- 1993 में तांबा लूटने के लिए ट्रक ड्राइवर की जहर देकर हत्या करने वाला दिल्ली पुलिस की गिरफ्त में.
- दिल्ली पुलिस ने 'कोल्ड केस' को बिना किसी आधुनिक तकनीक, CCTV फुटेज या डिजिटल रिकॉर्ड के सुलझाया है.
- 1984 में सेना से बर्खास्त हुआ यह शातिर आरोपी पुलिस से बचने के लिए 'पोनीटेल' रखकर, नाम बदला.
दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने एक ऐसा मामला सुलझाया है, जिसे पुलिस की भाषा में 'कोल्ड मर्डर केस' कहा जाता है. यह वह मामला था जो करीब 33 साल से अधूरा पड़ा था और जिसमें आरोपी दिल्ली पुलिस की गिरफ्त से बाहर था. अब क्राइम ब्रांच की सेंट्रल रेंज टीम ने 59 वर्षीय राजेंद्र सिंह उर्फ राजू उर्फ सागर उर्फ राजेंद्र डागर को गिरफ्तार कर लिया है. आरोपी पर 15 जून 1993 को एक ट्रक ड्राइवर की हत्या कर तांबे की खेप लूटने का आरोप है.
दिल्ली पुलिस के अनुसार, यह गिरफ्तारी केवल एक आरोपी की गिरफ्तारी नहीं है, बल्कि तीन दशक से अधिक समय से फरार चल रहे एक ऐसे अपराधी को कानून के शिकंजे में लाने की कहानी है, जिसने अपनी पहचान, हुलिया और ठिकाने बदल-बदलकर पुलिस को लगातार चकमा दिया.
झुंझुनूं खेतड़ी से थे चालक रामसिंह
यह कहानी शुरू होती है राजस्थान के झुंझुनूं जिले के खेतड़ी इलाके से. यहां रहने वाले राम सिंह पेशे से ट्रक ड्राइवर थे और 'हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड' के लिए तांबे की खेप ढोने का काम करते थे. उस समय राजस्थान के खेतड़ी क्षेत्र में बड़ी मात्रा में तांबा निकलता था, जिसे देश के अलग-अलग हिस्सों में भेजा जाता था.
राजेंद्र सिंह की नजर काफी समय से इस तांबे की खेप पर थी. वह राम सिंह को जानता था और उसे मालूम था कि राम सिंह कब और किस रूट पर माल लेकर दिल्ली आता है. इसी जानकारी के आधार पर उसने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर एक खतरनाक योजना बनाई.
दो दिन बाद, 17 जून 1993 को लाहौरी गेट थाने में हत्या का मामला दर्ज किया गया. जांच शुरू हुई तो पुलिस को पता चला कि मृतक को आखिरी बार राजेंद्र सिंह के साथ देखा गया था. इसके बाद पुलिस ने उसकी तलाश शुरू की, लेकिन वह हाथ नहीं आया.
1994 में घोषित हुआ भगोड़ा राजेंद्र सिंह
हत्या के बाद राजेंद्र सिंह अचानक गायब हो गया. पुलिस ने कई जगहों पर दबिश दी, लेकिन उसका कोई सुराग नहीं मिला. आखिरकार अदालत ने 1994 में उसे भगोड़ा (अपराधी) घोषित कर दिया. इसके बाद साल दर साल गुजरते गए, जांच अधिकारी बदलते रहे, लेकिन आरोपी पुलिस की पकड़ से दूर रहा. धीरे-धीरे मामला पुराना होता गया और यह उन मामलों में शामिल हो गया जिन्हें सुलझाना बेहद मुश्किल माना जाता है.
33 साल पुराने केस को दोबारा खोला गया
दिल्ली क्राइम ब्रांच की सेंट्रल रेंज ने कुछ महीने पहले इस पुराने केस की फाइल को दोबारा निकाला. अधिकारियों ने तय किया कि चाहे मामला कितना भी पुराना क्यों न हो, आरोपी को ढूंढकर कानून के सामने लाया जाएगा. इसके लिए इंस्पेक्टर सुनील कुमार कालखंडे की अगुवाई में एक विशेष टीम बनाई गई. टीम में एसआई बीरपाल सिंह और कई अनुभवी पुलिसकर्मियों को शामिल किया गया. पूरी कार्रवाई एसीपी सतेन्द्र मोहन की निगरानी में चलाई गई.
