
राजनीतिक घटनाओं के विश्लेषण का रिवाज़ कुछ कम होता जा रहा है। बिहार विधानसभा चुनाव की घटनाओं का तथ्यपरक विश्लेषण तो दुर्लभ ही हो गया। दो साल पहले तक देश में छोटी से छोटी बात पर केंद्र सरकार के कान उमेठने का चलन था और जब भी किसी राज्य में चुनाव होते थे, केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी को उस राज्य में खामियाजा ज़रूर भुगतना पड़ता था।
इतिहास पर गौर
पिछले 25 साल का चुनावी ट्रेंड देखें तो केंद्र में सत्ता में रही कांग्रेस सरकारों और गैर-कांग्रेस सरकारों, यानी दोनों प्रकार के राजनीतिक दलों को विधानसभा चुनावों में ऐसी उठापटक से गुज़रना पड़ा। वहीं, देश में उत्तर से दक्षिण तक और पूरब से पश्चिम तक क्षेत्रीय दलों के उदय का भी दौर था। यानी राजनीतिक विश्लेषकों को बिहार को इस लिहाज से भी देखना पड़ेगा। इस बात पर भी गौर करना पड़ेगा कि पिछले दशक में बिहार में जेडीयू के सहारे ही बीजेपी ने अपनी मौजूदगी बढ़ाई थी, वरना उसके पहले बिहार में उसका स्वतंत्र अस्तित्व कभी बन नहीं पाया।
एड़ी से चोटी का ज़ोर
इस बार बिहार के चुनाव में एक बिल्कुल नई परिस्थिति भी थी। केंद्र में डेढ़ साल पहले काबिज हुई सरकार का राजनीतिक दल सीधे-सीधे एक विधानसभा चुनाव में एड़ी से चोटी का ज़ोर लगा रहा था। खुद प्रधानमंत्री को किसी विधानसभा चुनाव में बेधड़क और बिना किसी संकोच के चुनावी रैलियां करने के लिए रिकॉर्ड की हद तक जूझना पड़ा। रैलियों में भारी भीड़ जुटाने के लिए दिल्ली से लेकर दूसरे प्रदेशों के तमाम नेताओं को लगाना पड़ा। अब 8 नवंबर को जैसे ही बिहार के नतीजों का रुख पता चलना शुरू होगा, फौरन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों की चर्चा होने को कोई रोक नहीं पाएगा। यह तब भी होगा, जब बीजेपी टुडे'ज़ चाणक्य के एक्ज़िट पोल के मुताबिक भारी बहुमत से जीत भी जाती है।
मोदी के इर्द-गिर्द वाला चुनाव
यह प्रत्यक्ष तथ्य है कि राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मोदी सरकार के डेढ़ साल को बीजेपी के कामकाज की समीक्षा के लिए काफी मानता है और दूसरा वर्ग पूरी ताकत लगाकर कहता है कि बीजेपी सरकार को नाकाम करार देने के लिए 18 महीने पर्याप्त नहीं हैं। हालांकि मतदान खत्म होने के फौरन बाद बीजेपी की जबर्दस्त वकालत करने वाले अब जोर देकर यह दर्ज करवाने में लग गए हैं कि बिहार को बिहार तक सीमित रखा जाए, यानी अब 8 नवंबर को नतीजे के बाद दोनों प्रकार के विश्लेषकों के तर्क और भाव-भंगिमाएं बहुत रोचक होंगी। पार्टी प्रवक्ताओं के तर्कों या बहानों का तो कहना ही क्या।
और क्या कहने चुनावी सर्वेक्षणों के...
