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जेल से न चले सरकार, तय समय में बरी तो फिर पद पर बहाल, PM, CM रिमूवल बिल पर जेपीसी के कई संशोधन

पीएम, सीएम रिमूवल बिल में जेपीसी ने कुछ अहम संशोधन किए हैं. समिति ने इसमें जेल से सरकार नहीं चलाने की बात कही है. गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने संसद में इस विधेयक को पेश किया था.

जेल से न चले सरकार, तय समय में बरी तो फिर पद पर बहाल, PM, CM रिमूवल बिल पर जेपीसी के कई संशोधन
गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में पेश किया था बिल (फाइल फोटो)
  • पीएम, सीएम रिमूवल बिल पर जेपीसी ने कई संशोधन किए हैं
  • इसमें जेल से सरकार नहीं चलाने की बात कही गई है
  • इसके अलावा जिस अपराध में 5 साल से ज्यादा सजा की संभावना उसी में पद जाने का सुझाव
नई दिल्ली:

संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने पीएम, सीएम और मंत्री की कुर्सी जाने वाले विधेयक पर कई महत्वपूर्ण संशोधन बताए हैं. JPC ने 130वें संशोधन विधेयक पर रिपोर्ट फाइनल कर दी है. कानून के दुरुपयोग रोकने के लिए समिति ने कई संशोधन सुझाए हैं. समिति ने अपने सुझाव में कहा है कि जेल से सरकार नहीं चलनी चाहिए. इसके अलावा हमेशा के लिए कुर्सी जाने के बजाए अस्थायी तौर पर पद से हटाए जाने की सिफारिश की गई है. 

जेपीसी ने अपने संशोधन में कहा कि अगर तय समय के भीतर मंत्री बरी हो जाते हैं या छूट जाते हैं या फिर अभियोजन पक्ष कार्रवाई नहीं करता है तो वे फिर से अपने पद पर बहाल हो सकते हैं. समिति ने गंभीर अपराधों की श्रेणी स्पष्ट की है जिनके आरोप में हिरासत में जाने पर कुर्सी जाएगी.

जिन अपराधों में 5 साल से ज्यादा की सजा संभव, वहीं कुर्सी जाएगी 

जेपीसी ने अपने संशोधनों में एक अहम सुझाव दिया है. समिति ने कहा है कि जिन अपराधों में पांच साल या उससे अधिक की सजा संभव है, केवल उन्हीं के आरोपों में हिरासत में जाने पर कुर्सी जाएगी. ऐसे मामलों की तेजी से सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक या विशेष अदालतें भी बनाई जा सकती हैं बिल के वर्तमान प्रावधान के अनुसार तीस दिन की हिरासत के अगले ही दिन यानी 31वें दिन प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री राष्ट्रपति या राज्यपाल या उपराज्यपाल को कहेंगे कि संबंधित मंत्री को हटा दिया जाए. अगर वे नहीं कहते हैं तो भी मंत्री को अपने आप मंत्रिपरिषद से हटा मान लिया जाएगा.

पीएम या सीएम को लेकर क्या सुझाव 

समिति ने कहा है कि अगर प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री किसी ऐसे अपराध के आरोप में तीस दिन तक हिरासत में रहते हैं जिसमें पांच साल या उससे अधिक सजा का प्रावधान है तो उन्हें 31वें दिन अपने पद से त्यागपत्र दे देना चाहिए. अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो 31वें दिन उन्हें पद से हटा हुआ मान लिया जाएगा. महत्वपूर्ण बात यह है कि वे संसद या फिर विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य बन रहेंगे. इस संशोधन के कारण उनकी सदस्यता नहीं जाएगी. वे केवल प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री का कार्यकारी कार्यालय छोड़ेंगे. जब तक कि वे जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत अयोग्य घोषित नहीं होते, तब तक वे चुने हुए जनप्रतिनिधि बने रहेंगे.

पद पर वापसी का भी प्रावधान

हिरासत से छूटने के बाद वे फिर से प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री बन सकते हैं. जेपीसी की रिपोर्ट के अनुसार संविधान के 75वें (मंत्रिपरिषद से संबंधित), अनुच्छेद 164 (राज्यों के मंत्रिपरिषद से संबंधित) और अनुच्छेद 239 एए (एनसीटी दिल्ली से संबंधित) अनुच्छेदों में संशोधन किए जाएं. यह संशोधन जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन कानून 2019 और यूटी ऐक्ट 1963 (पुड्डुचेरी) पर भी लागू होंगे. जेपीसी के अनुसार प्रस्तावित संशोधन न तो आपराधिक कानूनों को और न ही निर्दोष होने की भावना में बदलाव करते हैं. यह सांसदों और विधायकों को अयोग्य ठहराने वाले अनुच्छेद 102 और 191 में कोई परिवर्तन नहीं करते. यह संघीय ढांचे से छेड़छाड़ नहीं करते क्योंकि मंत्री केवल प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की सलाह पर ही हटाए जा सकते हैं और स्वत: हटेंगे अगर तय समय यानी 30 दिनों के भीतर यह सलाह नहीं दी जाती है. जेपीसी यह रिपोर्ट 17 जुलाई की बैठक में पारित कर सकती है

कैबिनेट में दोबारा जा सकता है बिल

इसके बाद कैबिनेट में यह बिल दोबारा जा सकता है जहां प्रस्तावित संशोधनों पर विचार होगा. फिर सरकार इसे 20 जुलाई से शुरू होने वाले मॉनसून सत्र में ला सकती है. अधिकांश विपक्षी दल इसका विरोध कर रहे हैं. उन्होंने जेपीसी से भी दूरी बना कर रखी और अपने सदस्य इसमें मनोनीत नहीं किए थे. इसे पारित कराने के लिए सरकार को दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी

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