जांच शुरू होते ही सबसे बड़ी समस्या यह सामने आई कि 1993 के मुकाबले अब हालात पूरी तरह बदल चुके थे. उस समय आरोपी लगभग 25 साल का था, जबकि अब उसकी उम्र करीब 59 साल हो चुकी थी. ऐसे में उसकी पुरानी तस्वीरें या हुलिया किसी काम का नहीं था. क्राइम ब्रांच की टीम ने पुराने कोर्ट रिकॉर्ड, गवाहों के बयान और केस से जुड़े दस्तावेजों का बारीकी से अध्ययन किया. जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि राजेंद्र सिंह केवल इस हत्या में ही शामिल नहीं था, बल्कि उसके खिलाफ पहले भी ट्रक ड्राइवरों को धोखा देकर वाहन और माल हड़पने के मामले दर्ज थे.
यही जानकारी जांच की दिशा बदलने वाली साबित हुई. पुलिस को समझ आ गया कि आरोपी एक आदतन अपराधी है और उसके पुराने नेटवर्क को खंगालना जरूरी होगा.
इसी दौरान पुलिस को पता चला कि आरोपी जिंदा है और कभी-कभी गांव आता है, लेकिन ज्यादातर समय कहीं बाहर ही रहता है. तकनीकी निगरानी के दौरान पुलिस को एक संदिग्ध मोबाइल नंबर मिला. यह नंबर अक्सर बंद रहता था, लेकिन जब भी चालू होता, उसकी लोकेशन अलग-अलग शहरों में मिलती थी. कभी वह राजस्थान में दिखाई देता, कभी हरियाणा में, तो कभी किसी दूसरे राज्य में. खास बात यह थी कि हर बार लोकेशन किसी होटल या गेस्ट हाउस के आसपास मिलती थी. इससे पुलिस को यकीन हो गया कि यह व्यक्ति लगातार होटल बदलकर रह रहा है और अपनी असली पहचान छिपा रहा है.
पूछताछ में आरोपी ने बताया कि फरारी के दौरान उसने पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, मुंबई और गोवा सहित कई जगहों पर समय बिताया. मुंबई में उसने बार में नौकरी की और कुछ समय तक वड़ा पाव बेचने का काम भी किया. बाद में वह गोवा पहुंच गया, जहां करीब दो साल तक एक कैसीनो में काम करता रहा.
पुलिस के मुताबिक, वह जहां भी जाता, अपनी पहचान बदल लेता था. कभी नया नाम रखता तो कभी नया पता बता देता था. उसने अपना हुलिया भी बदल लिया था; वह लंबे बाल और पोनीटेल रखकर घूमता था ताकि कोई उसे पहचान न सके.
नारनौल में बिछाया गया जाल
लगातार निगरानी के बाद पुलिस को सूचना मिली कि आरोपी हरियाणा के नारनौल इलाके में मौजूद है. इसके बाद क्राइम ब्रांच की टीम वहां पहुंची. पुलिस ने पूरे इलाके में होटलों और गेस्ट हाउसों की जांच शुरू की. लगभग 12 से 15 होटलों की तलाशी ली गई. आखिरकार एक होटल में एक व्यक्ति संदिग्ध हालत में मिला, जो नकली पहचान के दस्तावेजों के सहारे रह रहा था. जब पुलिस ने उसकी गहराई से जांच की तो पता चला कि वही 33 साल से फरार चल रहा राजेंद्र सिंह है. इसके बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया.
पूछताछ में कबूला जुर्म
गिरफ्तारी के बाद आरोपी ने शुरुआत में अपनी पहचान छिपाने की कोशिश की. लेकिन लगातार पूछताछ और सबूतों के सामने आने के बाद उसने हत्या में अपनी भूमिका स्वीकार कर ली. उसने बताया कि राम सिंह उसका परिचित था और उसे मालूम था कि वह तांबे की खेप लेकर दिल्ली आता है. इसी वजह से उसने अपने साथियों के साथ मिलकर हत्या और लूट की योजना बनाई थी.
क्राइम ब्रांच की बड़ी सफलता
दिल्ली पुलिस का कहना है कि यह गिरफ्तारी इस बात का उदाहरण है कि अपराध कितना भी पुराना क्यों न हो, कानून के हाथ आखिरकार आरोपी तक पहुंच ही जाते हैं. बिना डिजिटल रिकॉर्ड, बिना सीसीटीवी फुटेज और बिना आधुनिक तकनीक के दौर में हुए अपराध को 33 साल बाद सुलझाना आसान नहीं था. क्राइम ब्रांच की सेंट्रल रेंज टीम की महीनों की मेहनत, तकनीकी निगरानी, पुराने दस्तावेजों की पड़ताल और लगातार फील्ड वर्क के चलते आखिरकार राम सिंह हत्याकांड का मुख्य आरोपी गिरफ्तार हो गया. इसके साथ ही 33 साल से लंबित इस मामले में पीड़ित परिवार को न्याय मिलने की उम्मीद फिर से जगी है.
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