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दिल्ली के सैकड़ों प्रोजेक्ट में जान डालने वाले राकेश मेहता, उनका सुसाइड गले क्यों नहीं उतर रहा!

फैसलों को लेने में माहिर राकेश मेहता के अंतिम फैसले पर अफसोस हमेशा रहेगा. क्योंकि एक बेहतरीन ब्यूरोक्रेट के साथ आधुनिक दिल्ली को बनाने में शीला दीक्षित के साथ कदम मिलाकर चलने वाले उतने ही बेहतरीन इंसान भी थे.

दिल्ली के सैकड़ों प्रोजेक्ट में जान डालने वाले राकेश मेहता, उनका सुसाइड गले क्यों नहीं उतर रहा!
दिल्ली के पूर्व मुख्य सचिव के साथ मेरी मुलाकात के कुछ अंश.

2010 सितंबर का महीना था, कॉमनवेल्थ गेम्स के शुरु होने में एक महीने से भी कम का वक्त बचा था. अखबारों की हेडलाइन में काम से ज्यादा चर्चा करप्शन की थी. पर, इन सारी कहानियों के बीच दिल्ली की सीएम शीला दीक्षित रात के साढ़े दस बजे कॉमनवेल्थ खेलों से जुड़े प्रोजेक्ट की तैयारियों का जायजा लेने सड़क पर निकल पड़ती हैं. साथ में राकेश मेहता भी हैं, जो कि तब दिल्ली की ब्यूरोक्रेसी के मुखिया थे, यानि दिल्ली के चीफ सेक्रेटरी. मैं फील्ड में था, बारापुला एलिवेटेड रोड जो कि गेम्स के हिसाब से सबसे अहम था, तब तक पूरा नहीं हो पाया था. पीडब्ल्यूडी विभाग में इंजीनियर इन चीफ सर्वज्ञ श्रीवास्तव भी तलब किए गए.

राकेश मेहता का कॉन्फिडेंस कमाल था

 शीला दीक्षित के चेहरे पर परेशानी थी लेकिन राकेश मेहता निश्चिंत भाव से खड़े थे, अधिकारियों से बात करते रहे, रिपोर्ट लेते रहे. मैंने सवाल पूछा, अगर बारापुला एलिवेटेड रोड नहीं बन पाया तो विकल्प क्या है. मेहता साहब ने मुस्कराते हुए जवाब दिया, इसका छोड़ो, मयूर विहार का फ्लाईओवर भी बन जाएगा, कल मेरे दफ्तर में आइए, सब बताऊंगा. दरअसल उसी रोज मैंने मयूर विहार फ्लाईओवर की लेटलतीफी पर स्टोरी की थी. दरअसल साल 2010 जितना कॉमनवेल्थ खेलों के लिए जाना जाएगा, उस साल हो रही नॉन स्टॉप बरसात उससे कम चर्चा की बात नहीं थी. पूरी रात बारिश हुई, काम का कॉन्फिडेंस फिर से पानी में जाता दिखाई पड़ा. अगली सुबह, राकेश मेहता से मुलाकात दफ्तर की जगह फिर किसी और प्रोजेक्ट पर हुई, लेकिन विश्वास उतना ही दिखा.

उनको हार मानना नहीं आता था

आज ये विश्वास नहीं हो रहा कि सकारात्मकता से भरे उस शख्स ने मौत को खुद गले लगा लिया. जिस अफसर को न कहना नहीं आता हो, उसने जिंदगी को आखिरकार किस भरे मन से न कहा होगा, यही सोच रहा हूं. राकेश मेहता कोई आम अधिकारी नहीं थे, उनके पास आईडिया का भंडार था और दिल्ली की हर समस्या का इलाज भी.

दिल्ली में जर्मन टेक्निक का स्लॉटर हाउस बनाया

 पहली बार उनसे मुलाकात तब हुई जब वो एमसीडी कमिश्नर थे. साल तो ठीक से याद नहीं, लेकिन 2004-05 की बात है. जर्मनी से लौटे राकेश मेहता ने फैसला ले लिया कि दिल्ली के कसाबपुरा (नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास) से बूचड़खाना हटाया जाएगा. शहर के बीचोबीच उसकी वजह से काफी प्रदूषण फैलता था. मांस के कारोबार से जुड़े लोगों ने विरोध शुरू किया और राजनीति भी गरमाने लगी क्योंकि तब दिल्ली सरकार और एमसीडी दोनों में ही कांग्रेस की सत्ता थी. लेकिन मेहता साहब टस से मस नहीं हुए. मुझे फिरोज शाह कोटला के पास अपने दफ्तर में बुलाया और जर्मन टेक्निक के बारे में पूरी क्लास लगा डाली कि आखिरकार ऑटोमैटिक स्लॉटर हाउस कैसा होगा जो कि गाजीपुर में बनना है. मैंने अभी समझा ही था कि कहा, चलो गाजीपुर चलते हैं वहां जर्मनी से मशीनें आ गईं हैं, यानि समय से पहले सोचने का गजब जज्बा था.

