम्मेदार लोगों को कानून के कटघरे में लाया जाना चाहिए. उन्होंने लक्ष्मी भंडार और अन्नपूर्णा भंडार जैसी योजनाओं का जिक्र करते हुए नागरिकता का मुद्दा भी उठाया. घोष ने कहा कि सरकारी योजनाओं का लाभ पाने के लिए भारतीय नागरिक होना जरूरी है और नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के तहत पात्र लोगों को पंजीकरण कराना चाहिए. इसके अलावा उन्होंने आरोप लगाया कि टीएमसी शासन के दौरान कई संस्थानों को जानबूझकर बांटा गया ताकि नौकरी घोटाले, रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया जा सके. उन्होंने हरिणघाटा की मदर डेयरी और बंगला डेयरी का उदाहरण देते हुए भी गंभीर आरोप लगाए.

ममता के सामने सबसे बड़ी चुनौती

इन घटनाक्रमों ने ममता बनर्जी के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है, इससे पार पाना उनके लिए किसी हाल आसान नहीं दिख रहा है. जहां एक ओर भाजपा भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलताओं के मुद्दे पर हमलावर है, दूसरी ओर पार्टी के भीतर से उठ रही असंतोष की आवाजें नेतृत्व की पकड़ पर सवाल खड़े कर रही हैं. टीएमसी अब तक यह दावा करती रही है कि पार्टी एकजुट है और मतभेद किसी भी बड़े संगठन का हिस्सा होते हैं. मगर लगातार इस्तीफे, नेताओं के आरोप और बढ़ती गुटबाजी यह संकेत दे रही है कि चुनावी हार के बाद पार्टी गंभीर आत्ममंथन के दौर से गुजर रही है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ममता अपने राजनीतिक कौशल से टीएमसी को संभाल पाएंगी, या फिर यह संकट बंगाल की राजनीति में किसी बड़े बदलाव की भूमिका लिख रहा है.

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