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Ramadan 2026: रमज़ान को क्यों कहते हैं सियाम का महीना? जानें इसमें रोज़ा रखना क्यों जरूरी है?

Significance of Ramadan: इस्लाम में रमज़ान के महीने को इतना पवित्र क्यों माना गया है? रमज़ान के दौरान रखा जाने वाला रोज़ा क्या सिर्फ एक व्रत या उपवास है? तीन अशरों में बांटे गये माह-ए-रमज़ान का धार्मिक महत्व और रोजा रखने का आध्यात्मिक कारण जानने के लिए पढ़ें ये लेख. 

Ramadan 2026: रमज़ान को क्यों कहते हैं सियाम का महीना? जानें इसमें रोज़ा रखना क्यों जरूरी है?
Ramadan 2026: रमज़ान और रोज़े का क्या है धार्मिक महत्व? 
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Ramadan Ka Dharmik Mahatva Kya Hai: इस्लामी वर्ष का नौवां महीना, रमज़ान, दुनिया भर के मुसलमानों के लिए केवल उपवास के लिए ही नहीं है, बल्कि यह आध्यात्मिक विकास, धैर्य और अल्लाह के करीब आने का एक महत्वपूर्ण अवसर भी है. रमज़ान का सबसे बड़ा गुण यह है कि इसी महीने में अल्लाह सर्वशक्तिमान ने मानवता के मार्गदर्शन के लिए अपनी अंतिम पुस्तक, पवित्र कुरान, अवतरित की. रमज़ान के रोज़े एक ऐसी रूहानी (आध्यात्मिक) वर्कशॉप है, जो इंसान को अनुशासन, त्याग और मानवता का पाठ पढ़ाती है. आइए रमज़ान और इस पाक महीने में रखे जाने वाले रोज़े का धार्मिक-आध्यात्मिक महत्व अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. असद फैसल फारूकी से विस्तार से जानते हैं - 

रोज़ा किसे कहते हैं?

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अरबी में रोज़े को सौम कहते हैं और सौम का बहुवचन सियाम है, इसीलिए रमज़ान को सियाम का महीना भी कहा जाता है. इस्लाम में रोज़ा रखना अनिवार्य है और यह इस्लाम यह इस्लाम के पांच बुनियादी स्तम्भ में से एक है. इस्लाम में हर समझदार और वयस्क व्यक्ति मुस्लिम पुरुष और महिला के लिए रोज़ा रखना अनिवार्य है, बशर्ते वह बिना खुद को नुकसान पहुंचाए रोज़ा रख सके. हदीस के अनुसार, रोज़ा रखना सेहत के लिए ज़रूरी है. मासिक धर्म वाली महिलाओं, गर्भवती, स्तनपान कराने वाली महिलाओं और यात्री, या बीमार लोगों को रोज़ा रखने से छूट है. हालांकि, उन्हें छूटे हुए रोज़े बाद में पूरे करने होंगे. 

रोज़ा रखने के क्या नियम हैं?

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रमज़ान के पूरे महीने में चांद के हिसाब से 29 या 30 दिन होते हैं और रमज़ान का रोज़ा चांद दिखने के साथ शुरू होता है और चांद दिखने के साथ ही खत्म होता है. इस तरह, रोज़े पूरे होने पर ईद मनाई जाती है, जो खुशी का प्रतीक है. 

रोज़ा भोर से पहले (रात का अंतिम पहर) सहरी (भोजन) से शुरू होता है. भोर से पहले भोजन करना सुन्नत है और इसका सवाब भी मिलता है. सुन्नत का अर्थ है वे कार्य जो पैगंबर मुहम्मद (अल्लाह उन पर शांति और आशीर्वाद बरसाए) ने किए. सूर्यास्त के बाद खजूर या पानी से इफ्तार किया जाता है. इस प्रकार रोज़ा खोला जाता है.

इस दौरान खाने-पीने, यौन संबंध बनाने और धूम्रपान से पूरी तरह परहेज़ करने की सलाह दी जाती है. रोज़े के दौरान कुछ भी खाना मना है, यहाँ तक कि दवाइयाँ भी.

रोज़े  (उपवास) का धार्मिक उद्देश्य क्या है?

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इस्लाम में रोज़े का मुख्य उद्देश्य अल्लाह की आज्ञा का पालन करना है. इस आज्ञापालन का फल सवाब के रूप में मिलता है. रोज़े के दौरान हर नेक काम और इबादत के कामों का सवाब बढ़ जाता है. इसके अलावा, रोज़े से भूख और प्यास का एहसास होता है, जिससे दूसरों के दुख-दर्द का एहसास होता है. इससे दान और परोपकार की भावना भी जागृत होती है. खाने-पीने और अन्य चीजों से परहेज करने से अपनी इच्छाओं, स्वार्थ और भावनाओं पर नियंत्रण रखना आसान हो जाता है. इसे आत्म-संयम कहते हैं.

रोज़े  (उपवास) का आध्यात्मिक महत्व क्या है?

रोज़े  (उपवास)  का अर्थ केवल सुबह से शाम तक भोजन और पेय से परहेज करना ही नहीं है. उपवास का वास्तविक उद्देश्य धर्मपरायणता प्राप्त करना है. उपवास व्यक्ति को अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण करना सिखाता है. जब कोई व्यक्ति चिलचिलाती धूप और तीव्र प्यास के बावजूद पानी की एक बूंद भी नहीं पीता, केवल इसलिए कि उसका ईश्वर उसे देख रहा है, तो यह उसके विश्वास की शक्ति को दर्शाता है. यह धर्मपरायणता उसे सिखाती है कि यदि वह अल्लाह की राह में जायज़  हलाल चीजों (भोजन और पेय) को  त्याग कर सकता है, तो वह झूठ, सूदखोरी, चुगली और  बेईमानी जैसी नाजायज़ चीजों को भी अपने जीवन से दूर कर सकता है. इसे आत्म-संयम कहते हैं, जो उपवास सिखाता है.

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रमज़ान का एक महत्वपूर्ण पहलू करुणा की भावना है. रोज़ा रखने से समाज में एकता की भावना उत्पन्न होती है. जब समाज का धनी वर्ग दिनभर भूखा रहता है, तो वह उन गरीबों के कष्टों को समझता है जो साल के बारह महीने गरीबी और अभाव में जीते हैं.  इससे करुणा और मदद (ज़कात और सदक़ा) की भावना पैदा होती है. यही कारण है कि इस महीने में ज़कात और सदक़ा (दान) देने पर विशेष ज़ोर दिया जाता है.

रमज़ान को तीन  अशरों (दस-दस दिनों की  तीन अवधियों) में बांटा गया है.  पहले दस दिन रहमत के, दूसरे दस दिन क्षमा के और तीसरे दस दिन जहन्नम से मुक्ति के होते हैं. आखिरी दस दिनों में शबे कद्र आती है, जो इबादत के लिए एक बड़ा पुण्य है. यह रात रूहानी सुकून की रात है.

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

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