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600 किलो सोना दान करने वाले दरभंगा राज की अभी कितनी संपत्ति, आखिरी महारानी के निधन के बाद अब कौन होगा वारिस?

लंदन से लेकर भारत में कोई ऐसा बड़ा शहर नहीं रहा होगा जहां दरभंगा राज परिवार का दरभंगा हाउस के नाम से अपना आवास न रहा हो. बनारस का दरभंगा घाट आज भी इस राजवंश की प्रभूता का गवाह बना हुआ है.

600 किलो सोना दान करने वाले दरभंगा राज की अभी कितनी संपत्ति, आखिरी महारानी के निधन के बाद अब कौन होगा वारिस?
दरभंगा राज की आखिरी महारानी कामसुंदरी देवी का सोमवार को निधन हो गया.
  • दरभंगा महाराज की आखिरी महारानी कामसुंदरी देवी का 94 वर्ष की आयु में निधन हो गया.
  • दरभंगा राज परिवार ने भारत-चीन युद्ध में 600 किलो सोना, एयरक्रॉफ्ट और जमीन दान कर देश की सेवा की थी.
  • दरभंगा राज ने शिक्षा और उद्योग के क्षेत्र में कई विश्वविद्यालय, कई चीनी मिलें और पेपर मिलें स्थापित कीं.
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दरभंगा:

Darbhanga Maharaj: 'दरभंगा महाराज है का रे', बिहार में यह कहावत लगभग हर घर में बोली जाती है. बच्चा हो या बुढ़ा, यदि कोई ऐसे खर्च की बात करता है, जो परिवार की आर्थिक स्थिति के अनुरुप नहीं होती तो अक्सर कोई ना कोई उसे यही कहता है- दरभंगा महाराज है का रे. इस कहावत का मतलब यह है कि अपने आर्थिक हैसियत से बाहर नहीं जाओ. साथ ही यह कहावत दरभंगा महाराज की विशाल संपन्नता को भी उजागर करती है. लंबे समय तक दरभंगा रियासत की गिनती भारत के सबसे अमीर राजघराने में होती रही है. आखिरी महाराज कामेश्वर सिंह के निधन के समय साल 1962 में दरंभगा महाराज की संपत्ति 2000 करोड़ के करीब आंकी गई थी. जो आज के समय में 4 हजार करोड़ से भी ज्यादा होती.

94 साल की उम्र में आखिरी महारानी कामसुंदरी देवी का निधन

लेकिन कामेश्वर सिंह के निधन के बाद दरभंगा महाराज के ट्रस्टियों ने इस अकूत खजाने को दोनों हाथों से लुटाया. सोमवार को दरभंगा राज की आखिरी महारानी कामसुंदरी देवी का 94 वर्ष की आयु में निधन हो गया. उनके निधन के बाद दाह-संस्कार के दौरान भी विवाद जैसी स्थिति देखी गई. हालांकि बिहार सरकार के मंत्री और स्थानीय प्रशासन की पहल पर महारानी का दाह-संस्कार संपन्न हो गया.

दरभंगा महाराज की अकूत संपत्ति अब बहुत हद तक समाप्त हो चुकी है. लेकिन अभी भी दरभंगा राज के पास इतनी संपत्ति है, जिसकी कीमत अरबों में होगी. ऐसे में राज परिवार में चला आ रहा वारिस का विवाद फिर तेज होने की आशंका है.
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पहले जानिए दरभंगा महाराज की आखिरी महारानी कामसुंदरी देवी के बारे में

महारानी कामसुंदरी देवी, दरभंगा राज के अंतिम महाराजा महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह की तीसरी पत्नी थीं. उनका जन्म 22 अक्टूबर 1932 को मधुबनी जिले के मंगरौनी गांव में हुआ था. मात्र आठ वर्ष की आयु में उनका विवाह महाराजा कामेश्वर सिंह से हुआ. अक्टूबर 1962 में महाराजा के निधन के बाद महारानी ने 64 वर्षों तक सादगीपूर्ण वैधव्य जीवन व्यतीत किया.

दरभंगा राज के आखिरी राजा ने की तीन शादियां, लेकिन निसंतान ही रहे

दरभंगा राज के आखिरी राजा कामेश्वर सिंह की तीन शादियां हुईं, लेकिन वो निसंतान रहे. उनके निधन के बाद तीसरी पत्नी कामसुंदरी देवी ने अपनी बड़ी बेटी के बेटे कुमार कपिलेश्वर को दरभंगा राज का ट्रस्टी बनाया था. फिलहाल कपिलेश्वर दरभंगा राज के घोषित वारिस हैं. लेकिन अंतिम राजा कामेश्वर सिंह द्वारा बनाए गए ट्रस्टियों को लेकर संपत्ति का विवाद चल रहा है.

