अस्सी के दशक के शुरुआती साल थे. बाज़ार में VHS नया-नया आया था. आज जैसे हर गली और नुक्कड़ पर सेल-फ़ोन की दुकानें हैं. ठीक उसी तरह वीडियो पार्लर कुकुरमुत्तों की भांति मानों रातो-रात उग आए थे. धक्के खाकर बदमिजाज ब्लैकिए से महंगे टिकट खरीदने की बजाए, 10 रुपये में पूरा परिवार घर के सुकून में पूरी फ़िल्म देख रहा था. जो वीसीआर-वीडियो कैसेट्स रिकॉर्डर खरीद नहीं पाए वे भाड़े पर ले आते और 3 से 4 फ़िल्म एक ही रात में देख जाते.
सिनेमा की दुनिया पाइरेटेड वीडियो कैसेट्स से बेहद ख़ौफ़जदा थी. सिंगल थिएटर का जमाना था. मॉल और मल्टीप्लेक्स के आने में अभी दो दशक बाक़ी थे. प्राइवेट टेलीविजन चैनल के उदय में भी अभी 10 से ज़्यादा साल बचे थे. दूरदर्शन से मनोरंजन जगत में नई सुगबुगाहट तो शुरू हो चुकी थी, लेकिन वीडियो कैसेट्स रिकॉर्डर से भूचाल आ गया. सिनेमा उद्योग को लगा कि उनका आख़िरी समय आ गया है. थिएटर के बाहर लाइन कम होती जा रहीं थी.
इधर ख़ुद की ज़िंदगी भी बचपने से ऊंगली छुड़ा, किशोर के आगोश में जाने के लिए तैयार थी. दोस्तों के बीच ख़बर आयी कि एक नयी फ़िल्म आयी है. बड़ी मस्ती है उसमें. अमीन सयानी के बिनाका गीत माला पर 'नैनों में सपना, सपनों में सजना..' की धूम थी. ठीक से याद तो नहीं, लेकिन शायद किसी दोस्त के घर वीसीआर पर 'हिम्मतवाला' देखी. धूंधली और आधी-अधूरी. अमजद ख़ान, कादर ख़ान और शक्ति कपूर के द्विअर्थी डॉयलॉग ज़्यादा समझ नहीं आए, लेकिन उनकी फ़ूहड़ कॉमेडी में एक अजीब किस्म का मज़ा बहुत आया. मटकों के बीच मटकती श्रीदेवी की अदा और मादकता समझने की उम्र नहीं थी. कुछ इंदि्रयां उम्र के साथ 'एक्टिव' होती हैं.
उन दिनों हर बस में वीडियो लगने लगा था. बल्कि बगैर वीडियो वाले बस को सवारी मिलनी कम हो गई थी. ऐसे ही एक सफ़र में 'मवाली' देखी. इसमें जयप्रदा भी थीं और श्रीदेवी भी. उस जमाने में दक्षिण की इन दो अभिनेत्रियों के बीच ज़बरदस्त प्रतिस्पर्धा थी. उन्हीं दिनों पटना में एक रिश्तेदार की शादी थी. संपन्न रिश्तेदार हैं. उनके पास एलपी रिकॉर्ड प्लेअर थे. एचएमवी (हिज मास्टर्स वॉयस) के रिकॉर्ड पर कुत्ते की तस्वीर आज भी जेहन में है. एलपी रिकॉर्ड प्लेअर के अलावा उनके पास वीसीआर भी आ गया था. वहीं देखी 'तोहफ़ा'. इसमें भी जितेंद्र, श्रीदेवी और जयप्रदा थी. 'गोरी तेरे अंग-अंग में.....' से ज़्यादा लुभावना लगा 'प्यार का तोहफ़ा तेरा...' हालांकि 'बलिदान' और 'मास्टर जी' के पोस्टर से 'उम्फ़' से पहली मुलाकात होने लगी थी, लेकिन समझ कम ही थी.
छठ पूजा का सुबह का अर्ग देकर जब घाट से घर पहुंचे तो रेडियो पर इंदिरा गांधी की मौत की ख़बर आयी. अच्छी तरह याद है. उस दिन बहुत डर लगा था. इस बीच घर की परिस्थितियां और पढ़ाई का दबाव अल्हड़पन और बेपरवाही पर हावी होता गया. मैट्रिक के बाद पटना आ गए. पटना विश्वविद्यालय के साइंस कॉलेज में दाखिला नहीं मिल पाया. बिहार कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग में भी उस समय इंटरमीडियट साइंस की पढ़ाई होती थी. वहां एडमिशन मिल गया. कॉलेज के रास्ते ऐतिहासिक गांधी मैदान के पास 4 सिनेमा हॉल थे. एलफ़िंस्टन, मोना, रिजेंट और बारी पथ में रूपक सिनेमा. एलफ़िंस्टन में श्रीदेवी की 'नगीना' देखी.
