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This Article is From Jul 06, 2017

प्राइम टाइम इंट्रो : चीन का इरादा आखिर क्‍या है?

रवीश कुमार
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जुलाई 06, 2017 23:18 pm IST
    • Published On जुलाई 06, 2017 23:18 pm IST
    • Last Updated On जुलाई 06, 2017 23:18 pm IST
क्या आपने भी महसूस किया है कि जब भी पाकिस्तान की बात आती है हमारा मीडिया का एक बड़ा हिस्सा युद्ध का उन्माद फैलाने लगता है, भारत के संयम को ललकारने लगता है, लेकिन जब चीन की बात आती है तो वही मीडिया और उसके एंकरों की भाषा में रक्षा, रणनीति की शब्दावली तो है लेकिन मार दो, फोड़ दो, दिखा दो टाइप के सड़क छाप विश्लेषण नहीं हैं. नेता, मंत्री या प्रवक्ता भी शालीन नज़र आ रहे हैं. चीन के बहाने कम से कम टीवी पर चर्चा के तेवर से लग रहा है कि अब भी बहुत कुछ नहीं बिगड़ा है. हमारे एंकर और चैनल पूरी तरह से शालीनता से चर्चा करना नहीं भूले हैं. पाकिस्तान को लेकर भारतीय मीडिया ने कवरेज का जो पैमाना कायम किया है वो पैमाना लगता है चीन के संदर्भ में आउट ऑफ सिलेबस हो गया है. हाल ही में प्रवीण सॉहनी और ग़ज़ाला वहाब की एक किताब पढ़ रहा था ड्रैगन ऑन आवर डोरस्टेप. इस किताब से एक चीनी खेल का प्रसंग मिला.

इसे गो कहते हैं. पत्रकार प्रवीण को चीनी सेना पीएलए के अधिकारी ने इस खेल के बारे में बताया था कि हम शतरंज नहीं पसंद करते हैं, गो ही पसंद करते हैं. आज की दुनिया में अपनी क्षमता को छिपाना मुश्किल हो गया है. यह खेल हमें सिखाता है कि चाल चलते वक्त किसी भी तरह इरादे का पता न चले. सब पता चल जाए मगर किसी तरह मंशा का पता न चले. यह खेल चीन में दो ढाई हज़ार साल से खेला जा रहा है. इस खेल में जो सबसे पहले सफेद या काली गोटी से बोर्ड को भर देता है वही विजयी माना जाता है. प्रवीण सॉहनी ने लिखा है कि इस बातचीत के अगले दिन जब वे बाज़ार में घूम रहे थे तो हर जगह गो जिसे चीनी भाषा में वेई की कहते हैं, बिकते देखा. शतरंज नहीं. उन्हें एक और सेना अधिकारी ने बताया था कि चीन तभी लड़ता है जब उसका हित प्रभावित होता है.

डोकलाम क्षेत्र में 18 जून को जो हुआ है उसके बाद से कुछ नया नहीं हुआ है. लेकिन अलग-अलग स्तर पर रोज़ बयान ज़रूर आ रहे हैं. कभी बीजिंग से तो कभी दिल्ली के चीनी दूतावास से. 6 जुलाई को दिल्ली स्थित चीनी दूतावास के राजनीतिक काउंसलर ली या ने एक वीडियो बयान जारी किया है. बयान अग्रेज़ी में है. इसका अनुवाद मैं पढ़ रहा हूं.

इस वीडियो बयान में ली या कह रहे हैं कि पहले के विवादों के समय भारतीय अधिकारी भारत के भीतर जन भावना का हवाला देते हुए चीन से आग्रह करते रहे हैं कि वह अपनी सेना को पीछे हटा ले. इसलिए चीनी कूटनीति के लिए यह काफी महत्वपूर्ण हो जाता है कि हम सीधे भारतीय जनता से ही बात करें. भारत में चीनी दूतावास के अधिकारी बहुत ज़्यादा मीडिया में नहीं आते हैं. 18 जून को भारत चीन सीमा से लगे सिक्किम सेक्टर के पास दोनों मुल्कों की टुकड़ियों में हाथापाई जैसी हुई. 1890 में ब्रिटेन और चीन के बीच तिब्बत और सिक्किम को लेकर एक समझौता हुआ था, जिसके तहत ब्रिटेन ने चीन के लिए इस सेक्टर पर अपनी दावेदारी छोड़ दी थी. भारत दावा कर रहा है कि डोकलाम भूटान का है. भारत अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित है. जहां तक मेरी जानकारी है, भारत का यह दावा ग़लत है. हमारे पास प्रमाण हैं कि डोकलाम चीन का है. डोकलाम, चीनी सीमा के पास रहने वालों के लिए पारंपरिक रूप से चारागाह का क्षेत्र रहा है. शी जांग स्वायत्त क्षेत्र के आर्काइव में भूटानी चरवाहों के दिए ग्रास टैक्स यानी घास कर की रसीद भी है. यह किसी भी संप्रभु राष्ट्र को मंज़ूर नहीं होगा. समाधान यही है कि भारत अपनी टुकड़ी हटा ले. बिना किसी शर्त के और वो भी जल्दी. इसके बग़ैर भारत और चीन के बीच कोई भी मानीख़ेज़ बातचीत नहीं हो सकती है.

