- दुर्गा पूजा के दौरान मछली और मांस न खाने की धीरेंद्र शास्त्री की अपील ने बंगाल में विवाद खड़ा कर दिया है.
- बंगाल बीजेपी अध्यक्ष शमीक भट्टाचार्य ने कहा कि बंगाली वही खाएंगे जो वे हमेशा खाते आए हैं.
- ये अब बंगाली संस्कृति, स्थानीय पहचान और हिंदुत्व की राजनीति के बीच संतुलन का मुद्दा बन गया है.
पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा से पहले इस त्योहार के दौरान मछली-मांस खाने को लेकर नई राजनीतिक बहस छिड़ गई है. दुर्गा पूजा का धार्मिक त्योहार बंगाली समाज की संस्कृति, खानपान, कला, संगीत और पहचान से जुड़ा सबसे बड़ा उत्सव है. यही वजह है कि मछली और मांस को लेकर दिया गया एक बयान अब बड़ा राजनीतिक विवाद बन गया है.
इस विवाद की शुरुआत बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के बयान से हुई. उन्होंने दुर्गा पूजा के दौरान लोगों से मछली और मांस न पकाने और न खाने की अपील की. दुर्गा पंडाल के आसपास मांसाहारी भोजन न बेचने की अपील की. उन्होंने ऐसे लोगों को लेकर भी सवाल उठाए जो पूजा के दौरान मांसाहार करते हैं. दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहारी भोजन करने वालों को धीरेंद्र शास्त्री ने विधर्मी बताया.
#BREAKING During a #HanumatKatha in #Howrah #BageshwarDham Dhirendra Krishna Shastri criticized actor #SwaraBhasker over her remarks on #Jauhar calling it an act of valour and devotion rather than cowardice
— jarvis ☠️ (@Vishii14) September 7, 2026
@BageshwarDhamSarkar @WBPolice
#DhirendraShastri #SwaraBhasker #WB pic.twitter.com/qn6XW4eXAs
इसके बाद बंगाल में इस बयान को लेकर राजनीतिक और सांस्कृतिक बहस शुरू हो गई. लेकिन इस विवाद का सबसे दिलचस्प पहलू ये है कि विपक्षी नेताओं के बयानों के बीच पश्चिम बंगाल बीजेपी अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने भी इसका विरोध किया.
उन्होंने साफ तौर पर कहा कि बंगाली अपनी संस्कृति और परंपरा के अनुसार भोजन करते हैं और कोई भी यह तय नहीं कर सकता कि बंगाल के लोग क्या खाएं. यानी एक तरफ धीरेंद्र शास्त्री धार्मिक आस्था के आधार पर खानपान को लेकर अपील कर रहे थे, तो दूसरी तरफ बंगाल बीजेपी नेतृत्व ने स्थानीय संस्कृति और व्यक्तिगत पसंद को अहमियत देते हुए उनकी बातों को एक तरह से खारिज कर दिया.
बीजेपी के राज्य ईकाई के पूर्व अध्यक्ष दिलीप घोष ने भी मंगलवार को मीडिया से बातचीत में कहा कि क्या खाना है, यह व्यक्ति की निजी पसंद है और बंगाल की दुर्गा पूजा की कुछ परंपराओं में बलि और मांसाहारी प्रसाद की परंपरा भी रही है. वे बोले कि बंगाल में बकरे की बलि और उसके मांस को प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा आज भी मौजूद है. उन्होंने यह भी बताया कि वो खुद भी मछली खाते हैं.
आखिर बंगाल में मछली और मांस इतना बड़ा मुद्दा क्यों है?
बंगाल की पहचान की बात हो और मछली की चर्चा न हो, यह लगभग असंभव है. बंगाली खानपान में मछली खाना वहां की सामाजिक और सांस्कृतिक जिंदगी का हिस्सा रही है. कई परिवारों में पूजा, शादी, पारिवारिक आयोजन और दूसरे मौकों पर अलग-अलग तरह के खानपान की अपनी परंपराएं हैं. लिहाजा जब कोई बाहरी यह कहता है कि पूरे समाज को किसी खास त्योहार पर क्या खाना चाहिए या क्या नहीं खाना चाहिए, तो सवाल यह बन जाता है कि बंगाली संस्कृति की परिभाषा तय करने का अधिकार किसे है?