अमरीश पुरी की खतरनाक शख्सियत और उनकी बीन की धुन के सामने श्रीदेवी का नृत्य उस उम्र में दिलो-दिमाग पर हावी नहीं हो पाया. 'आख़िरी रास्ता' में श्रीदेवी और जयाप्रदा के साथ अमिताभ बच्चन भी थे, लेकिन फ़िल्म में ऐसा कुछ नहीं था कि याद रहे. सुभाष घई की मल्टी स्टारर 'कर्मा' में डाक्टर डेंग अनुपम खेर छाए रहे. फ़िरोज़ ख़ान की 'जांबाज़' में श्रीदेवी पर फ़िल्माया गाना-'हर किसी को नहीं मिलता प्यार...' ज़बरदस्त हिट हुआ. हालांकि फ़िल्म की मुख्य हीरोइन डिंपल कपाड़िया थी. ये गाना इसलिए भी आज याद आ गया क्योंकि दिल्ली में पहली नौकरी में ये किसी ने ताने के रूप में सुनाया था. वर्षों बाद फ़ेसबुक पर उससे दुबारा मुलाकात हुई तो जाना कि अब भी 'हर किसी को नहीं मिलता प्यार...' उसका पसंदीदा गाना था. लेकिन अब वो ये खुद के लिए गाती है.
शेखर कपूर की 'मिस्टर इंडिया' अनिल कपूर के ग़ायब हो जाने के करिश्मे के लिए देखी थी. कैलेंडर की कॉमेडी और मोगांबो के साथ खुश होने की उम्र थी. सबसे मज़ा श्रीदेवी को चार्ली चैपलिन की नकल करते देख हुई था. उन दिनों दूरदर्शन पर भी चार्ली चैपलिन ख़ूब आते थे. बहरहाल, वर्षों बाद टेलीविजन पर ये समझने के लिए फ़िल्म दुबारा देखी कि कैसे किशोर कुमार की मस्त और अलीशा चिनॉय की मादक आवाज़ को 'काटे नहीं कटते ये दिन ये रात....' के जरिए श्रीदेवी की अदाएं, इंदि्रयों को उत्तेजना की उस ऊंचाई पर ले जाती हैं जहां इंसान का वश छूटने लगता है. तब तक फ़िल्मी दर्शकों को अहसास हो चुका था कि श्रीदेवी के लटके-झटके और जलवे को टेलीविजन का छोटा स्क्रिन समेट नहीं पा रहा है. लिहाज़ा दर्शक बड़े पर्दे की ओर दुबारा लौटने लगे. श्रीदेवी की एक बाद एक हिट फ़िल्म ने सिनेमा और थियेटर को बचा लिया. VHS आया और हमारी पीढ़ी में ही इसकी मौत भी हो गई.
ग्रेएशन के लिए बीएन कॉलेज में दाखिला लिया. अब गांधी मैदान के और पास आ गए. सारे सिनेमा हॉल कुछ ही कदम पर थे. इसी दौरान 'चांदनी' देखी. यश चोपड़ा फ़िल्म नहीं मोहब्बत को डायरेक्ट करते थे. हिंदुस्तान को स्वीट्जरलैंड की सुंदर वादियों का भीगा अहसास कराने का श्रेय उनसे कभी छीना नहीं जा सकता. 'चांदनी' सही मायने में श्रीदेवी के सुपर स्टारडम पर मुहर थी. 'रोमांटिक' ऋषि कपूर और 'माचो' विनोद खन्ना 'चांदनी' की रोशनी में धुंधले पड़ गए. वे 'चांदनी ओ चांदनी....' पुकारते रह गए और वो 'मेरे हाथों में नौ-नौ चूड़ियों...' के साथ आगे निकल गयीं. बहुत आगे. किसी की हुए बिना.
सीता और गीता की हेमा मालिनी पर चुलबुली 'चालबाज़' भारी पड़ गयी. बलमा यानी बटुकनाथ लल्लनप्रसाद मालपानी की मसाज की ख्वाहिश को मंजू के मुक्के ने शक्ति कपूर को 'छोटा सा नन्हा सा बच्चा' बना दिया. बल्कि अंजू और मंजू के सामने सूरज और जग्गू....सनी दिओल और रजनीकांत...आप सोच सकते हैं...रजनीकांत...जी हां रजनीकांत भी बौने नज़र आए. फ़िल्मफ़ेयर ने 80 के दशक के आइकॉनिक परफॉरमेंस में 'चालबाज़' की श्रीदेवी को चौथे नंबर पर रखा.
