Chai ka kadak kissa: आज के समय में भारत में लोगों के लिए चाय सिर्फ एक ड्रिंक नहीं, बल्कि उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन गई है. दिन की शुरुआत चाय की चुस्की के साथ करने से लेकर, चाय पर चर्चा तक करने के लिए लोगों के जमावड़े लग जाते हैं. जिस चाय को आज आसानी से बाजार से अलग-अलग तरह की वैरायटी के साथ आप घर में खरीदकर ले आते हैं.
चाय मिलना बहुत ही आसान है. जगह-जगह पर चाय की टपरी पर आपको लोगों का एक समूह देखने को मिल ही जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक समय ऐसा भी था जब इस चाय को पीने के लिए अंग्रेजों को चीन को भारी मात्रा में चांदी देना पड़ता था? इतिहास की थाली नाम की किताब में इस दिलचस्प किस्से का जिक्र मिलता है.
चाय के बदले चांदी
दरअसल, 17वीं और 18वीं सदी में चीन दुनिया की सबसे ताकतवर अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता था. वहां रेशम, चीनी मिट्टी के बर्तन और खास तौर पर चाय की जबरदस्त मांग थी. चीन में ही चाय का जन्म हुआ था. इसलिए चीन अपनी चाय उगाने के तरीके को काफी खूफिया रखता था. दूसरी तरफ ब्रिटिश लोग चीन का सामान खरीदना तो चाहते थे, लेकिन चीन को यूरोप की चीजों में ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी.
उस समय ब्रिटेन अपने आविष्कारों और तकनीक को बड़ी चीज मानता था, लेकिन चीन के लिए इसमें कुछ भी नया नहीं था. कागज, बारूद, कंपास और घड़ी जैसी कई चीजों की शुरुआत सदियों पहले चीन में ही हो चुकी थी. ऐसे में चीन अंग्रेजों को चाय देने की बदले उनका सामान लेने के बजाय उनसे चांदी मांगता था.
चीन वाले उन्हें भाव नहीं देते थे. देते भी क्यों! कागज, घड़ी, बारूद और ऐसे तमाम कथित चमत्कार जिनसे ब्रिटिश दुनिया के बाकी हिस्सों में जनता को चकित करते थे. ये सभी चीन के सदियों पुराने आविष्कार थे. ऐसे में चाय लेने के लिए गोरों को चांदी देनी ही पड़ती थी. यूरोपियन वस्तुओं का शौक बहुत लंबे समय तक चीन को बांधे नहीं रख सका. अब कुछ भी रहें, इन गोरों ने चाहे जिस भी वजह से चीन के इस औषधीय पेय को पीना शुरू किया, धीरे-धीरे उन्हें इसकी आदत पड़ गई.
चाय के लिए प्यार के चक्कर में ब्रिटेन की काफी मात्रा में चांदी चीन को देनी पड़ती थी. इससे ब्रिटेन का व्यापार संतुलन बिगड़ने लगा. इतिहासकार बताते हैं कि इसी दबाव ने आगे चलकर ब्रिटेन को नए व्यापारिक रास्ते खोजने पर मजबूर किया. बाद में ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में बड़े स्तर पर चाय की खेती शुरू करवाई ताकि चीन पर निर्भरता कम की जा सके.
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यही वजह है कि आज असम और दार्जिलिंग जैसी कई जगहें दुनिया भर में अपनी चाय के लिए मशहूर हैं. यानी जिस चाय को आज हम रोज आराम से पीते हैं, उसके पीछे इतिहास में सत्ता, व्यापार और लालच की बड़ी कहानी छिपी हुई है. एक कप चाय ने कभी दुनिया की अर्थव्यवस्था तक हिला दी थी, और शायद यही इस कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा है.
संदर्भ- ये किस्सा अमिमेष मुखर्जी द्वारा लिखी गई 'इतिहास की थाली' से लिया गया है.
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