यही वजह है बंगाल बीजेपी के वर्तमान अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य और पूर्व अध्यक्ष दिलीप घोष दोनों ने इस मुद्दे को सिर्फ धार्मिक आदेश के रूप में स्वीकार करने से इनकार किया. समिक भट्टाचार्य ने स्वामी विवेकानंद का भी संदर्भ दिया और बोले कि उनसे ऊपर कोई बाबा नहीं हो सकता. उन्होंने भी दिलीप घोष की तरह यह तर्क भी रखा कि बंगाल में देवी काली को मांसाहारी भोग की परंपरा से भी जोड़ा जाता है.
बीजेपी के लिए यह मामला इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
बीजेपी लंबे समय से पश्चिम बंगाल में अपनी राजनीति को हिंदुत्व, धार्मिक पहचान और सांस्कृतिक मुद्दों से जोड़ती रही है. लेकिन बंगाल की राजनीति में सिर्फ हिंदुत्व की बात करना पर्याप्त नहीं है. बंगाल की अपनी एक खास सांस्कृतिक पहचान है. क्योंकि धर्म के साथ ही यह भाषाई, साहित्यिक, कला, क्षेत्रीय अस्मिता और खानपान के तौर पर भी बेहद मजबूत राज्य है. यही वजह है कि बीजेपी के लिए धर्म के साथ वहां की संस्कृति के साथ सामंजस्य बिठाने की चुनौती है. और वह सत्ता में रहते हुए इसी संतुलन को साधने में लगी लगती है.
एक तरफ पार्टी को हिंदुत्व की राजनीति के बड़े राष्ट्रीय नैरेटिव के साथ चलना है. दूसरी तरफ बंगाल के मतदाता को यह भरोसा भी दिलाना है कि बीजेपी उनकी स्थानीय संस्कृति और बंगाली पहचान का सम्मान करती है.
समिक भट्टाचार्य ने धीरेंद्र शास्त्री के सम्मान को पूरी तरह खारिज नहीं किया. उन्होंने माना कि शास्त्री लोकप्रिय और सम्मानित धार्मिक व्यक्ति हैं और उन्हें अपनी बात रखने का अधिकार है. लेकिन उन्होंने साथ ही कहा कि उनकी अपील को उनके विचारों को बंगाल के लोगों पर थोपा नहीं जा सकता.
So now, according to the @BJP4Bengal government, Maa Durga has 11 hands?
— All India Trinamool Congress (@AITCofficial) September 7, 2026
From their leaders to the Chief Minister, this repeated mishandling of Maa Durga and Bengal's cultural traditions is deeply insulting!
Durga Puja is not just a festival, it is an emotion and the very… pic.twitter.com/HnnKdeOq7h
टीएमसी हुई बीजेपी पर हमलावर?
तृणमूल कांग्रेस ने इस विवाद को तुरंत बीजेपी से जोड़ दिया. टीएमसी का सवाल था कि अगर बीजेपी नेता और सरकार धीरेंद्र शास्त्री का स्वागत कर रहे हैं और उसके बाद बंगाल में मछली-मांस छोड़ने की बात सामने आ रही है, तो क्या यह बंगाल की खानपान संस्कृति को बदलने की कोशिश है?
टीएमसी ने कहा, "बीजेपी के नेताओं और मुख्यमंत्री का मां दुर्गा और बंगाल की सांस्कृतिक परंपराओं के साथ बार-बार किया जा रहा गलत व्यवहार बेहद अपमानजनक है."
टीएमसी सांसद सौगत रॉय ने कहा, "मुझे नहीं पता कि बागेश्वर बाबा कहां से आए हैं या वे कौन हैं. उन्हें बंगालियों के खान-पान पर टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है. जहां तक बंगालियों की बात है, स्वामी विवेकानंद खुद मांस खाते थे. विवेकानंद से बड़ा शायद ही कोई बंगाली संत हुआ हो. इसलिए मैं बागेश्वर बाबा की टिप्पणियों की निंदा करता हूं."
