जरा सोचिए, 18 साल की उम्र में हम और आप क्या कर रहे थे? कोई कॉलेज जाने की तैयारी कर रहा होगा, कोई करियर के सपने बुन रहा होगा, तो कोई दोस्तों के साथ मस्ती में मगन होगा. लेकिन आज जिस लड़के की कहानी मैं आपको सुनाने जा रहा हूं, उसने 18 साल की उम्र में कुछ ऐसा कर दिया था, जिसने पूरे अंग्रेजी साम्राज्य की नींव हिला कर रख दी थी. तारीख थी 11 अगस्त 1908. एक 18 साल का छरहरा सा लड़का, चेहरे पर कोई खौफ नहीं, बल्कि एक सुकून भरी मुस्कान लिए. हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लेता है. ये कहानी है अमर शहीद खुदीराम बोस की.
मां-बाप का डर कि कहीं मौत न हो जाए
इस कहानी की शुरुआत होती है 3 दिसंबर 1889 को, बंगाल के मेदिनीपुर में. त्रैलोक्यनाथ बोस और लक्ष्मीप्रिया देवी के घर एक बेटे की किलकारी गूंजी. घर में जश्न था, लेकिन एक अनजाना सा खौफ भी. खौफ इसलिए, क्योंकि इससे पहले उनके दो बेटों की कम उम्र में ही बीमारी से मौत हो चुकी थी. तब मां-बाप ने एक देसी टोटका आजमाया. उन्होंने अपनी बड़ी बेटी को तीन मुट्ठी 'खुदी' (बंगाल में टूटे हुए चावल को खुदी कहते हैं) देकर इस बच्चे को प्रतीकात्मक रूप से बेच दिया, ताकि मौत की नजर इस पर न पड़े. तीन मुट्ठी खुदी के बदले बचे इस बच्चे का नाम पड़ गया- खुदीराम.
लेकिन खुदीराम की किस्मत में तो कुछ और ही लिखा था. 9वीं तक पढ़ाई की और 15 साल की उम्र में अनुशीलन समिति से जुड़ गए. एक ऐसा संगठन जो खून में इंकलाब घोलता था. 15 साल की ही उम्र में वो पहली बार अंग्रेजों के खिलाफ पर्चे बांटते पकड़े गए थे.

किंग्सफोर्ड की हत्या की प्लानिंग
उन दिनों एक अंग्रेज जज हुआ करता था. डगलस किंग्सफोर्ड. उसे भारतीयों से खास नफरत थी. छोटे-छोटे जुर्म पर वह कम से कम 15 कोड़े मारने की सजा देता था. क्रांतिकारियों ने तय किया कि इस किंग्सफोर्ड का काम तमाम करना होगा. खुदीराम बोस और उनके साथी प्रफुल्ल कुमार चाकी को यह जिम्मेदारी दी गई.
किंग्सफोर्ड का ट्रांसफर बिहार के मुजफ्फरपुर हो गया था. ये दोनों लड़के अप्रैल 1908 में मुजफ्फरपुर पहुंचे. दोनों ने एक धर्मशाला में डेरा डाला. एक अनजाना शहर, अनजानी भाषा, लेकिन इरादे फौलादी. कई दिनों तक किंग्सफोर्ड की रेकी की गई.
30 अप्रैल 1908 की भयानक रात
शाम का वक्त था. खुदीराम और प्रफुल्ल किंग्सफोर्ड के घर के बाहर एक पेड़ के अंधेरे में घात लगाए बैठे थे. तभी एक बग्गी बाहर निकली. खुदीराम को लगा शिकार सामने है. उन्होंने दौड़कर उस बग्गी पर बम मार दिया. जोरदार धमाका हुआ. दोनों को लगा कि उन्होंने अपना मिशन पूरा कर लिया है.
लेकिन यहां किस्मत ने एक क्रूर मजाक किया. उस बग्गी में किंग्सफोर्ड नहीं था. उसमें लोकल बैरिस्टर प्रिंगल कैनेडी की पत्नी और बेटी सवार थीं, जिनकी इस हमले में जान चली गई.
एक गलती और गद्दारी ने पकड़वाया
धमाके के बाद दोनों वहां से भागे. वो आसानी से बच निकलते, लेकिन हड़बड़ी में खुदीराम की चादर और जूते वहीं छूट गए. यही चादर पुलिस के लिए सबसे बड़ा सुराग बन गई. रातों-रात पूरे शहर में मुनादी करवा दी गई. "दो बंगाली लड़कों की तलाश है, बताने वाले को 5000 रुपये का इनाम." उस दौर में 5000 रुपये किसी का भी ईमान डिगा सकते थे.
