...तो आखिर अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली का किला फतह कर ही लिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 'बाजीगरी' और अमित शाह की 'चाणक्य नीति' धरी की धरी रह गईं... तो क्या मान लिया जाए कि मोदी का करिश्मा फीका पड़ रहा है या फिर मुकाबले में मौजूद दूसरा खिलाड़ी सचमुच इतना ताकतवर और दांव-पेंच वाला है, जिसके आगे बीजेपी के तमाम सूरमा मार खा गए। नतीजे आने से पहले अमित शाह ने कहा था कि अगर दिल्ली का प्रयोग सफल हो जाता है तो अगले 25 साल तक बीजेपी को कोई नहीं हरा सकता।
मेरा मानना है कि न मोदी का करिश्मा फीका पड़ा है, न ही अमित शाह की 'चाणक्य नीति' असफल हुई है, क्योंकि वास्तव में मोदी का कोई करिश्मा न पहले था, न अब है, और जब कोई करिश्मा था ही नहीं तो उसके फीके पड़ने का सवाल ही नहीं उठता। इसी तरह अब तक भाजपा अमित शाह की रणनीति से नहीं, बल्कि विभिन्न प्रदेशों की स्थिति और विपक्ष में फूट का फायदा उठाकर जीतती आ रही है। यह तो मोदीभक्त मीडिया है, जिसने इसे करिश्मे और रणनीति का नाम दे दिया। पता नहीं लोग यह क्यों भूल जाते हैं कि बीजेपी लोकसभा चुनाव में बिखरे विपक्ष के बाद भी महज 31 फीसदी वोट लाकर 282 सीटें लाई थी। इसमें अगर एनडीए को मिले वोट भी जोड़ दें तो कुल साढ़े 38 फीसदी वोट ही उन्हें मिले थे। इससे पहले, शायद ही ऐसा हुआ था कि इतने कम वोट लाकर कोई पार्टी केंद्र में इस तरह के बहुमत के साथ सरकार बना ले।
लोकसभा चुनाव के बाद, जितने भी राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए हैं, वहां के हालात दिल्ली से बिल्कुल अलग थे। मसलन, हरियाणा में कांग्रेस के खिलाफ एन्टी-इन्कम्बेन्सी फैक्टर जमकर काम कर रहा था और बीजेपी के अलावा कोई विकल्प भी वहां नहीं था, लिहाजा बीजेपी को जीत मिली। वहीं, झारखंड में भी यही हाल था कि विपक्ष एकजुट नहीं था, जिसका फायदा बीजेपी को मिला। ऐसा ही हाल महाराष्ट्र का भी था। लोग कांग्रेस सरकार से तंग आ चुके थे और विपक्ष में बिखराव था। जैसे-तैसे बीजेपी और शिवसेना की सरकार फिर बन गई। यही हाल जम्मू-कश्मीर का भी रहा। लोग नेशनल कॉन्फ्रेंस से तंग आ चुके थे और विकल्प के तौर पीडीपी और बीजेपी दिखीं तो लोगों ने उन्हें ही चुना। कहने का मतलब है, जहां भी मुकाबले में ठोस विकल्प था, लोगों ने उसे चुन लिया।
ध्यान देने वाली बात यह भी है कि इन राज्यों में ऐसा कोई करिश्माई नेता नहीं था, जिस पर जनता विश्वास कर सके। जहां-जहां राज्यों में करिश्माई व्यक्तित्व के धनी नेता हैं, वहां मोदी का जादू नहीं चला है। तमिलनाडु में जयललिता, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, ओडिशा में नवीन पटनायक और तेलंगाना में चंद्रशेखर राव जैसे नेताओं की मौजूदगी में मोदी कुछ नहीं कर पाए। वहीं, अगर राजस्थान, मध्य प्रदेश और छतीसगढ़ में बीजेपी इतनी सीटें जीती भी है तो इसमें राज्य के नेताओं की बड़ी भूमिका और कांग्रेस की पतली हालत बड़े कारण हैं।
वहीं दिल्ली में पहली बार नरेंद्र मोदी और अमित शाह का टेस्ट हुआ। यहां लोगों के पास अरविंद केजरीवाल के तौर पर मजबूत विकल्प था, सो, नतीजा सबके सामने है। अगर दिल्ली से सबक लेकर विपक्ष बिहार, बंगाल और उत्तर प्रदेश में लड़े तो मुकाबला काफी दिलचस्प हो सकता है। हालांकि दिल्ली में जीत के बाद भी केजरीवाल को राष्ट्रीय स्तर पर एक विकल्प के तौर पर उभरने में समय और काफी मेहनत लगेगी, लेकिन अगर विपक्ष के साथ मिलकर वे बीजेपी के खिलाफ खड़े होते हैं तो ज्यादा असरदार होंगे।
This Article is From Feb 11, 2015
राजीव रंजन की कलम से : अब तक मोदी के करिश्मे से नहीं, बिखरे विपक्ष से जीत रही थी बीजेपी
Rajeev Ranjan, Vandana Verma
- Election,
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Updated:फ़रवरी 11, 2015 16:41 pm IST
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Published On फ़रवरी 11, 2015 13:50 pm IST
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Last Updated On फ़रवरी 11, 2015 16:41 pm IST
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