कांग्रेस और वाम दलों ने भी बीजेपी पर निशाना साधा. कांग्रेस ने इसे बंगाल के लोगों की संस्कृति का अपमान बताया, जबकि सीपीएम ने सवाल उठाया कि लोगों को किसी धार्मिक व्यक्ति की अपील क्यों माननी चाहिए.
What one eats or wears is a personal choice. Bengal's food culture is diverse, and everyone has the freedom to follow their own preferences.
— BJP West Bengal (@BJP4Bengal) September 7, 2026
Bengalis won't have fish or mutton? Even Swami Vivekananda approved of it. No saint, leader or anyone else has the right to decide what… pic.twitter.com/29fHCiLnXB
बीजेपी के अंदर भी एक राय नहीं
इस मामले की एक और दिलचस्प बात यह है कि बीजेपी के भीतर भी धीरेंद्र शास्त्री की बात को लेकर पूरी सहमति दिखाई नहीं दे रही. बंगाल बीजेपी अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य का बयान तो सीधे तौर पर धीरेंद्र शास्त्री की अपील के उलट है. पार्टी के वरिष्ठ नेता तथागत राय ने भी धीरेंद्र शास्त्री की टिप्पणी से सहमति नहीं जताई. इससे यह तो स्पष्ट है कि खुद बीजेपी के अंदर भी यह मुद्दा दो राय रखता है.
यानी अब लड़ाई यह बन गई है कि बंगाल की संस्कृति को कौन परिभाषित करेगा और क्या बीजेपी खुल कर धीरेंद्र शास्त्री की बातों का समर्थन करेगी या नहीं?
अगर पार्टी पूरी तरह धीरेंद्र शास्त्री की बात का समर्थन करती है तो उस पर बंगाली संस्कृति और खानपान पर राज्य के बाहर की धार्मिक सोच थोपने का आरोप लग सकता है.
अगर पार्टी उसका विरोध करती है तो उसके सामने हिंदुत्व से जुड़े अपने समर्थक वर्ग को लेकर सवाल खड़े हो सकते हैं.
शायद यही वजह है कि समिक भट्टाचार्य ने बीच का रास्ता चुनते हुए कहा कि धीरेंद्र शास्त्री को अपनी अपील करने का अधिकार तो है, लेकिन बंगाल के लोग अपनी परंपरा के मुताबिक ही रहेंगे.
BJP's projected "Baba" Dhirendra Shastri is in Bengal to “preach religion”. CM Suvendu Adhikari went to seek his blessings.
— Bengal Cartel 🔱 (@TheBengalCartel) September 6, 2026
Now hear what “Baba” has to say about non-veg during Durga Puja. The chronology of these events might enlighten you about the “public health” concern… pic.twitter.com/AfAoIxHhJO
स्थानीय पहचान vs सांस्कृतिक प्रभाव
पश्चिम बंगाल में बीते कुछ वर्षों से दौरान हिंदुत्व की राजनीति से बीजेपी को फायदा तो मिला है. हालांकि इसी दौरान यहां विभिन्न मुद्दों ने धर्म और संस्कृति की बहस से आगे बढ़कर स्थानीय पहचान बनाम बाहरी सांस्कृतिक प्रभाव का रूप भी लिया है.
बंगाली समाज की अपनी सांस्कृतिक संवेदनशीलताएं हैं. यहां दुर्गा पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि एक भव्य सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव है. इस दौरान निभाए जाने वाली खानपान की परंपरा अन्य प्रांतों की तुलना में अलग है. ऐसे में अगर इस पुरातन परंपरा को बदलने की बात उठेगी तो उसका राजनीतिक असर होना भी स्वाभाविक ही है.
सत्ताधारी बीजेपी के लिए अब यह चुनौती है कि वो इस विवाद को शांत करे और हिंदुत्व की अपनी राजनीति और बंगाल की सांस्कृतिक पहचान के बीच संतुलन बनाए.
समिक भट्टाचार्य ने भी मूल रूप से यही कहा कि धर्म का सम्मान अपनी जगह पर परंपरा और व्यक्ति की पसंद पर किसी बाहरी शख्स का फैसला थोपा नहीं जा सकता.
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