Eid-e-Zahra 2026: मुहर्रम की पहली तारीख से शुरू होने वाला गम का सिलसिला सिर्फ 10 मुहर्रम तक सीमित नहीं रहता. ये गम 2 महीने 8 दिन तक चलता है. इमाम हुसैन (अ.स.) की शहादत की याद में शिया समुदाय मुहर्रम महीने और सफर महीने के दौरान मजलिस, मातम और अजादारी करता है, जिसमें चेहल्लुम आदि का जुलूस भी होता है. फिर रबीउल अव्वल महीने की 9 तारीख का दिन आता है, जिसे शिया समुदायों में ईद-ए-जहरा या ईद-ए-शुजाअ के तौर पर मनाया जाता है. लेकिन सवाल यह है कि आखिर 9 रबीउल अव्वल को ऐसी कौन-सी घटना हुई थी, जिसकी वजह से इसे खुशी के दिन के तौर पर याद किया जाता है?
इस तारीख के साथ करबला में इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों के कातिलों से मुख़्तार-ए-सक़फ़ी ने बदला लिया था. हजरत मुख्तार वो थे जिन्होंने एक फौज बनाई और करबला में जो लोग खून ए इमाम हुसैन के जिम्मेदार थे उनसे बदला लिया. वहीं, गौर करने वाली बात ये है कि उस फौज में हिंदुस्तान से गए मोहियाल ब्रह्मांड भी थे, जिन्होंने उनकी फौज में रहकर इमाम हुसैन के कातिलों से बदला लिया और जैसे ही इमाम हुसैन (अ.स.) के बेटे हजरत सैय्यद ए सज्जाद यानी हजरत ज़ैनुल आब्दीन तक उन कातिलों के मरने की खबर पहुंची तो उनके चेहरे पर मुस्कुराहट आई. साथ ही शियाओं के 11वें इमाम हसन अस्करी (अ.स.) के बाद 12वें और आखिरी इमाम मुहम्मद अल-महदी (अ.स.) की इमामत की शुरुआत आज यानी 9 रबीउल अव्वल से हुई और इसी की खुशी में आज दुनियाभर के शिया खुशियां मनाते हैं.

9 रबीउल अव्वल को आखिर क्या होता है?
शिया धार्मिक परंपरा में 9 रबीउल अव्वल को कई कारणों से महत्वपूर्ण माना जाता है.
1. ईद-ए-ज़हरा
इस दिन को हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.अ.) से जुड़ी खुशी के दिन के रूप में याद किया जाता है.
2. इमाम-ए-ज़माना (अ.स.) की इमामत
8 रबीउल अव्वल को इमाम हसन अस्करी (अ.स.) की शहादत और उसके बाद 9 रबीउल अव्वल को उनके बेटे इमाम मुहम्मद अल-महदी (अ.स.) की इमामत की शुरुआत की मान्यता भी इस दिन के महत्व को बढ़ाती है.
3. करबला के बाद न्याय की याद
मुख़्तार के आंदोलन और करबला के प्रमुख अपराधियों के खिलाफ हुई कार्रवाई को भी इस दिन की धार्मिक स्मृति से जोड़ा जाता है.
4. दो महीने आठ दिन की अज़ादारी के बाद खुशी
मुहर्रम और सफ़र की अज़ादारी के बाद 9 रबीउल अव्वल को खुशी का दिन माना जाता है.

क्या ईद-ए-ज़हरा का मतलब करबला का ग़म खत्म हो गया?
नहीं, यही बात इस दिन को समझने के लिए सबसे ज्यादा अहम है. ईद-ए-ज़हरा करबला को भूल जाने या उसकी यादों से दूर होने का दिन नहीं है. इमाम हुसैन (अ.स.) की शहादत इस्लामी इतिहास की ऐसी महान घटना है, जिसे शिया समुदाय अपनी धार्मिक, आध्यात्मिक और नैतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है. करबला का पैगाम हमेशा जिंदा रहता है और हक, इंसाफ और ज़ुल्म के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा देता है.
मुहर्रम में ग़म, अश्क और शहादत की याद होती है, तो 9 रबीउल अव्वल में उम्मीद, शुक्र और इंसाफ़ की जीत का एहसास होता है. मुहर्रम हमें इमाम हुसैन (अ.स.) के सब्र, कुर्बानी और संघर्ष की याद दिलाता है, जबकि 9 रबीउल अव्वल अहले-बैत (अ.स.) से मोहब्बत रखने वालों के लिए खुशी और उम्मीद का दिन माना जाता है. यह दिन इस बात का संदेश देता है कि इंसान को हमेशा हक के साथ खड़ा रहना चाहिए, ज़ालिम के खिलाफ आवाज बुलंद करनी चाहिए और न्याय तथा सत्य के रास्ते पर डटे रहना चाहिए.