कहा जाता है कि जीवन में या दुनिया में निरापद कुछ नहीं होता, लेकिन चुनावी सर्वेक्षणों का धंधा इस धारणा को झुठलाता चला आ रहा है। एक-एक महीने लंबी चुनाव प्रक्रियाओं में कई-कई बार अपने अनुमान या भविष्यवाणियां करने वाले ये सर्वेक्षण क्या करते हैं, क्यों करते हैं, यानी किनके लिए क्या-क्या करते हैं...? इस पर गंभीरता से कभी बात नहीं हुई। बिहार का चुनावी मौसम खत्म होने को है, लिहाज़ा इस बहाने चर्चा का मौका है।
चुनावी सर्वेक्षण या सैफोलॉजी
चुनावी विश्लेषणों और उसके कई जटिल पहलुओं को सांख्यिकी के जरिये समझने-समझाने के विज्ञान को अंग्रेजी में सैफोलॉजी कहते हैं। किसी खेल के नतीजों को जानने की उत्सुकता की तरह चुनाव के नतीजों को पहले से जनवाने के मकसद से विकसित किए गए इस व्यावहारिक विज्ञान के सनसनीखेज तथ्यों पर सार्वजनिक तौर पर चर्चा से सभी पक्ष बचते हैं। सैफोलॉजी करने वालों को तो ऐसी चर्चा से एलर्जी है। कुल मिलाकर इस पर बिल्कुल बात नहीं होती। हो सकता है कि ऐसा इसलिए होता हो, क्योंकि तफसील से समझाने के लिए अकादमिक विद्वानों का यह काम समय के लिहाज से बहुत खर्चीला है। खैर, अपने एक अपराधशास्त्री होने के नाते यहां सिर्फ शुरुआती ज़िक्र करना ही काफी मानकर चला जा रहा है। इस ज़िक्र का मकसद सिर्फ इतना है कि यह समझाया जा सके कि इन सर्वेक्षणों (ओपिनियन पोल) से मतदाता के निर्णय लेने की प्रक्रिया कैसे प्रभावित की जाती है, और एक्ज़िट पोल के जरिये अपनी विश्वसनीयता को बचाए रखने का कितनी सफाई से प्रबंध किया जाता है।
अपराधशास्त्र के अध्ययन में आपराधिक मनोविज्ञान का एक पर्चा होता है, जिसमें एक अध्याय है मनोरचनाएं। यह हिन्दी शब्द अंग्रेजी के 'मैंटल मैकेनिज़्म' का अनुवाद है। मनोवैज्ञानिक शोध के मुताबिक अपने अनुमान या उसके आधार पर लिए गए फैसले के गलत साबित होने पर उस मानव के अहम, यानी ईगो पर चोट लगती है, जिसके दर्द को खत्म करने के लिए उसके मस्तिष्क को कोई न कोई तर्क ढूंढना पड़ता है। इसी तर्क को मनोविज्ञान में मनोरचना या इस प्रक्रिया को 'मैंटल मैकेनिज़्म' कहते हैं। खेलकूद में हार से भी इस मनोवैज्ञानिक अहम को चोट पहुंचती है, इसीलिए मानव में खेलभावना के विकास के लिए मनोविज्ञान तरह-तरह के उपाय खोजता रहता है। मनोविज्ञान के क्षेत्र में इसके प्रबंध के लिए महत्त्वपूर्ण खोज है विवेक का विकास। अंग्रेजी में इसे 'सुपर ईगो' कहते हैं।
इस मनोवैज्ञानिक तथ्य को लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाता, यानी वोटर के फैसले लेने की प्रक्रिया से जोड़ें तो हम कह सकते हैं कि सैफोलॉजी वोटर को यह अप्रत्यक्ष चेतावनी देने का काम करती है कि, 'भाई, फलां पार्टी जीत रही है, इससे अलग फैसला लिया तो अपने फैसले के गलत होने का असहनीय कष्ट होगा...'
