- वेनेजुएला भारत का तीसरा सबसे बड़ा तेल सप्लायर बन गया है और उसने सऊदी अरब और अमेरिका को पीछे छोड़ दिया है.
- मई में कच्चा तेल आयात करीब 49 लाख बैरल प्रतिदिन हो रहा है. इसमें 4.17 लाख बैरल से अधिक वेनेजुएला से आ रहा है.
- फरवरी 2026 में यह आंकड़ा 52 लाख बैरल प्रतिदिन था, जो कि मई की तुलना में तीन लाख बैरल अधिक है.
तेल की खरीद को लेकर भारत के लिए बहुत बड़ी राहत कि खबर ये है कि केवल दो महीने पहले तक भारत जिस देश से एक बूंद भी कच्चा तेल आयात नहीं कर रहा था. उसने मई के महीने में अमेरिका और सऊदी अरब जैसे देशों को पीछे छोड़ दिया और सीधे भारत को तेल सप्लाई करने वाले देशों की सूची में तीसरे पायदान पर आ खड़ा हुआ है. हम बात कर रहे हैं उस देश की, जो भारत को कभी सबसे सस्ता तेल बेचा करता था. आपने सही समझा, ये वेनेजुएला है.
वेनेजुएला बना तेल का तीसरा सबसे बड़ा सप्लायर
वैसे तो वेनेजुएला से अप्रैल से ही तेल की खरीद हो रही है, पर इस महीने यह खरीद हर रोज 417,000 बैरल से भी अधिक हो रही है. अब यह रूस और संयुक्त अरब अमीरात के बाद भारत को तेल सप्लाई करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश बन गया है. भारत को तेल बेचने वाले देशों में उससे आगे सिर्फ रूस और संयुक्त अरब अमीरात हैं.
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पूर्व राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के अमेरिकी गिरफ्त में आने के बाद डेल्सी रोड्रिग्ज वेनेजुएला की अंतरिम राष्ट्रपति बनीं
सबसे बड़ी बात ये है कि अगले हफ्ते वेनेजुएला की राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्ज भारत आ रही हैं और संभावना है कि इस दौरान तेल के लेकर एक बड़ी डील होगी, जैसा कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने बताया है. लेकिन ये अपडेट वेनेजुएला से नहीं बल्कि अमेरिका से आई है तो समझिए क्या है पूरा मामला?
सबसे पहले बता दें कि वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है. जो कि 300 बिलियन बैरल से भी अधिक है. यह कितना बड़ा है इसका अनुमान इसी से लगया जा सकता है कि यह अमेरिका, रूस और सऊदी अरब के कुल तेल भंडार से भी अधिक है, पर इस कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा सिर्फ तेल नहीं है.
असली सवाल ये है कि वेनेजुएला की इस वापसी की खबरें और अपडेट खुद अमेरिका से क्यों निकल रही हैं? और अगले हफ्ते वेनेजुएला के राष्ट्रपति की भारत यात्रा आखिर क्या संकेत दे रही है?
तो इसके पीछे की असली कहानी अमेरिका से जुड़ी है. आपको याद ही होगा कि इस साल की शुरुआत में कैसे वेनेजुएला के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को काराकास से एक विशेष सैन्य अभियान में अमेरिका उठा ले गया था.
अमेरिका जिस तरह आज ईरान पर प्रतिबंध लगाए हुए है, वैसे ही उसने वर्षों से वेनेजुएला के तेल बेचने पर लगाए थे. इसकी वजह थी तब के वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की सरकार के साथ अमेरिका का टकराव.
इन्हीं प्रतिबंधों की वजह से जैसे भारत ईरान से तेल नहीं खरीद पाता है, उसी तरह वेनेजुएला से भी खरीद लगभग बंद कर दी थी.