'लम्हें' को यश चोपड़ा का सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म माना जाता है और शायद श्रीदेवी का भी. फ़िल्म पसंद तो आयी थी लेकिन तब ये नैतिकता को ये गवारा नहीं हुआ था कि बाप की उम्र के मर्द से कोई लड़की कैसे प्यार कर सकती है? कैसे लड़की अपनी मां के प्रेमी को दिल दे सकती है? बाद में फ़िल्म दुबारा देखी तो इसमें कुछ बुरा नहीं लगा. पटना से दिल्ली आते-आते जगह के साथ शायद सोच और संस्कार की परिभाषा भी बदल गई. समय के साथ नज़रिया भी बदलता है.
आज भी अच्छी तरह याद है. बीएन कॉलेज से ग्रेजुएशन का आखिरी पेपर देकर हम 5-6 दोस्त दौड़ते हुए मोना सिनेमा पहुंचे थे. 'ख़ुदा गवाह' देखने के लिए. अमिताभ बच्चन अभिनय की संस्था हैं. वन मैन इंडस्ट्री रहे हैं. बॉलीवुड में नंबर-1 से नंबर-10 अमिताभ ही माने जाते रहे हैं. लेकिन मेरा मानना है कि 'ख़ुदा गवाह' में बेनज़ीर और मेंहदी बादशाह खान के कद के बराबर खड़ी थी, बल्कि कई दृश्यो में उनसे भी ऊंची नज़र आईं. अमिताभ को इतनी कड़ी टक्कर शायद ही किसी अभिनेता या अभिनेत्री से मिली हो. तभी तो वे सदी के महानायक कहे गए और श्रीदेवी पहली महिला सुपर स्टार. 'सदमा में कमल हासन, 'चालबाज़' में रजनीकांत, और 'ख़ुदा गवाह' में अमिताभ बच्चन से श्रीदेवी कहीं भी उन्नीस नहीं रहीं.
जीवन के 50 साल कोई फ़िल्म में काम करे तो ये अपने आप में ऐसी उपलब्धि है जिस पर यकीन करना मुश्किल हो जाता है. कम-से-कम तीन पीढ़ियों को उन्होने अपना फ़ैन बनाया. आज की पीढ़ी 'इंग्लिश-विंग्लिश' को ख़ूब पसंद किया. बाक़ी हमारी और हमारी पिछली पीढ़ी तो उनकी मुरीद है ही. 13 को कई लोग अशुभ अंक मानते हैं. लेकिन श्रीदेवी और मेरे लिए 13 का अंक अशुभ नहीं है. उनका जन्म दिन 13 अगस्त है तो मेरा 13 अक्टूबर.
शुरुआती दिनो में उनकी एक फ़िल्म आयी थी-बलिदान. बॉक्स ऑफिस पर चल नहीं पायी थी. उस ज़माने में टाइम्स ग्रुप की एक फ़िल्मी पत्रिका आती थी-माधुरी. उसमें श्रीदेवी की एक तस्वीर छपी थी. बाथ टब में साबुन के झाग के बीच श्रीदेवी का चेहरा और घुटना झलक रहा था. घुटने की एक झलक तस्वीर को बेहद ग्लैमरस बना रही थी. रोम-रोम रोमांचित करने वाली तस्वीर थी. विडंबना है कि ज़ेहन में उनकी पहली और आख़िरी तस्वीर बाथ टब की है. उनकी अंतिम यात्रा में भीड़ देखकर ऐसा लगता है कि शायद खुद श्रीदेवी को भी अपने करियर और मुकाम की ऊंचाई का अहसास नहीं था. शायद ये अहसास जाने के बाद ही होता है. सचमुच हम फरियादी उन लम्हें और पल को वर्षों याद करेंगे. अलविदा श्री.
संजय किशोर NDTV इंडिया के खेल विभाग में डिप्टी एडिटर हैं...
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This Article is From Feb 28, 2018
मेरे हिस्से की श्रीदेवी
Sanjay Kishore
- ब्लॉग,
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Updated:फ़रवरी 28, 2018 21:15 pm IST
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Published On फ़रवरी 28, 2018 21:15 pm IST
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Last Updated On फ़रवरी 28, 2018 21:15 pm IST
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