सैफोलॉजी अपनी विश्वसनीयता के लिए विज्ञान की वर्दी पहनती है। सांख्यिकी नाम के विज्ञान का चोला पहन कर सैफोलॉजी को 'छूट' लेने का भी मौका मिलता है, क्योंकि सांख्यिकी किसी प्रवृत्ति के सिर्फ रुख या रुझान बताने का दावा करती है। वह पहले से ही हाथ उठाकर ऐलान करती है कि मैं गणित नहीं हूं, मैं चार-छह फीसदी तक गलत हो जाने की छूट लेने के लिए स्वतंत्र हूं। सैफोलॉजी को अपने धंधे के लिए इससे बढि़या बात और क्या चाहिए, सो, आइए, अब देखें बिहार की सैफोलॉजी।
चुनाव से पहले कम से कम 10 एजेंसियों ने सैफोलॉजी के धंधे में अपने होने का ऐलान किया, जिनमें कम से कम पांच को मीडिया का प्रत्यक्ष या परोक्ष सहयोग मिला। पांच सर्वेक्षणों में चार ने बीजेपी को जीतता हुआ बताया। इस बार कुछ सर्वेक्षण इतने पहले मैदान में उतर आए कि चुनाव की तारीखों का ऐलान तक नहीं हुआ था। यह चुनाव प्रचार का शंखनाद था, जिसमें एक सेना ने अपनी जीत की हवा बनाने के लिए मजबूत आधार पाया। इस तरह से क्या यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वोटरों को पहले से ही फैसला बता दिया गया कि फलां पार्टी की तरफ जीत का रुख है, वोटरों को आगाह किया गया कि देखना, आपका फैसला गलत साबित होने के बाद आपके नाजुक अहम को चोट न लग जाए। इस तरह क्या मतदाता के सोचने-समझने, यानी उन्हे अपने 'सुपर ईगो' या विवेक का इस्तेमाल करने में बाधा नहीं पहुंची।
ओपिनियन पोल से शुरू हुआ चुनाव प्रचार डेढ़ महीने से भी ज्यादा चला। 5 नवंबर को आखिरी दौर का मतदान होने के फौरन बाद इन एजेंसियों ने अपने-अपने एक्ज़िट पोल के नतीजे सुनाए। हमेशा की तरह हैरत की बात यह रही कि वोट पड़ जाने के बाद उन्हीं छह एजेंसियों में से चार ने बताया कि हमारी पहले बताई फलां पार्टी नहीं, बल्कि ढिमका पार्टी जीत रही है। सैफोलॉजी ने खुद को सांख्यिकी जैसे शस्त्र का एप्रॅन, यानी वर्दी पहना रखी है, सो उसके पास अपने गलत होने के रेडीमेड कारण पहले से रखे होते हैं, और सैफोलॉजी का व्यवसाय करने वालों के पास अपने गलत होने के कारण लगी चोट को मिटाने की तमाम मनोरचनाएं हो सकती हैं। ये हमें 8 नवंबर को चुनाव के नतीजों के फौरन बाद सुनने को मिलेंगी, लेकिन चुनावी लोकतंत्र के सबसे पवित्र पर्व पर ब्लेड जैसी बारीक और उस्तरे जैसा घाव करने वाली ऐसी सैफोलॉजी पर क्या अकादमिक विमर्श नहीं होना चाहिए...?
- सुधीर जैन वरिष्ठ पत्रकार और अपराधशास्त्री हैं
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।
इतिहास पर गौर
पिछले 25 साल का चुनावी ट्रेंड देखें तो केंद्र में सत्ता में रही कांग्रेस सरकारों और गैर-कांग्रेस सरकारों, यानी दोनों प्रकार के राजनीतिक दलों को विधानसभा चुनावों में ऐसी उठापटक से गुज़रना पड़ा। वहीं, देश में उत्तर से दक्षिण तक और पूरब से पश्चिम तक क्षेत्रीय दलों के उदय का भी दौर था। यानी राजनीतिक विश्लेषकों को बिहार को इस लिहाज से भी देखना पड़ेगा। इस बात पर भी गौर करना पड़ेगा कि पिछले दशक में बिहार में जेडीयू के सहारे ही बीजेपी ने अपनी मौजूदगी बढ़ाई थी, वरना उसके पहले बिहार में उसका स्वतंत्र अस्तित्व कभी बन नहीं पाया।
एड़ी से चोटी का ज़ोर
इस बार बिहार के चुनाव में एक बिल्कुल नई परिस्थिति भी थी। केंद्र में डेढ़ साल पहले काबिज हुई सरकार का राजनीतिक दल सीधे-सीधे एक विधानसभा चुनाव में एड़ी से चोटी का ज़ोर लगा रहा था। खुद प्रधानमंत्री को किसी विधानसभा चुनाव में बेधड़क और बिना किसी संकोच के चुनावी रैलियां करने के लिए रिकॉर्ड की हद तक जूझना पड़ा। रैलियों में भारी भीड़ जुटाने के लिए दिल्ली से लेकर दूसरे प्रदेशों के तमाम नेताओं को लगाना पड़ा। अब 8 नवंबर को जैसे ही बिहार के नतीजों का रुख पता चलना शुरू होगा, फौरन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों की चर्चा होने को कोई रोक नहीं पाएगा। यह तब भी होगा, जब बीजेपी टुडे'ज़ चाणक्य के एक्ज़िट पोल के मुताबिक भारी बहुमत से जीत भी जाती है।
मोदी के इर्द-गिर्द वाला चुनाव
यह प्रत्यक्ष तथ्य है कि राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मोदी सरकार के डेढ़ साल को बीजेपी के कामकाज की समीक्षा के लिए काफी मानता है और दूसरा वर्ग पूरी ताकत लगाकर कहता है कि बीजेपी सरकार को नाकाम करार देने के लिए 18 महीने पर्याप्त नहीं हैं। हालांकि मतदान खत्म होने के फौरन बाद बीजेपी की जबर्दस्त वकालत करने वाले अब जोर देकर यह दर्ज करवाने में लग गए हैं कि बिहार को बिहार तक सीमित रखा जाए, यानी अब 8 नवंबर को नतीजे के बाद दोनों प्रकार के विश्लेषकों के तर्क और भाव-भंगिमाएं बहुत रोचक होंगी। पार्टी प्रवक्ताओं के तर्कों या बहानों का तो कहना ही क्या।
और क्या कहने चुनावी सर्वेक्षणों के...