पिछले साल बिहार में हुए विधानसभा चुनाव के समय दरभंगा राज के उत्तराधिकारी कपिलेश्वर सिंह ने एक पॉडकास्ट में राज परिवार के बारे में काफी डिटेल से बातचीत की थी. इस बातचीत में उन्होंने कांग्रेस गठन, आजादी की लड़ाई के साथ-साथ आजादी के बाद के राज परिवार के दान के बारों में जिक्र किया था.

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भारत-चीन युद्ध के समय 1962 में दरभंगा राज ने 600 किलो सोना किया दान

साल 1962 में भारत-चीन युद्ध के समय जब सरकार ने दरभंगा राजपरिवार से मदद मांगी, तब दरभंगा के इंद्रभवन मैदान में 15 मन यानी 600 किलो सोना तौला गया और उसे लड़ाई में मदद के लिए राज परिवार की तरफ से दान में दिया गया था. साथ ही दरभंगा राज ने अपना तीन-तीन एयरक्रॉफ्ट भी लड़ाई के लिए दान कर दिया. अपना खुद का 90 एकड़ का जमीन भी एयरपोर्ट को दान कर दिया था. आज इसी जमीन पर दरभंगा एयरपोर्ट बना है.

BHU, AMU सहित कई विश्वविद्यालयों के निर्माण में दिया दान

दरभंगा राज के राजकीय परिसर में ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय अवस्थित है. विद्या के लिए इन्होंने अपना सर्वस्व अर्पित करने में कोई कसर बांकी नहीं रखी. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, कलकत्ता विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, पटना विश्वविद्यालय को भी इस परिवार द्वारा प्रचुर अनुदान दिया जाता रहा है. दरभंगा स्थित प्रसिद्ध दरभंगा मेडिकल कॉलेज भी इसी परिवार की देन है.
 

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कई चीनी मिल, पेपर मिल दरभंगा राज ने कराए शुरू

औद्योगिक विकास के क्षेत्र में भी राज परिवार का महत्तम योगदान रहा है सकरी, लोहट, रैयाम और हसनपुर चीनी मिलें, पंडौल में सूत मिल, हायाघाट में अशोक पेपर मिल वहीं समस्तीपुर में रमेश्वर जूट मिल की स्थापना में भी इस परिवार के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता. भारत में विमान सेवा की शुरुआत भी दरभंगा राज से ही मानी जाती है.

लंदन से लेकर भारत में कोई ऐसा बड़ा शहर नहीं रहा होगा जहां दरभंगा राज परिवार का दरभंगा हाउस के नाम से अपना आवास न रहा हो. बनारस का दरभंगा घाट आज भी इस राजवंश की प्रभूता का गवाह बना हुआ है.

रामबाग, आनंद बाग, राज किला सहित कई पैलेस दरभंगा राज की

आज भी दरभंगा राज की भव्य इमारतें, जैसे राम बाग पैलेस, आनन्द बाग पैलेस, नरगौना पैलेस, बेला पैलेस, राज किला, राजनगर स्थित महल और मंदिर, झंझारपुर, भौर, भौडागरही, आदि जगहों पर दरभंगा राज द्वारा निर्मित इमारतें इस राजवंश की निर्माण प्रियता की कहानियाँ कह रहे हैं. राज परिसर में स्थित उनके निजी शमशान घाट में विभिन्न चिताओं के ऊपर बने विराट मंदिर मिथिला की समृद्ध संस्कृति का प्रतीक हैं.

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अभी दरभंगा राज के पास कितनी संपत्ति

मौजूदा समय में दरभंगा राज के पास कितनी संपत्ति है, इसका सटीक विवरण उपलब्ध नहीं है. लेकिन इंडिया टुडे की 2024 की एक रिपोर्ट कहती है कि अक्तूबर, 1962 में आखिरी राजा कामेश्वर सिंह के निधन के वक्त राज की संपत्ति 2,000 करोड़ रु. के करीब बताई गई थी. जो आज के बाजार मूल्य के हिसाब से चार लाख करोड़ रु. रही होगी.

इसमें 14 बड़ी कंपनियां, देश-दुनिया के कई शहरों में बंगले, अरबों के जेवरात, जमीन और शेयर बाजार में उनके नाम पर भारी निवेश था. लेकिन इसी रिपोर्ट में यह बताया गया कि आज उसका दो फीसद भी नहीं बचा है. इसकी तकलीफ दरभंगा महाराज के उत्ताराधिकारी कपिलेश्वर के बयान में भी दिखती है. उन्होंने कहा, "एक पूरी नदी थी, अब छोटा-सा गड्ढा बच गया है. इसे भी लूटने की कोशिश चल रही है."

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