भारतीय रसोई में तांबे, पीतल और कांसे के बर्तनों का इस्तेमाल सदियों से होता आ आ रहा है. आज भी कई घरों में तांबे के लोटे में पानी रखा जाता है और इसे शरीर के लिए काफी फायदेमंद माना जाता है. लेकिन जब बात तांबे के बर्तन में खाना पकाने की आती है, तो लोगों के मन में अक्सर सवाल उठता है कि क्या इसमें दाल, सब्जी या अन्य खाद्य पदार्थ पकाना सही है या नहीं? आयुर्वेदिक मान्यताओं के अनुसार इसका जवाब थोड़ा अलग है. यूट्यूब चैनल CHAKRADHARI पर इस विषय की जानकारी आयुर्वेदिक एक्सपर्ट ने शेयर की. यहां जानते हैं तांबे के बर्तन में क्यों खाना नहीं पकाया जाता है?
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तांबे और पीतल के बर्तनों में कलाई कराना क्यों जरूरी है?
एक्सपर्ट का कहना है कि तांबे और पीतल, दोनों तरह के बर्तनों में खाना पकाने से पहले कलाई यानि टीन की परत जरूर होनी चाहिए. खट्टे खाद्य पदार्थों के संपर्क में आने पर ये धातुएं रिएक्ट कर सकती हैं, इसलिए टीन की परत खाना को सुरक्षित रखने का काम करती है.
खाना पकाने के लिए पीतल क्यों नहीं माना जाता है सही?
वीडियो में आयुर्वेदिक एक्सपर्ट ने कहा कि पीतल के बर्तन खाना पकाने के लिए तांबे की तुलना में ज्यादा सही हते हैं. इसका कारण ये है कि पीतल गर्म होने पर अपनी मजबूती बनाए रखता है. वहीं, तांबा बहुत अधिक तापमान पर अन्य धातुओं की तुलना में नरम पड़ सकता है. साथ ही पीतल में खाना धीरे और नियंत्रित तरीके से पकता है.
तांबा ज्यादा गर्म क्यों हो जाता है?
तांबा गर्मी का बेहतरीन कंडक्टर माना जाता है. ये आग की गर्मी को तेजी से पूरे बर्तन में फैलाता है. आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से काफी ज्यादा तापमान में खाना पकाने से इसके पोषक तत्व प्रभावित हो सकते हैं. इसी कारण खाना पकाने के लिए पीतल को प्राथमिकता देने की सलाह दी जाती है.
तांबे के बर्तन का सबसे अच्छा उपयोग क्या है?
आयुर्वेद में तांबे के बर्तनों में रखा पानी पीने का विशेष महत्व बताया गया है. वहीं, गुलाब जल या इत्र जैसी चीजों को तैयार करने में, जहां अधिक तापमान की आवश्यकता होती है, तांबे के बर्तनों का उपयोग किया जाता है.
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