ईद-ए-ज़हरा पर क्या करें?
इमाम हुसैन (अ.स.) का नाम इंसाफ, सब्र, इंसानियत, नैतिकता और सच्चाई की बुलंद मिसाल है. इसलिए ईद-ए-ज़हरा की खुशी भी इन्हीं मूल्यों के साथ मनाना सबसे बेहतर माना जाता है. इस दिन इबादत करना, अल्लाह का शुक्र अदा करना, सदका देना, गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करना, रिश्तेदारों से मुलाकात करना और अच्छे अख़लाक़ का प्रदर्शन करना, इसके संदेश को और अधिक सार्थक बनाता है.
करबला समेत हर श्राइन में रेड से हो जाती है ग्रीन लाइट
जहां इमाम हुसैन की शहादत हुई थी वो करबला है जहां इमाम हुसैन और हजरत अब्बास का श्राइन बना हुआ है. पूरे मोहर्रम और सफ़र के महीने में रेड लाइट श्राइन में रहती है. रबी अव्वल के महीने में ग्रीन लाइट यानी खुशी के रूप में चलती है.

काले कपड़े छोड़ पहनते हैं रंग बिरंगे खुशी के कपड़े
2 महीने 8 दिन तक काले कपड़े यानी सोग के रूप में मनाया जाता है. इसमें कोई भी खुशी नहीं मनाई जाती. न कोई शादी होती, न किसी के खुशी के दिन मनाए जाते हैं. आज से यानी 9 रब्बिअव्वाल से खुशियां मनाई जाती है.अब शादियां भी होंगी और जन्मदिन भी खुशियों के साथ मनाए जाएंगे. वहीं, ईरान, इराक समेत जहां जहां शिया रहते हैं वहां आज खुशियों के साथ जश्न मनाया जा रहा है.
क्या- क्या होता है इन 2 महीने 8 दिन तक? दिल्ली में भी तीन बार निकलता है इन दिनों में ताजिया
इस्लामिक केलेंडर के पहला महीना ही गम का महीना होता है. जो मोहर्रम का महीना होता है. मोहर्रम महीने का चांद दिखते ही शिया अपने घरों में काले कपड़े झंडे, मजलिस मातम में लग जाते हैं. 10 मोहर्रम को इमाम हुसैन की अपने 72 साथियों के साथ करबला में यजीद की फौज के जरिए शहादत हुई थी. जिनकी शहादत को याद करते हुए अगले 40 दिन यानि इमाम हुसैन का चेहल्लुम मनाते हैं. जिसमें दिल्ली के जामा मस्जिद से लेकर शाहे मर्दा जोर बाग करबला तक जुलूस शांतिपूर्ण जाता है जिसे सफेद ताजिया भी कहा जाता है. जिसके बाद 7 रबी अव्वल को अलविदा इमाम हुसैन की याद में काला ताजिया निकाला जाता है. जो जामा मस्जिद से जोर बाग तक जाता है. वहीं लखनऊ, हैदराबाद समेत हिंदुस्तान के कौने कौने में आखिरी अलविदा जुलूस निकलता है. दुनियाभर से इमाम हुसैन के चाहने वाले उनका चेहल्लुम मानने इराक के करबला भी जाते हैं जहां उनकी शहादत हुई थी.
कौन थी जनाबे ज़ैनब, जिन्होंने शुरू की थी आज़ादारी जो 1400 साल से हो रही?
इमाम हुसैन की दो बहनें करबला में मौजूद थी जिनमें एक थी जनाबे ज़ैनब तो दूसरी थी जनाबे कुलसुम सअ, जनाबे ज़ैनब ने खुद अपने दो छोटे बच्चे अपने भाई इमाम हुसैन पर कुर्बान कर दिए और वो दोनों बच्चे भी करबला के 72 शहीदों में आ गए..वहीं जनाबे ज़ैनब ने अपने आँखों के सामने अपने भाई इमाम हुसैन का सर कांटते हुआ देखा था..जनाबे ज़ैनब ने अपने भाइयों, भतीजों और परिवार के नौजवानों की शहादत का दर्द सहा था, उस जनाब-ए-ज़ैनब (स.अ.) के दिल पर करबला का दर्द कितना गहरा रहा होगा, इसका अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल है. लेकिन जनाब-ए-ज़ैनब (स.अ.) सिर्फ़ मातम करने वाली बहन नहीं थीं. वह करबला के संदेश की सबसे बड़ी आवाज़ बनकर सामने आईं.

