- विधानसभा चुनावों के नतीजों में वंशवाद की राजनीति करने वाली पार्टियों को मतदाताओं ने स्पष्ट रूप से ना कर दिया
- पश्चिम बंगाल में टीएमसी को मात्र 81 सीटें मिलीं जबकि बीजेपी ने 206 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया है
- असम में बीजेपी ने 82 सीटें जीतकर कांग्रेस और गौरव गोगोई को करारी हार दी, गौरव गोगोई अपनी सीट भी खो बैठे
तो क्या वोटर्स अब वंशवाद की राजनीति से ऊपर उठने का मन बना चुकी है? ऐसा हम नहीं कह रहे बल्कि 4 मई को आए 5 विधानसभा चुनाव के नतीजे और उससे पहले के नतीजे साफ खुद बयां कर रहे हैं. फिर वह चाहे असम हो, पश्चिम बंगाल या फिर तमिलनाडु तीनों ही जगह परिवारवाद की राजनीति करने वाली पार्टियों को वोटर्स ने मौका नहीं दिया.
शशि थरूर ने 6 माह पहले कहा था
आपको 6 महीने पहले कांग्रेस सांसद शशि थरूर के एक लेख की याद दिलाते हैं. उन्होंने वंशवाद पर लिखा था कि यह भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरा है. अब देखिए लोगों ने इसे इतनी गंभीरता से लिया कि बंगाल में ममता, असम में गौरव गोगोई और तमिलनाडु में एमके स्टालिन को सत्ता में आने का मौका नहीं दिया.
इस बार कहां वोटर्स ने नकार दिया परिवारवाद
पश्चिम बंगाल जहां बीजेपी ने पहली बार कमल खिलाया वह राज्य भी वंशवाद का ही शिकार है. ममता बनर्जी ने भले अपनी सरकार में अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को शामिल नहीं किया पर वह लोकसभा सांसद होने के साथ पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं. टीएमसी को इस बार मात्र 81 सीटें नसीब हुईं और बीजेपी 206 सीटें लाकर भगवा लहरा गई.
अब असम की ओर नजर दौड़ाइए, मुकाबला हिमंता वर्सेज गौरव गोगोई था पर बीजेपी को प्रचंड जीत दिलाकर जनता ने कांग्रेस समेत गौरव गोगोई को भी झटका दिया है. असम में 126 सीटों में 82 बीजेपी तो कांग्रेस के पास सिर्फ 19 सीटें ही आईं. गौरव गोगोई खुद जोरहाट सीट 23 हजार वोटों के बड़े अंतर से गंवा बैठे. उन्हें भाजपा के हितेंद्रनाथ गोस्वामी ने हराया.पार्टी का हाल तो बुरा हुआ ही, गौरव गोगोई के लिए भी यह एक बुरे सपना साबित हुआ.
तमिलनाडु पर आइए, यहां डीएमके को इस चुनाव एक्टर थलापति विजय ने बड़ा झटका देते हुए बुरी हार दी. विजय की टीवीके ने 108 सीटें जीतीं और डीएमके को मात्र 59 सीटों पर रोक दिया. यहां एमके स्टालिन का सीधा मुकाबला विजय से ही था. एमके स्टालिन को तमिलागा वेत्री कझगम के उम्मीदवार वीएस बाबू ने 8795 वोटों के अंतर से हरा दिया. वीएस बाबू को 82997 वोट प्राप्त हुए तो स्टालिन को 74202 वोट मिले.
पहले इन राज्यों में वंशवाद को नकारा गया
महाराष्ट्र में 2024 में लोकसभा और विधानसभा के बाद बीएमसी चुनाव में जनता ठाकरे परिवार(राज और उद्धव) और शरद पवार की वंशवाद की राजनीति के खिलाफ वोट कर चुके हैं. ओडिशा भी एक उदाहरण है. बीजू पटनायक के बाद नवीन पटनायक तक चली आ रही राजनीतिक विरासत का अंत बीजेपी ने ही किया था. जनता ने नवीन बाबू को करारी हार देते हुए भाजपा को ओडिशा की सत्ता से बाहर कर दिया था. बिहार में तो लगातार लालू यादव की राजद को जनता सत्ता से दूर रख रही है.
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