पकड़े जाने के डर से दोनों ने अपने रास्ते अलग कर लिए. प्रफुल्ल कुमार समस्तीपुर स्टेशन पहुंचे. वहां नंदलाल बनर्जी नाम के एक बंगाली पुलिस वाले को उन पर शक हो गया. उसने गद्दारी की और पुलिस को बुला लिया. जब प्रफुल्ल को लगा कि अब बचना नामुमकिन है, तो इस वीर ने अंग्रेजों के हाथ लगने से बेहतर खुद को गोली मारना समझा. अंग्रेजों की क्रूरता देखिए, प्रफुल्ल की पहचान पक्की करने के लिए उन्होंने उस शहीद का सिर काटा और कलकत्ता भेज दिया.

उधर, खुदीराम लगातार 30 किलोमीटर पैदल चलकर वैनी रेलवे स्टेशन (अब पूसा) पहुंचे. भूख-प्यास से हलक सूख रहा था. जैसे ही वो पानी पीने एक हैंडपंप के पास गए, पुलिस ने उन्हें घेर लिया. खुदीराम इतने थक चुके थे कि अपनी पिस्तौल निकाल ही नहीं पाए. जब उन्हें मुजफ्फरपुर पुलिस स्टेशन लाया गया, तो वैन से उतरते ही 18 साल के उस लड़के ने आसमान फाड़ देने वाली आवाज में नारा लगाया "वंदे मातरम."
पूरे देश को बता दिया बम बनाने का फॉर्मूला
जज ने 13 जून को उन्हें फांसी की सजा सुनाई. जज भी सन्न था कि 18 साल के लड़के को मौत की सजा मिल रही है और इसके चेहरे पर डर की एक लकीर तक नहीं है. जज ने पूछा, "क्या तुम फैसला समझ गए?" खुदीराम बोले, "हां, लेकिन मैं आपको बताना चाहता हूं कि मैंने वो बम कैसे बनाया था." सोचिए. उस लड़के को मरने का डर नहीं था, उसे फिक्र थी कि बम बनाने का फॉर्मूला अखबारों के जरिए बाकी देशवासियों तक पहुंच जाए.
उनकी बेखौफी का एक किस्सा और सुनिए. फांसी से पहले जेलर ने उनकी आखिरी इच्छा पूछी. खुदीराम ने कहा, "कुछ आम खाने हैं." जेलर आम ले आया. कुछ देर बाद जब जेलर वापस लौटा, तो आम वैसे के वैसे रखे थे. उसने पूछा, "खाए क्यों नहीं?" खुदीराम हंसते हुए बोले, "खा तो लिए!" जेलर ने पास जाकर देखा, तो खुदीराम ने आम के छिलके को बिना काटे, उसकी गुठली और रस को इतनी सफाई से चूस लिया था कि आम एकदम साबुत लग रहा था. अपनी मौत से चंद घंटों पहले कोई ऐसा मजाक कैसे कर सकता है?
अमर हो गया 18 साल का लड़का
11 अगस्त की सुबह ठीक 6 बजे इस वीर सपूत को फांसी दे दी गई. उस वक्त के अखबारों ने लिखा कि उनकी चिता की भस्म पाने के लिए लोगों में होड़ मच गई. कोई सोने की डिब्बी में, तो कोई चांदी की डिब्बी में उनकी राख भरकर ले गया. बंगाल के जुलाहों ने ऐसी धोतियां बुननी शुरू कर दीं, जिनके किनारे पर 'खुदीराम' लिखा होता था.
आपको शायद पता न हो, खुदीराम के समर्थन में लिखने पर बाल गंगाधर तिलक को छह साल के लिए बर्मा की जेल भेज दिया गया था. और दिलचस्प बात ये है कि उस वक्त कोर्ट में तिलक का केस मोहम्मद अली जिन्ना ने लड़ा था, वही जिन्ना जिसने बाद में देश का बंटवारा करवा दिया.
एक मशहूर बंगाली गीत उस दौर में हर नौजवान की जुबान पर चढ़ गया था-
"एक बार बिदाय दे मा, घूरे आशि... "
(मां, मुझे एक बार विदा कर दे, मैं जल्दी लौटूंगा. फांसी के फंदे पर हंसते-हंसते झूलते हुए, पूरा देश मुझे देखेगा.)
18 साल का वो लड़का यह साबित करने नहीं निकला था कि वो कोई महान क्रांतिकारी है. वो तो बस अपनी भारत मां के लिए अपना फर्ज निभा रहा था. और उसके उसी कर्म ने उसे हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में अमर कर दिया.
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