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This Article is From Jul 03, 2011

सर्वदलीय बैठक में नहीं बन पाई आम सहमति

नई दिल्ली: भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए प्रस्तावित लोकपाल विधेयक के लिए सरकार की ओर से रविवार को बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में कोई आम राय नहीं बन सकी। यह तय किया गया कि सरकार संसद के आगामी सत्र में एक मजबूत और प्रभावकारी विधेयक पेश करे और उस समय सभी दल अपने विचार रखेंगे। बैठक में करीब तीन घंटे लंबी चर्चा के अंत में केवल एक वाक्य का यह प्रस्ताव पारित किया गया, सरकार स्थापित प्रक्रियाओं का पालन करते हुए संसद के अगले सत्र में मजबूत और प्रभावकारी विधेयक लाए। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने बैठक के बाद बताया कि अधिकतर दलों और खासकर राजग का मानना है कि सरकार संसद के मानसून सत्र में लोकपाल विधेयक पेश करे। इसके बाद इस विधेयक को संसद की स्थाई समिति में भेज दिया जाये, जिसमें सभी दल, राज्य सरकार और समाज के संगठन अपनी राय दे सकें। सुषमा ने कहा कि इसके बाद स्थायी समिति की सिफारिशों के आधार पर संसद के शीतकालीन सत्र में फिर विधेयक को पारित कराने के लिए पेश किया जाए। प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाये जाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि इस बारे में हम संसद की स्थायी समिति में अपनी राय देंगे। उन्होंने यह भी कहा कि हमने आज विधेयक के प्रावधानों पर चर्चा नहीं की। इससे पहले, बैठक शुरू होने पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि सरकार उच्च स्तर पर होने वाले भ्रष्टाचार के मामलों से निपटने के लिये मजबूत और प्रभावशाली लोकपाल के गठन के लिये प्रतिबद्ध है, लेकिन इसे अन्य संस्थानों और कानूनों के सामंजस्य बिठाकर तथा संविधान के मूल ढांचे के अंतर्गत काम करना होगा। सिंह ने कहा कि संसद के आगामी मानसून सत्र में लोकपाल विधेयक लाने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है लेकिन यह हमारे लोकतांत्रिक ढ़ांचे में मौजूद अन्य संस्थाओं की तर्कसंगत भूमिका और उनके प्राधिकार को कमतर नहीं करे। प्रधानमंत्री के इस बयान को अन्ना हज़ारे पक्ष के इस रुख के मद्देनजर अहम माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री और उच्च न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे में आना चाहिए। सरकार का मानना है कि ऐसा करने से सरकार के समानांतर एक और ढ़ांचा निर्मित हो जाएगा। दूसरी ओर मजबूत एवं प्रभावी लोकपाल विधेयक की वकालत करते हुए इंडियन नेशनल लोक दल के रणवीर सिंह प्रजापति ने कहा, हमारे देश के संविधान में सभी लोगों को बराबरी का दर्जा दिया गया है, इसलिए प्रधानमंत्री को भी इसके दायरे में लाया जाना चाहिए। तेलगू देशम पार्टी (तेदेपा) के नमा नागेश्वर राव ने कहा, लोकपाल विधेयक लाने में अब और देरी नहीं की जानी चाहिए और प्रधानमंत्री को भी लोकपाल के दायरे में लाया जाना चाहिए। असम गण परिषद ने भी प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाए जाने की वकालत की। इस सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री के साथ ही कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, केंद्रीय मंत्री प्रणव मुखर्जी, पी चिदंबरम, कपिल सिब्बल, एम वीरप्पा मोइली, सलमान खुर्शीद और पवन कुमार बंसल मौजूद थे। इनके अलावा भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली, जनता दल यूनाइटेड के शरद यादव, रामसुंदर दास और शिवानंद तिवारी, शिरोमणि अकाली दल के सुखदेव सिंह ढींढसा, माकपा के सीताराम येचुरी और वासुदेव आचार्य, भाकपा के गुरुदास दासगुप्ता और डी राजा, सपा के रामगोपाल यादव, बसपा के सतीश चंद्र मिश्र और दारासिंह चौहान, राजद के लालू प्रसाद, अन्नाद्रमुक के वी मैत्रयन और एम थम्बीदुरई मौजूद थे। बैठक में राकांपा नेता और कृषि मंत्री शरद पवार, भारी उद्योग मंत्री प्रफुल्ल पटेल और द्रमुक के टी आर बालू ने भी हिस्सा लिया। प्रधानमंत्री ने अपने शुरुआती संबोधन में कहा कि हमारा संविधान एक-दूसरे के अधिकार क्षेत्र में परस्पर संतुलन की व्यवस्था पर कायम है और लोकपाल के संस्थान को इसी ढ़ांचे में अपनी उचित जगह तलाशनी होगी। उन्होंने कहा, मैं यह कहना चाहूंगा कि भ्रष्टाचार की समस्या से निपटने के लिए एक अच्छा कानून और एक अच्छा संस्थान जरूरी है, लेकिन यह अपने आप में काफी नहीं है। सिंह ने कहा कि हमें यह बात ध्यान में रखनी होगी कि हम जो भी व्यवस्था प्रस्तावित करें, वह हमारे समाज और देश के व्यापक हित में हो। प्रधानमंत्री ने कहा कि भ्रष्टाचार से निपटने के लिये हमें सरकार के कामकाज में पारदर्शिता बढ़ाने, प्रक्रियाओं को आसान बनाने, विशेषाधिकार कम करने और मनमाने तरीकों को समाप्त करने पर ध्यान देना होगा।

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