इससे पहले बुधवार को बीजिंग से भी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने इसी तरह का बयान दिया, उससे पहले दिल्ली स्थित चीन के राजदूत ने भी यही बात दोहराते हुए कहा कि भारत ने अंतरराष्ट्रीय संधि का उल्लंघन किया है. चीन लगातार अपना बयान दे रहा है और प्रोपेगैंडा कर रहा है. अभी तक भारत की तरफ एक ही औपचारिक बयान आया है. भारत का मानना है कि जो कहना था कह दिया. रक्षा मंत्री और सेनाध्यक्ष का भी एक ही बार बयान आया. इस बीच गुरुवार सुबह पीटीआई के हवाले से ख़बर आई कि जी-20 के लिए जर्मनी पहुंच रहे भारत के प्रधानमंत्री और चीन के राष्ट्रपति के बीच द्विपक्षीय वार्ता नहीं होगी. चीन ने बातचीत से मना कर दिया है क्योंकि बातचीत का माहौल नहीं है. पीटीआई ने यह ख़बर चीनी विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के हवाले से यह जारी की थी. इस ख़बर के बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने तुरंत प्रतिक्रिया दी और कहा कि भारत की द्विपक्षीय बैठक अर्जेंटीना, कनाडा, इटली, जापान, मेक्सिको, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन और वियतनाम के साथ तय है. इसके साथ ही प्रधानमंत्री मोदी ब्रिक्स नेताओं की बैठक में हिस्सा लेंगे, जिसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है.

एक तरह से विदेश मंत्रालय ने इशारे से बता दिया कि प्रधानमंत्री मोदी और चीन के राष्ट्रपति के बीच बातचीत तय ही नहीं थी तो रद्द कहां से होगी. ब्रिक्स देशों की अलग से बैठक तय है उसमें भारत, ब्राज़ील, रूस, दक्षिण अफ्रीका और चीन के राष्ट्र प्रमुख भी एक कमरे में होंगे. आमने सामने तो होंगे. इस पर एक नया विवाद छिड़ गया कि बीजिंग में चीनी विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने भारतीय रिपोर्टरों से जो कहा उसे आधिकारिक बयान के ट्रांसक्रिप्शन में इसलिए नहीं आया क्योंकि वो आधिकारिक रूप से नहीं कहा गया था. एक जानकारी यह भी कहती है. पीटीआई ने बाद में एक संशोधित कॉपी जारी कि जिसमें कहा कि अज्ञात सूत्रों के हवाले से ऐसा कहा गया था.

तनाव डोकलाम में हुआ है और टीवी पर झूले वाली तस्वीर झूल रही है. 2014 में भारत आए चीन के राष्ट्रपति शी चिन फिंग के स्वागत में प्रधानमंत्री मोदी ने कोई कमी नहीं की थी. तब भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने इस यात्रा को एक नाम भी दिया. ईंच टुआर्ड्स माइल्स. ईंच inch मतलब इंडिया और चाइना. जैसे इज़राइल में उन्होंने कहा कि आई फॉर आई मतलब इंडिया फॉर इज़राइल. हम ईंच का कुछ और मतलब समझ रहे थे और चीन कुछ और समझ गया. उस साल लद्दाख के पास चुमार में चीनी टुकड़ी दो किमी अंदर आ गई. सड़क बनाने. भारत ने सख्त एतराज़ किया और अपनी टुकड़ी तैनात कर दी. डेमचौक में चीनी नागरिक अपना झंडा लेकर खड़ा हो गया तो सामने से भारतीय नागरिक भी तिरंगा लेकर खड़ा हो गया. इन विवादों के बीच भी साबरमती के तट पर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति झूला झूलते रहे. चीन को ही अपनी स्थिति से वापस जाना पड़ा. 2015 में प्रधानमंत्री मोदी ने भी चीन की यात्रा की तो उनका भी भव्य स्वागत किया गया. इसके बाद 2016 में राषट्रपति शी चिन फिंग गोवा भी आए थे ब्रिक्स की बैठक में हिस्सा लेने.

2014 में राष्ट्रपति शी चिन फिंग ने हिन्दू अखबार में प्रधानमंत्री मोदी की एक बात का समर्थन किया था कि मोदी का कहना सही है कि भारत और चीन दो जिस्म एक जान हैं. इस वक्त दो जिस्म दो जान क्यों नज़र आ रहे हैं. सब तो ठीक ही चल रहा था पर अब ये क्यों हो रहा है. वहां के अखबार ग्लोबल टाइम्स का संपादकीय चिढ़ाने वाला ही है. यह अख़बार सरकारी टाइप का है इसलिए अखबार का कम सरकार का मत ज़्यादा लगता है. इसने लिखा है कि भारत का भूटान पर नियंत्रण है इसलिए भूटान ने चीन से राजनयिक संबंध कायम नहीं किया है. भारत ने अपने सुरक्षा हितों के कारण अससमान संधियों के ज़रिये भूटान की कूटनीतिक संप्रभुता को नुकसान पहुंचाया है. भारत ने सिक्कम पर भी अपनी नीतियों को थोपा है. भारत इस बार भूटान की मदद का सहारा लेकर सीमा पर अपने क्षेत्रीय प्रभुत्व का प्रदर्शन कर रहा है. भारत को इसके लिए सबक सिखाना चाहिए. दुनिया को ग़ौर करना चाहिए कि भारत किसी तरह हिमालयन देशों को दबा रहा है. अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भूटान की परेशानी समझनी चाहिए और छोटे राज्यों के दमन से भारत को रोकना चाहिए.

चीन चाहता क्या है, उसका इरादा उस गो खेल की तरह है जिसका सिद्धांत ही इस पर टिका है कि कुछ हो जाए, इरादे का पता नहीं चलना चाहिए. क्या चीन भारत के खिलाफ विवाद से प्रोपेगैंडा करना चाहता है. वो पाकिस्तान के लिए यह सब कर रहा है या अपने लिए. भूटान तो भारत के साथ है मगर चीन भूटान के लिए क्यों रो रहा है.

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