- प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर अमरिंदर राजा वड़िंग और चरणजीत सिंह चन्नी गुट के बीच गहरा विवाद जारी है
- सवाल है कि यदि प्रदेश अध्यक्ष को लेकर ही इतना विवाद है तो फिर सीएम फेस पर आखिर कैसे बात बन पाएगी
- प्रदेश प्रभारी भूपेश बघेल ने लगभग 90 नेताओं से मिलकर मामला सुलझाने की कोशिश की लेकिन कोई समाधान नहीं निकला
पंजाब में चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस का वही हाल है, जो 2022 में था. तब चरणजीत सिंह चन्नी और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच विवाद इतना था कि दोनों अलग-अलग रैलियों में ही जाते थे. टिकट बंटवारे से लेकर प्रचार तक में खूब खींचतान मची थी. नतीजा आया तो आम आदमी पार्टी ऐतिहासिक बहुमत पाकर सत्ता में आ गई. इस बार कांग्रेस के पास 5 साल की ऐंटी-इनकम्बैंसी को भुनाने का मौका है, लेकिन आपसी कलह उसकी परेशानी बढ़ा रही है. अमरिंदर राजा वड़िंग को फिर से प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है और इस पर पूर्व सीएम चरणजीत सिंह चन्नी के नेतृत्व में बड़ा धड़ा नाराज है.
हालात ऐसे हैं कि प्रदेश प्रभारी भूपेश बघेल भी साधने में फेल रहे हैं. उन्होंने विधायकों, पूर्व विधायकों, चरणजीत सिंह चन्नी और सुखजिंदर सिंह रंधावा समेत करीब 90 लोगों से मुलाकात की. फिर भी कोई समाधान नहीं निकला और अंत में यह कहकर भूपेश बघेल निकले कि आप लोगों का संदेश हाईकमान को दे देंगे. बागी गुट इस बात पर अड़ा है कि प्रदेश अध्यक्ष कोई और होना चाहिए. अमरिंदर हमें स्वीकार नहीं हैं. अब सवाल यह है कि जब प्रदेश अध्यक्ष के पद को लेकर ही पंजाब कांग्रेस में इतनी कलह है तो फिर सीएम फेस की बारी आने पर क्या होगा?
चन्नी ने हाईकमान से कुछ मनवा भी लिया तो क्या अमरिंदर मानेंगे?
प्रदेश अध्यक्ष ही सीएम फेस होगा, ऐसी कोई परंपरा नहीं है. हां, टिकट बंटवारे में जरूर प्रदेश अध्यक्ष की अच्छी पकड़ रहती है. ऐसे में यह सवाल है कि पहले प्रदेश अध्यक्ष के लिए लंबी लड़ाई और फिर सीएम फेस पर भी यदि कलह हुई तो पार्टी की चुनावी संभावनाओं का क्या होगा. यदि चरणजीत सिंह चन्नी गुट अपनी जिद पर अड़ा है और हाईकमान से कुछ मनवा भी लेता है तो क्या गारंटी है कि अमरिंदर राजा वड़िंग और उनके समर्थक सब कुछ चुपचाप स्वीकार कर ही लेंगे.
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अब राहुल गांधी पर ही नजर, 2022 में भी नहीं सुलझे थे मतभेद
इसलिए पंजाब में कांग्रेस का गेम उसके अपने ही नेता यदि खराब कर दें तो कोई हैरानी नहीं होगी. 2022 के चुनाव में भी प्रियंका गांधी और राहुल गांधी ने काफी कोशिशें की थीं, लेकिन अंत तक मतभेद सुलझ नहीं पाए थे. पंजाब में कांग्रेस ही ऐसा दल है, जो आम आदमी पार्टी के मुकाबले सबसे मजबूत है. फिर भी इस तरह का संघर्ष उसे चुनावी जीत की संभावनाओं से दूर करेगा. फिलहाल दिल्ली पर नजर है कि पंजाब का हल क्या निकलता है. राहुल गांधी के इकबाल और मैनेजमेंट की यह परीक्षा भी है.
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