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This Article is From May 22, 2015

शहर से पहले आप तो स्मार्ट हो जाइए

Ravish Kumar
  • Blogs,
  • Updated:
    मई 22, 2015 16:32 pm IST
    • Published On मई 22, 2015 16:28 pm IST
    • Last Updated On मई 22, 2015 16:32 pm IST
दिल्ली के प्रगति मैदान में स्मार्ट सिटी पर एक मेला लगा है। बड़ी-बड़ी कंपनियां आज की शहरी ज़िन्दगी के समाधान लेकर हाज़िर हैं। ये वे समाधान हैं, जो बहुत पहले से मार्केट में हैं। कुछ नए भी हैं। इनमें से कई समाधानों को दस-पंद्रह सालों से दुनिया से लेकर भारत में होटल से लेकर अपार्टमेंट में इस्तेमाल किया जा चुका है। प्रगति मैदान में सब अपने-अपने स्टॉल लेकर स्मार्ट सिटी के विचार और सामान की ज़रूरत को पूरा कर रहे हैं, लेकिन अब इन्हें स्मार्ट सिटी के नाम पर एक जगह लाया जा रहा है, पैकेजिंग की जा रही है।

जैसे एक कंपनी ने दिखाया कि अब शहर में गली-गली में घूमकर कचरा उठाने की ज़रूरत नहीं है। आप अपने अपार्टमेंट से कचरा फेंकिए, घर के बाहर लगे कचरे के बक्से में डालिए, वहां से आपके कचरे का पैकेट तीन से दस किलोमीटर लंबी पाइप के जरिये सत्तर किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से एक केंद्रीय सिस्टम में पहुंचेगा। पाइप के अंतिम छोर पर खड़े ट्रक में कचरे का पैकेट अपने-आप भरता जाएगा। ट्रक इस कचरे को लेकर उस जगह जाएगा, जहां हर कचरे की छंटाई होगी और उनका फिर से इस्तेमाल किया जाएगा। गुजरात में बन रहे स्मार्ट सिटी गिफ्ट में इस तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन मुंबई में एक रीयल एस्टेट कंपनी ने भी अपने 400 फ्लैटों के लिए यह व्यवस्था लगाई है। लेकिन स्मार्ट सिटी के तहत ये सारी तकनीकें एक जगह बेची जाएंगी, फिट की जाएंगी। इस तकनीक को लगाना एक तरह से अनिवार्य कर दिया जाएगा, तभी तो स्मार्ट सिटी कहलाएगा।

एक मोहतरमा मुझे अपने स्टॉल पर ले गईं। वहां मुझे बताया गया कि वे कई वर्षों से होटलों में अपनी तकनीक सप्लाई कर रहे हैं। आपने कई होटलों में देखा होगा कि स्विच बदल रहे हैं। इनके अनुसार आप होटल में प्रवेश करेंगे और आप उस होटल का ऐप डाउनलोड करेंगे। डाउनलोड करने के बाद आप अपने फोन से बिस्तर पर बैठे-बैठे पर्दे को खोल सकेंगे और बंद कर सकेंगे। बिस्तर से उठकर बांहें फैलाकर पर्दा हटाना नहीं पड़ेगा। इसी तरह आप आई-पैड या किसी भी स्मार्ट फोन से बत्ती बंद कर सकते हैं, टीवी ऑन कर सकते हैं और विदेश में बैठे-बैठे अपनी बुज़ुर्ग माताजी को उठाए बिना किसी के लिए दरवाज़ा खोल सकते हैं। आप अपने मोबाइल फोन पर घर में क्या हो रहा है, यह सब देख सकते हैं।



दलील यह दी गई कि अब ज़िन्दगी बदल गई है। घर में माता-पिता और बच्चा विदेश में, लेकिन इस ऐप्लिकेशन से आप घर पर नज़र रख सकते हैं। मोहतरमा ने मुझे कॉफी की पेशकश करते हुए कहा कि हमारा नारा भी यही है कि एक कप कॉफी बनाने जितना आसान है हमारा समाधान। मैंने बस पूछ लिया कि एक कमरे के लिए इस ऐप्लिकेशन को लगाने में कितना खर्चा आएगा, तो हंसकर बोलीं, बस डेढ़ लाख रुपये। मैंने कहा, तब तो कॉफी आपकी वाकई बेहद सस्ती है। डेढ़ लाख की एक कॉफी पी जा सकती है। पर आपको यह समझना है कि यह समाधान जितना भी आकर्षक लगे, क्या यह औसत मध्यम वर्गीय नागरिक के लिए है। ग़रीब को तो छोड़ ही दीजिए।

