
सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)
नई दिल्ली:
तीन तलाक पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर विरोध जताया है. हलफनामे में केंद्र ने कहा कि ट्रिपल तलाक महिलाओं के साथ लैंगिग भेदभाव करता है.
हलफनामे में केंद्र सरकार ने कहा है कि पर्सनल लॉ के आधार पर किसी को संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता. ट्रिपल तलाक महिलाओं के साथ लैंगिक भेदभाव है. महिलाओं की गरिमा के साथ किसी तरह का समझौता नहीं किया जा सकता.
कोर्ट ने कहा, ट्रिपल तलाक की एक धर्मनिरपेक्ष देश में कोई जगह नहीं है. यह महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्व, अनुचित और अन्याय पूर्ण रवैया है. शरिया कानून के तहत ट्रिपल तलाक को धर्मनिरपेक्ष देश में गलत तरीके से रखा गया. यहां तक कि पाकिस्तान और बांग्लादेश समेत 20 मुस्लिम देशों में इस संबंध में कानून बनाए गए हैं.
ट्रिपल तलाक के मामले में ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड पहले ही सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर चुका है. हलफनामे में कहा है कि पर्सनल लॉ को सामाजिक सुधार पर दोबारा से नहीं लिखा जा सकता. तलाक की वैधता सुप्रीम कोर्ट तय नहीं कर सकता.
तीन तलाक कई इस्लामिक देशों में बैन है
पाकिस्तान: 1961 से
बांग्लादेश: 1971 से
मिस्र: 1929 से
सूडान: 1935
सीरिया: 1953
हलफनामे में केंद्र सरकार ने कहा है कि पर्सनल लॉ के आधार पर किसी को संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता. ट्रिपल तलाक महिलाओं के साथ लैंगिक भेदभाव है. महिलाओं की गरिमा के साथ किसी तरह का समझौता नहीं किया जा सकता.
कोर्ट ने कहा, ट्रिपल तलाक की एक धर्मनिरपेक्ष देश में कोई जगह नहीं है. यह महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्व, अनुचित और अन्याय पूर्ण रवैया है. शरिया कानून के तहत ट्रिपल तलाक को धर्मनिरपेक्ष देश में गलत तरीके से रखा गया. यहां तक कि पाकिस्तान और बांग्लादेश समेत 20 मुस्लिम देशों में इस संबंध में कानून बनाए गए हैं.
ट्रिपल तलाक के मामले में ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड पहले ही सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर चुका है. हलफनामे में कहा है कि पर्सनल लॉ को सामाजिक सुधार पर दोबारा से नहीं लिखा जा सकता. तलाक की वैधता सुप्रीम कोर्ट तय नहीं कर सकता.
तीन तलाक कई इस्लामिक देशों में बैन है
पाकिस्तान: 1961 से
बांग्लादेश: 1971 से
मिस्र: 1929 से
सूडान: 1935
सीरिया: 1953
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