कहा जाता है कि जीवन में या दुनिया में निरापद कुछ नहीं होता, लेकिन चुनावी सर्वेक्षणों का धंधा इस धारणा को झुठलाता चला आ रहा है। एक-एक महीने लंबी चुनाव प्रक्रियाओं में कई-कई बार अपने अनुमान या भविष्यवाणियां करने वाले ये सर्वेक्षण क्या करते हैं, क्यों करते हैं, यानी किनके लिए क्या-क्या करते हैं...? इस पर गंभीरता से कभी बात नहीं हुई। बिहार का चुनावी मौसम खत्म होने को है, लिहाज़ा इस बहाने चर्चा का मौका है।
चुनावी सर्वेक्षण या सैफोलॉजी
चुनावी विश्लेषणों और उसके कई जटिल पहलुओं को सांख्यिकी के जरिये समझने-समझाने के विज्ञान को अंग्रेजी में सैफोलॉजी कहते हैं। किसी खेल के नतीजों को जानने की उत्सुकता की तरह चुनाव के नतीजों को पहले से जनवाने के मकसद से विकसित किए गए इस व्यावहारिक विज्ञान के सनसनीखेज तथ्यों पर सार्वजनिक तौर पर चर्चा से सभी पक्ष बचते हैं। सैफोलॉजी करने वालों को तो ऐसी चर्चा से एलर्जी है। कुल मिलाकर इस पर बिल्कुल बात नहीं होती। हो सकता है कि ऐसा इसलिए होता हो, क्योंकि तफसील से समझाने के लिए अकादमिक विद्वानों का यह काम समय के लिहाज से बहुत खर्चीला है। खैर, अपने एक अपराधशास्त्री होने के नाते यहां सिर्फ शुरुआती ज़िक्र करना ही काफी मानकर चला जा रहा है। इस ज़िक्र का मकसद सिर्फ इतना है कि यह समझाया जा सके कि इन सर्वेक्षणों (ओपिनियन पोल) से मतदाता के निर्णय लेने की प्रक्रिया कैसे प्रभावित की जाती है, और एक्ज़िट पोल के जरिये अपनी विश्वसनीयता को बचाए रखने का कितनी सफाई से प्रबंध किया जाता है।
अपराधशास्त्र के अध्ययन में आपराधिक मनोविज्ञान का एक पर्चा होता है, जिसमें एक अध्याय है मनोरचनाएं। यह हिन्दी शब्द अंग्रेजी के 'मैंटल मैकेनिज़्म' का अनुवाद है। मनोवैज्ञानिक शोध के मुताबिक अपने अनुमान या उसके आधार पर लिए गए फैसले के गलत साबित होने पर उस मानव के अहम, यानी ईगो पर चोट लगती है, जिसके दर्द को खत्म करने के लिए उसके मस्तिष्क को कोई न कोई तर्क ढूंढना पड़ता है। इसी तर्क को मनोविज्ञान में मनोरचना या इस प्रक्रिया को 'मैंटल मैकेनिज़्म' कहते हैं। खेलकूद में हार से भी इस मनोवैज्ञानिक अहम को चोट पहुंचती है, इसीलिए मानव में खेलभावना के विकास के लिए मनोविज्ञान तरह-तरह के उपाय खोजता रहता है। मनोविज्ञान के क्षेत्र में इसके प्रबंध के लिए महत्त्वपूर्ण खोज है विवेक का विकास। अंग्रेजी में इसे 'सुपर ईगो' कहते हैं।
इस मनोवैज्ञानिक तथ्य को लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाता, यानी वोटर के फैसले लेने की प्रक्रिया से जोड़ें तो हम कह सकते हैं कि सैफोलॉजी वोटर को यह अप्रत्यक्ष चेतावनी देने का काम करती है कि, 'भाई, फलां पार्टी जीत रही है, इससे अलग फैसला लिया तो अपने फैसले के गलत होने का असहनीय कष्ट होगा...'