तकनीक का हमारी ज़िन्दगी में प्रवेश हो रहा है, उसे रोका नहीं जा सकता है। हमारे ही देश में अलग-अलग सरकारें इन तकनीकी समाधानों का इस्तेमाल कर रही हैं, बस, इन्हें एक नए नाम से पुकारा जाने लगा है - स्मार्ट सिटी। वैसे स्मार्ट सिटी में सामान्य नागरिक के क्या अधिकार होंगे, यह अभी साफ नहीं है। जैसे ग्रेटर नोएडा में किसी रीयल एस्टेट कंपनी को गोल्फ सिटी या स्पोर्ट्स सिटी के नाम पर ज़मीन दी जाती है। वह हाई-टेक तो होगा ही, लेकिन क्या हर कोई उस गोल्फ सिटी में जा सकता है। यहीं हमें अपनी प्राथमिकता समझने की ज़रूरत है। गोल्फ सिटी के नाम से नाम तो हो जाएगा, मगर इससे कितनों का काम निकलेगा।

उसी तरह से यह भी समझना होगा कि रीयल एस्टेट कंपनी की बनाई स्मार्ट सिटी में रेहड़ी-पटरी पर दुकान लगाकर पेट भरने वालों को कोई जगह नहीं मिलेगी। आप कहेंगे कि इससे शहर गंदा होता है, ट्रैफिक जाम होता है, लेकिन इससे आपकी ज़रूरतें भी तो पूरी होती हैं। जब भी लगता है कि आप महंगा नहीं खरीद सकते, तब आप पटरी पर जाते हैं कि नहीं। अगर वह पटरी पर दुकान लगाकर पेट नहीं भरेगा तो उसे रोज़गार कौन देगा। सिर्फ पटरी की बात नहीं है, आपके नागरिक अधिकारों की भी बात है। मैं नहीं कह रहा हूं कि सब गलत होगा, पर जो हो रहा है, क्या उसे हम और आप साफ-साफ समझते हैं।



क्या आप ऐसी व्यवस्था में रहना चाहेंगे, जहां हर गली-नुक्कड़ पर सीसीटीवी से आप देखे जा रहे हों। आपकी निजता पर किसी और की निगाह हों। लोगों को राह चलते हुए कैमरे देखकर अपने कपड़े ठीक करने पड़ेंगे। क्या आप यह चाहेंगे कि आपके फोन के नंबर या आधार कार्ड के नंबर से आपके आने-जाने और खाने तक का किसी एजेंसी को पता चले। वह भी रीयल टाइम में, यानी जब आप किसी से मिल रहे हों, किसी को पता चल रहा हो कि आप किससे मिल रहे हैं। इसे इन दिनों प्राइवेसी के मसले के तहत उठाया जा रहा है।

स्मार्ट सिटी के जितने भी समाधान वहां नज़र आएं, वे कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में हाउसिंग सोसायटी में अपनाए जा चुके हैं। कुछ समाधान बेहद महंगे हैं। प्रगति मैदान के मेले में जाकर लगा कि स्मार्ट सिटी एक नई संभावना है। सरकार ने एक लाख करोड़ का बजट रखा है, सो, ज़ाहिर है इसके कई हिस्सेदार होंगे और इसमें कुछ गलत नहीं है। बिजनेस का विस्तार होना चाहिए, पर किसकी कीमत पर और किस ज़रूरत के आधार पर यह देखा जाना चाहिए।

जैसे एक टेली-मेडिसिन सिस्टम देखते हुए मैंने सवाल किया कि इससे डॉक्टर को पता तो चल जाएगा कि 100 किलोमीटर की दूरी पर किसी सेंटर में मरीज़ की रिपोर्ट क्या है, लेकिन डाक्टर तो वहीं है। जब तक हम डॉक्टरों की संख्या नहीं बढ़ाएंगे, क्या आप तकनीक से डॉक्टर की क्षमता बढ़ा सकते हैं। बेहतर तरीके से जो डाक्टर अभी 100 मरीज़ देख रहा है, वो 1,000 देखने लग सकता है, लेकिन क्या वह न्याय कर पाएगा। इसीलिए तकनीकी संभावनाएं एक तरफ - उनका स्वागत होना चाहिए, लेकिन इंसानी हस्तक्षेप के बारे में ठीक से सोच लीजिए।

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