इसलिए जब मैं ये आर्टिकल लिख रहा हूं तो मन को मना ही नहीं पा रहा कि समय से आगे देखने वाले राकेश मेहता हो सकता है बेहद बीमार रहे हों, अकेलापन भी उन्हें खल रहा हो, लेकिन दुनिया को इस तरह अलविदा तो वो नहीं कह सकते.

बीआरटी कॉरिडोर का आईडिया भी उनका था

 अब बात उस बीआरटी कॉरिडोर की जो दिल्ली में सबसे बड़े विवादों में एक रहा. ये आईडिया राकेश मेहता ने कोलंबिया के बगोटा शहर से लिया था. खुद वहां गए और दिल्ली में सबसे भीड़-भाड़ वाली सड़कों में एक पर उसे अमल कर दिया. विरोध शुरु हुआ, शीला दीक्षित की सरकार में तब परिवहन मंत्री हारून यूसुफ होते थे और ट्रांसपोर्ट कमिश्नर आर के वर्मा. सीएम ने मीटिंग बुलाई तो कहा कि हमें बीआरटी पर पुनर्विचार करना होगा. सब समझते उससे पहले ही मेहता साहब ने दस फायदे गिना दिए. सीएम ने फैसला पहले ही ले लिया था. उन्होंने कहा अभी हम इसको आगे नहीं बढ़ा सकते, जहां तक बना है वहीं रोक दिया जाए. मेहता साहब को तब बड़े गुस्से में देखा, लेकिन तब भी वो उस स्ट्रेच को ना तोड़ने पर अड़े रहे, जहां बीआरटी बन चुका था. कहते थे, इसका फायदा आज नहीं, आने वाले समय में होगा.

लाडली योजना, महिला सशक्तिकरण पर किया काम

बात समय की हुई है तो कोई ऐसी मीटिंग नहीं होती थी जब राकेश मेहता देर से पहुंचते थे. तय समय पर शुरू और तय समय पर ही खत्म. खुद अपने हाथों से मीटिंग के मिनट्स बनाते और मीटिंग खत्म होते ही अपने स्टेनोग्राफर को अंदर बुला लेते. आम तौर पर जिन मीटिंग्स के मिनट्स आने में दो-तीन महीने भी लग जाया करते थे, वो सबकी मेज पर दो-तीन घंटे से पहले ही तैयार मिलता था. जिस लाडली योजना की बात आज देश के कई राज्य कर रहे हैं, उसे दिल्ली में सबसे पहले लागू करना का श्रेय भी मेहता साहब को ही जाता है. इतना ही नहीं महिला सशक्तिकरण के लिए दिल्ली सचिवालय की कैंटीन का पूरा मैनेजमेंट महिलाओं को देना एक बड़ा फैसला था और आज भी दिल्ली सरकार के मुख्यालय की कैंटीन सिर्फ और सिर्फ महिलाएं ही चलातीं हैं.

राकेश मेहता के सुसाइड के फैसले से दुखी हूं

फैसलों को लेने में माहिर राकेश मेहता के अंतिम फैसले पर अफसोस हमेशा रहेगा. क्योंकि एक बेहतरीन ब्यूरोक्रेट के साथ आधुनिक दिल्ली को बनाने में शीला दीक्षित के साथ कदम मिलाकर चलने वाले राकेश मेहता उतने ही बेहतरीन इंसान भी थे. आखिरी बार फोन पर जब मैंने उनसे दिल्ली की समस्याओं पर कुछ लिखने को कहा, तो उन्होंने हंसते हुए मना किया, और कहा, मैं बता देता हूं लिख तुम लेना कुणाल. कहां पता था कि भविष्य में क्या लिखा है और अगली खबर उनकी सुसाइड की होगी.

अलविदा, मेहता साहब!

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