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जेब में थे सिर्फ 800 रुपये, गौशाला से शुरू की एकेडमी, असम के इस व्यक्ति ने संवारा बच्चों का भविष्य

पारिजात एकेडमी की शुरुआत उत्तम टेरोन ने की थी. इस एकेडमी में गरीब बच्चों को फ्री में पढ़ाया जाता है.असम के दूरदराज के गांवों में रहने वाले बच्चों के लिए पारिजात एकेडमी शुरू की गई थी. अब तक इस स्कूल से 2,000 से ज्यादा बच्चे पास होकर निकले हैं.

जेब में थे सिर्फ 800 रुपये, गौशाला से शुरू की एकेडमी, असम के इस व्यक्ति ने संवारा बच्चों का भविष्य
आज पारिजात एकेडमी में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या 350 हो गई है.

पारिजात एकेडमी (Parijat Academy) के जरिए कई सालों से असम के बच्चों को फ्री में शिक्षा दी जा रही है. पारिजात एकेडमी की शुरुआत 2003 के आसपास हुई थी. उत्तम टेरोन पारिजात अकादमी के संस्थापक है. उस दौरान एक गौशाला को क्लासरूम बनाया गया था और बच्चों की पढ़ाना शुरू किया गया. आज के समय में करीब 2 हजार से ज्यादा बच्चों को पढ़ाकर उनकी जीवन संवारा गया है. इस एकेडमी की शुरुआत तब हुई जब उत्तम टेरोन ने पाया कि दूरदराज के गांवों में रहने वाले बच्चों के पास शिक्षा तक अच्छी पहुंच नहीं है.

बच्चों का बनाया भविष्य

उत्तम टेरोन ने गांव के बच्चों को शिक्षित करने का सपना देखा. उत्तम टेरोन की जेब में सिर्फ 800 रुपये थे. ऐसे में उन्होंने अपने घर की गौशाला को एक छोटे क्लासरूम में बदल दिया. धीरे-धीरे आस-पास के गांवों के लोग अपने बच्चों को यहां भेजने लगे. उत्तम ने अपने इस सफर के बारे में बताते करते हुए एक मीडिया हाऊस को बताया कि "मैंने अपने घर में गौशाला को क्लासरूम में बदला.  बच्चों को फ्री में पढ़ाना शुरू किया. इस दौरान मां ने साथ दिया. चार स्टूडेंट्स के साथ इसे शुरू किया गया था. "

2,000 से ज्यादा छात्र स्कूल से हुए पास

उत्तम टेरोन के अनुसार उन्होंने पारिजात एकेडमी की शुरुआत इस सोच के साथ की थी कि जरूरतमंद बच्चों की पढ़ाई बेहतर हो. पढ़ाई के जरिए गरीबी, बाल मज़दूरी कम हो. इस एकेडमी की शुरुआत 4-6 साल की उम्र के बच्चों को पढ़ाने से हुई थी. आज यहां छात्रों की संख्या 350 हो गई है. अब तक स्कूल से पास होने वाले छात्रों की संख्या 2,000 से ज्यादा है. यहां से पढ़ाई करके निकले कई छात्र सरकारी नौकरी कर रहे हैं. 

शंकर बोंगजांग ने यहां से चौथी से दसवीं कक्षा तक पढ़ाई की है और आज असम पुलिस में कॉन्स्टेबल हैं. शंकर बोंगजांग के अनुसार "जब मैं बड़ा हो रहा था, तो आस-पास कोई स्कूल नहीं था, इसलिए मैंने पारिजात में दाखिला लिया, जो मेरे गांव से लगभग 25 किलोमीटर दूर था. मैं सिर्फ 11 साल का था और उत्तम सर ने मुझे अपनी देखरेख में ले लिया. मैं 10 साल तक यहां के हॉस्टल में रहा. मैं आज असम पुलिस में कॉन्स्टेबल के तौर पर सेवा दे रहा हूं."

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