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This Article is From Jan 27, 2021

मुंबई : कोरोना काल में अस्पतालों में डिलीवरी में आई 18% गिरावट, अब बर्थ सर्टिफिकेट पाने में हो रही दिक्‍कत

गायनोकॉलिजस्टडॉ नेहा बोथरा कहती हैं, 'होम डिलीवरी पश्चिमी देशों में लोकप्रिय है. उनके पास ट्रेंड मिडवाइफ़ होती हैं ये ट्रेनिंग सालों लंबी होती है. अपने देश में अभी ऐसा सिस्टम नहीं है.'

मुंबई : कोरोना काल में अस्पतालों में डिलीवरी में आई 18% गिरावट, अब बर्थ सर्टिफिकेट पाने में हो रही दिक्‍कत
प्रतीकात्‍मक फोटो
मुंंबई:

मुंबई शहर में कोरोना महामारी (Corona Pandemic) ने मार्च से ही जोर दिखाना शुरू किया था. कोरोना संक्रमण के चलते मानों दूसरी बीमारियों और ज़रूरी स्वास्थ्य सेवाओं पर विराम लग चुका था.ऐसे में अस्पतालों में होने वाली बच्चों की डिलीवरी में 18% की कमी आई.अस्पताल जाने के खौफ के कारण कई लोगों ने शहर में भी जोखिम उठाते हुए होम डिलीवरी (Home delivery)करवाईं और अब इन्हें बर्थ सर्टिफिकेट पाने में दिक़्क़त हो रही है. मार्च से नवंबर 2020 तक के नौ माह के दौरान मुंबई के अस्पतालों में बच्चों की डिलीवरी में 18% की कमी देखी गई. कोविड-19 संक्रमण से डरे कई लोगों ने घर पर ही  डिलीवरी का जोखिम मोल लिया. झुग्गियों और चॉल में ऐसा ख़तरा उठाने वालों की संख्या ज़्यादा रही.

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मुंबई के सायन इलाक़े में तबस्सुम एक प्राइवेट अस्पताल में नर्स हैं. वे कहती है कि कोरोना लॉकडाउन के दौरान लोगों की गुज़ारिश पर 6 होम डिलीवरी करवा चुकी हैं और इनमें से कई अब बर्थ सर्टिफिकेट के लिए परेशान हो रहे हैं. तबस्‍सुम कहती हैं, 'बहुत से प्राइवेट अस्पताल बंद थे. पेशेंट को मनाती थी कि सायन अस्पताल जाएं लेकिन वे मानते नहीं थे. सब लोग डरते थे कि कोरोना है, नहीं जाएंगे. इस वजह से काफ़ी पेशेंट की डिलीवरी घर पर हुई. जिनके लिए मुझे जाना पड़ा. मैं ऐसा करना तो नहीं चाह रही थी लेकिन वो ज़िद करते थे. अभी उन लोगों को बहुत दिक़्क़त हो रही है उनको बर्थ सर्टिफिकेट नहीं मिल रहा है. सर्टिफिकेट के लिए लोग परेशान हैं.'

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इसी इलाक़े की गायनोकॉलिजस्ट डॉ कविता शिरकंडे बताती हैं की इन होम डिलीवरी के कारण कई गम्भीर मामले डॉक्टर्स को रिपोर्ट हुए. कविता ने बताया, 'जब कोरोना पीक में था तब मैंने देखा कि बहुत सारे हमारे पेशेंट 'बाउंस' हो गए यानी जिन्होंने खुद को रजिस्टर किया था लेकिन उनमें से ज्‍यादातर आए ही नहीं. होम डिलीवरी के जो केसेस हमारे पास आते थे, उनमें बहुत कॉम्प्लिकेशन हुआ करती थीं. एक पेशेंट जो मेरे पास आई थी उसकी नीचे की जगह पूरी फटी थी, पहले उसको स्टिच किया. इस पेशेंट को स्टेबलाइज करना पड़ा, खून पेशेंट का बहुत जा चुका था, नॉर्मल इंसान में हीमोग्लोबिन 12-13% होता है उसमें 4% पाया गया. हमने खून चढ़ाया. होम डिलीवरी केसेस में ऐसे कई कॉम्प्लिकेशन दिखे गए हैं. एक महीने में दो होम डिलीवरी वाले पेशेंट आते थे.'

होम डिलीवरी को लेकर यह है विशेषज्ञों की राय
विशेषज्ञ कहते हैं, भारत का स्वास्थ्य ढाँचा अभी होम डिलीवरी के लिए तैयार नहीं है.फ़ोर्टिस हॉस्पिटल की कन्सल्टंट ऑब्स्टेट्रिशन व गायनोकॉलिजस्टडॉ नेहा बोथरा कहती हैं, 'होम डिलीवरी पश्चिमी देशों में लोकप्रिय है. इसकी वजह ये है कि उनके पास ट्रेंड मिडवाइफ़ होती हैं ये ट्रेनिंग सालों लंबी होती है. अपने देश में अभी तक हम हेल्थ सिस्टम बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन इतनी सिस्टम नहीं है कि घर पर डिलीवरी के लिए हम मरीज़ को प्रोत्साहित करें.' कोविड काल में ये संकट उन कई असाधारण और ख़तरों से भरे वाक़ये में शामिल रहा जिनमें लोग इस वायरस के संक्रमण से बचने के लिए दूसरे ख़तरों से गुज़रते दिखे.

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