अब अमेरिका ग्रीन सिग्नल की राजनीति क्या है?
यही सबसे दिलचस्प बात है. दरअसल जानकार ये मानते हैं कि अमेरिका इस समय दो चीजें चाहता है, पहली- अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में सप्लाई बनी रहे, ताकि कीमतें बेकाबू न हों. और दूसरी, भारत जैसे बड़े खरीदार पूरी तरह रूस पर निर्भर न हो जाएं. यही वजह है कि अमेरिका ने वेनेजुएला के तेल निर्यात पर कुछ नरमी दिखाई, जिसके बाद भारतीय रिफाइनर्स ने तेजी से खरीद बढ़ाई.
तो यह अमेरिका की रणनीतिक मंजूरी से जुड़ा मामला माना जा रहा है. पर ठहरिए, यह मत सोचिए कि यह अमेरिका की नरमी बगैर किसी फायदे के है.
बेशक भारत तकनीकी रूप से वेनेजुएला से तेल खरीद रहा है, लेकिन उस खरीद पर नजर और नियंत्रण का एक हिस्सा अब भी अमेरिकी सिस्टम के जरिए चलता है. इसलिए हर बड़ा अपडेट अमेरिकी मीडिया, ट्रेड ट्रैकर्स और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के जरिए बाहर आ रहा है. और यही वजह है कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति के आने की खबर अमेरिका की तरफ से दी गई है.

रूस का ऑयल टैंकर
Photo Credit: AFP
रूस से सस्ता तेल मिल रहा, तो वेनेजुएला की जरूरत क्यों?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है. देश अपनी जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है. इसलिए तेल की कीमतों में थोड़ा भी बदलाव सीधे महंगाई, पेट्रोल-डीजल और अर्थव्यवस्था पर असर डालता है.
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने भारी मात्रा में रूसी तेल खरीदना शुरू किया था क्योंकि वह डिस्काउंट पर मिल रहा था. लेकिन अब रूस पर निर्भरता को संतुलित करने के लिए भारत दूसरे विकल्प भी खोज रहा है. वेनेजुएला उसी रणनीति का हिस्सा बनता दिख रहा है.

वेनेजुएला के राष्ट्रपति की भारत यात्रा क्यों अहम?
रिपोर्ट्स के मुताबिक अगले हफ्ते वेनेजुएला के राष्ट्रपति भारत आ सकते हैं और ऊर्जा सहयोग पर बड़ी बातचीत होने की संभावना है. अगर यह डील आगे बढ़ती है तो भारत को लंबे समय तक सस्ता तेल मिल सकता है और मध्य-पूर्व देशों पर तेल की निर्भरता घट सकती है, जैसा कि बीते दो महीनों में देखा भी गया कि होर्मुज स्ट्रेट के बाधित रहने की वजह से सऊदी अरब से खरीद में 40% से भी अधिक की कमी आई है.
सबसे बड़ी बात, भारत के लिए रूस के विकल्प मजबूत हो सकते हैं. फिलहाल अमेरिका ने रूसी तेल की खरीद पर छूट दे रखी है. अगर वो प्रतिबंधों को फिर से कड़े कर देता है तो भारतीय कंपनियों के लिए भुगतान और शिपिंग मुश्किल हो सकती है. यही कारण है कि भारत संतुलन की नीति पर का कर रहा है. यानी रूस, मध्य पूर्व, अमेरिका और अब वेनेजुएला की भारतीय तेल बाजार में बड़े स्तर पर वापसी.

Photo Credit: NDTV
मध्य-पूर्व से तेल की खरीद कम होने की वजह
अंतरराष्ट्रीय व्यापार का विश्लेषण करने वाली फर्म केप्लर के मुताबिक होर्मुज स्ट्रेट के लगभग बंद होने से अप्रैल में शिपमेंट का आवागमन भी करीब-करीब रुक गया. हालांकि इस महीने इराक से कुछ सप्लाई भारत तक पहुंचने में कामयाब रही. केप्लर के मई के आंकड़ों के मुताबिक भारत को इस महीने अब तक इराक से 51,000 बैरल प्रति दिन) मिले हैं, जबकि ईरान vs इजराइल और अमेरिका युद्ध शुरू होने से पहले फरवरी में यह 969,000 बैरल प्रति दिन था.
उधर, सऊदी अरब से होने वाली सप्लाई, जो 28 फरवरी को ईरान युद्ध छिड़ने से पहले भारत का तीसरा सबसे बड़ा सप्लायर था, इस महीने लगभग आधी होकर 340,000 बैरल प्रति दिन रह गई है, जो अप्रैल में 670,000 बैरल प्रति दिन थी. इसकी एक बड़ी वजह ये भी है कि सऊदी अरब ने अपने तेल की कीमतों में बेतहाशा इजाफा किया है.
बता दें कि भारत किसी एक देश पर तेल की अपनी निर्भरता को कम करने के लिए लगातार विकल्पों की तलाश में रहता है, यही वजह है कि इस समय 40 देशों से तेल की खरीद हो रही है. ये जानकारी पेट्रोलियम मंत्रालय की रिपोर्ट्स में दी गई है.
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