सैफोलॉजी अपनी विश्वसनीयता के लिए विज्ञान की वर्दी पहनती है। सांख्यिकी नाम के विज्ञान का चोला पहन कर सैफोलॉजी को 'छूट' लेने का भी मौका मिलता है, क्योंकि सांख्यिकी किसी प्रवृत्ति के सिर्फ रुख या रुझान बताने का दावा करती है। वह पहले से ही हाथ उठाकर ऐलान करती है कि मैं गणित नहीं हूं, मैं चार-छह फीसदी तक गलत हो जाने की छूट लेने के लिए स्वतंत्र हूं। सैफोलॉजी को अपने धंधे के लिए इससे बढि़या बात और क्या चाहिए, सो, आइए, अब देखें बिहार की सैफोलॉजी।
चुनाव से पहले कम से कम 10 एजेंसियों ने सैफोलॉजी के धंधे में अपने होने का ऐलान किया, जिनमें कम से कम पांच को मीडिया का प्रत्यक्ष या परोक्ष सहयोग मिला। पांच सर्वेक्षणों में चार ने बीजेपी को जीतता हुआ बताया। इस बार कुछ सर्वेक्षण इतने पहले मैदान में उतर आए कि चुनाव की तारीखों का ऐलान तक नहीं हुआ था। यह चुनाव प्रचार का शंखनाद था, जिसमें एक सेना ने अपनी जीत की हवा बनाने के लिए मजबूत आधार पाया। इस तरह से क्या यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वोटरों को पहले से ही फैसला बता दिया गया कि फलां पार्टी की तरफ जीत का रुख है, वोटरों को आगाह किया गया कि देखना, आपका फैसला गलत साबित होने के बाद आपके नाजुक अहम को चोट न लग जाए। इस तरह क्या मतदाता के सोचने-समझने, यानी उन्हे अपने 'सुपर ईगो' या विवेक का इस्तेमाल करने में बाधा नहीं पहुंची।
ओपिनियन पोल से शुरू हुआ चुनाव प्रचार डेढ़ महीने से भी ज्यादा चला। 5 नवंबर को आखिरी दौर का मतदान होने के फौरन बाद इन एजेंसियों ने अपने-अपने एक्ज़िट पोल के नतीजे सुनाए। हमेशा की तरह हैरत की बात यह रही कि वोट पड़ जाने के बाद उन्हीं छह एजेंसियों में से चार ने बताया कि हमारी पहले बताई फलां पार्टी नहीं, बल्कि ढिमका पार्टी जीत रही है। सैफोलॉजी ने खुद को सांख्यिकी जैसे शस्त्र का एप्रॅन, यानी वर्दी पहना रखी है, सो उसके पास अपने गलत होने के रेडीमेड कारण पहले से रखे होते हैं, और सैफोलॉजी का व्यवसाय करने वालों के पास अपने गलत होने के कारण लगी चोट को मिटाने की तमाम मनोरचनाएं हो सकती हैं। ये हमें 8 नवंबर को चुनाव के नतीजों के फौरन बाद सुनने को मिलेंगी, लेकिन चुनावी लोकतंत्र के सबसे पवित्र पर्व पर ब्लेड जैसी बारीक और उस्तरे जैसा घाव करने वाली ऐसी सैफोलॉजी पर क्या अकादमिक विमर्श नहीं होना चाहिए...?
- सुधीर जैन वरिष्ठ पत्रकार और अपराधशास्त्री हैं
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।
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