कूफ़ा से लेकर शाम तक उन्होंने यज़ीद के दरबार में भी सच बोलने से परहेज़ नहीं किया. उन्होंने दुनिया को बताया कि करबला में कौन शहीद हुआ और किस तरह अहले-बैत (अ.स.) पर ज़ुल्म किया गया. उन्होंने यजीद जो उस वक्त का शासक बना हुआ था उसके दरबार में जाकर भी उसे ज़लील किया और पूरे दरबार के सामने बताया कि जिस इमाम हुसैन को तूने क़त्ल किया है वो हजरत मोहम्मद साहब का नवासा था, जो उनकी पीट पर झुला झुला करते थे. तुमने उन्हें तीन दिन का भूखा प्यासा शहीद कर दिया. कैसे ज़ालिम लोग हो तुम. आखिर असली इस्लाम हमारा है जिसमें हमने शहीद होना आसान समझा लेकिन तेरे जैसे ज़ालिम के सामने सर झुकाना पसंद न किया. बस इसी तरह की तकरीर से पूरा यजीद का दरबार कांप उठा और जिसके बाद जनाबे ज़ैनब और उनके साथ बचे काफिले को कैद खाने में रख दिया गया.
इसके बाद जब उन्हें रिहा किया गया तो रिहा होने के बाद जनाबे ज़ैनब ने अपनी भाई की याद में फर्श ए अज़ा वहीं सीरिया के शाम में बिछाया और उनकी शहादत की दास्तां बयान की. जिसके बाद हर आंख से आंसू बहने लगे. तभी से बीबी ज़ैनब ने वादा किया था कि अपने भाई की इस आजादरी को क़यामत तक जारी रखूंगी और तभी 1400 से ज्यादा का वक़्त हो गया है. आज तक जैसे ही मोहर्रम का महीना आता है तब से लेकर हर शिया गम में शरीक हो जाता है. मजलिस मातम दो महीने 8 दिन तक करता है और जिस दिन बीबी ज़ैनब समेत इमाम हुसैन के परिवार वाले खुश हुए थे जब उन्होंने इमाम हुसैन के कातिलों के मरने की खबर सुनी थी तब उस दिन को सभी शिया ईद ए ज़हरा के रूप में मनाते हैं जो आज तक कायम है.
जनाब-ए-ज़ैनब (स.अ.) की सबसे बड़ी जीत, 1400 साल से क्यों मोहर्रम में मनता है ग़म
जनाब-ए-ज़ैनब (स.अ.) की असली ताकत सिर्फ़ यह नहीं थी कि करबला के कुछ अपराधियों को बाद में सज़ा मिली. उनकी सबसे बड़ी जीत यह थी कि उन्होंने करबला को इतिहास में दबने नहीं दिया. जब उनसे पूछा गया कि करबला के बाद क्या देखा, तो उनसे जुड़ा एक मशहूर वाक्य बयान किया जाता है- "मैंने खूबसूरती के सिवा कुछ नहीं देखा." यह वाक्य जनाब-ए-ज़ैनब (स.अ.) की उस महान सोच को दर्शाता है जिसमें शहादत हार नहीं, बल्कि सत्य की विजय थी. इसलिए जब आज 9 रबीउल अव्वल पर खुशी की बात होती है, तो उसके पीछे सिर्फ़ बदला लेने की भावना नहीं होनी चाहिए.
इसके पीछे जनाब-ए-ज़ैनब (स.अ.) का वह संदेश भी होना चाहिए कि— सच्चाई को दबाया जा सकता है, मिटाया नहीं जा सकता. शहीद को मारा जा सकता है, उसके मिशन को नहीं. करबला को खत्म समझा जा सकता है, लेकिन ज़ैनब (स.अ.) उसकी आवाज़ को दुनिया तक पहुंचा देती हैं. शायद यही वजह है कि करबला के बाद आने वाली हर खुशी में भी ज़ैनब (स.अ.) की याद मौजूद रहती है. क्योंकि अगर हुसैन (अ.स.) ने करबला में अपने खून से इतिहास लिखा था, तो ज़ैनब (स.अ.) ने अपने शब्दों से उस इतिहास को दुनिया तक पहुंचाया. हुसैन (अ.स.) ने कुर्बानी दी, ज़ैनब (स.अ.) ने उस कुर्बानी को आवाज़ दी, और करबला की यही आवाज़ आज भी ज़िंदा है.
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