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This Article is From Feb 11, 2011

कभी-कभी नहीं मिलते सही शब्द : गुलजार

Mumbai: प्रख्यात गीतकार गुलजार बॉलीवुड में करीब पांच दशक गुजार चुके हैं और उनके 'मोरा गोरा रंग लई ले' से लेकर 'कजरा रे' तक के विविध मनोभावों वाले गीत बताते हैं कि वह कुछ भी लिख सकते हैं। वैसे 74 वर्षीय गुलजार कहते हैं कि शब्दों का चयन कभी-कभी उन्हें भी उलझाता है और कई बार उन्हें भी सही शब्द ढूंढ़ने के लिए मशक्कत करनी पड़ती है। गुलजार ने कहा, कभी-कभी शब्द समझ में नहीं आते, यह हर किसी के साथ होता है, आप कहीं अटक जाते हैं...आपको सही शब्द नहीं मिलते हैं। आप जो लिखना चाहते हैं, वह नहीं लिख पाते हैं। यह हर व्यवसाय का हिस्सा है और इसके बाद भी मैं कई दशकों से लिख रहा हूं, मेरे साथ अब भी कभी-कभी ऐसा होता है। संपूर्ण सिंह कालरा के रूप में जन्मे गुलजार प्रौद्योगिकी सम्पन्न इस युग में भी कागज पर लिखना ही पसंद करते हैं। 'राह पे रहते हैं', 'दो दीवाने इस शहर में', 'हजार राहें मुड़ के देखीं', 'तुझसे नाराज नहीं जिंदगी' और 'मेरा कुछ सामान' जैसे दिल को छू लेने वाले खूबसूरत गीत लिखने वाले गुलजार ने 'कजरारे', 'बीड़ी जलई ले' और नई फिल्म 'सात खून माफ' के 'डार्लिंग' जैसे आधुनिक और चुलबुले गीत भी लिखे हैं। आज की जरूरत के मुताबिक लेखन शैली विकसित करने के संबंध में पद्मभूषण गुलजार कहते हैं, यह एक कुम्हार की तरह है, जो कई तरह के बर्तन बना सकता है। इसी तरह यदि आप अपना काम जानते हैं, तो आप कुछ भी लिख सकते हैं। शैली का कोई सवाल ही नहीं उठता। यदि आप एक शायर हैं तो आपको किसी भी विषय पर लिखने में सक्षम होना चाहिए, फिर चाहे वह कोई रोमांच से भरी कहानी हो या प्रेम कहानी।

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